भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 817

गुण और दोष को न देखना ही सबसे बड़ा गुण है। गुण एवं दोष देखना ही दोष है— “गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ।” (भाग० ११।१९।४५) “गुन यह उभय न देखिअहि देखिअ सो अबिबेक ॥” (रा० मा० ७।३१) परन्तु यह बहुत ऊँची स्थिति है। समाधिदशा में ही यह बात बन पाती है। व्यवहार में गुण-दोष को तो जानना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी होता है। जितना भर भी व्यवहार है, विधि-निषेध से ही सम्बद्ध है। गोस्वामीजी भी कहते हैं— “विधिप्रपंच गुन अवगुन साना । ( रा० मा० १।५।२) “तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥ (रा० मा० १।५।१) गुणों का ज्ञान होने पर ही उनका संग्रह किया जा सकता है और दोषों का ज्ञान होने से ही उनके त्याग का प्रयत्न सम्भव है। इसी लिए पूर्वमीमांसा में धर्मजिज्ञासा के साथ अधर्म की जिज्ञासा भी की जाती है। महाभारत एवं रामायण में भी दोनों पक्ष हैं। कौरवपक्ष, पाण्डवपक्ष, रावणपक्ष और रामपक्ष । प्रथम पक्ष में तामस तथा राजस भावों का प्राधान्य है। अन्य पक्ष में सत्त्व का प्राधान्य है। इसी लिए सिद्धान्त यह है— “रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत् ।” (काव्यप्र० १।२) रामादि के समान बर्ताव करना चाहिये रावणादि के समान बर्ताव नहीं करना चाहिये। यह रामायण का सार है। “युधिष्ठिरादिवत् व्यवहर्तव्यं न दुर्योधनादिवत् ।” युधिष्ठिर आदि के समान व्यवहार करना चाहिये, दुर्योधन आदि के समान बर्ताव करना उचित नहीं है। यह महाभारत का सार है। संसार में भली-बुरी सब प्रकार की वस्तुएँ होती हैं। वेदादि-शास्त्रों ने गुण-दोष की दृष्टि से सबका विश्लेषण किया है— “भलेउ पोच सब विधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद - बिलगाए ॥” (रा० मा० १।५।२ ) जैसे हंस क्षीर-नीर का विश्लेषण करके विकार-वारि को त्यागकर क्षीर ग्रहणकर लेता है, उसी तरह सन्तजन गुण-दोषमय संसार से दोष त्यागकर गुण ग्रहणकर लेते हैं— “संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार ।” (रा० मा० १।६) ऐसा बिना किये रामायण पढ़ने से भी लाभ न होगा, क्योंकि 'रामायण' भी इतिहास ही है। उसमें भी दोनों ही पक्ष हैं। उसके पढ़ने से भी एक पक्ष में राग और अन्य पक्ष में द्वेष सम्भव है। अतएव इतिहास के रूप में आरोपित पूर्वोक्त दोष आ सकते हैं; और घृणादि दोषों से मन का बोझ बढ़ जायगा। किन्तु सिद्धान्ततः ऐसा नहीं होता, क्योंकि उसके अनुसार रावण का दोष वर्णन ही केवल त्याग के लिए है। वह मन में धरने की वस्तु नहीं । राम के गुणों का वर्णन ही ग्रहण के लिए है। इतना ही नहीं, रामचरित्र का अङ्ग होने से रावण के चरित्र के वर्णन से भी पुण्य की उत्पत्ति मान्य है। तभी तो— “एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।” की संगति बैठेगी। 'मानस' की कथा कहनेवाले लोग भी जब तक उक्त सिद्धान्त नहीं समझेंगे, तब तक इस भ्रम से मुक्त नहीं हो सकते हैं। किन्तु जिनको समझना ही नहीं है, उनके सामने कोई कितना भी राम और रावण का अनैतिहासिक एवं आध्यात्मिक अर्थ लगाये, परन्तु उनपर उसका कुछ भी असर पड़नेवाला नहीं होता। इसी