रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 820, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें[अध्याय : रामचरितसम्बन्धी लेख : ७४३]
स्वयं श्रीमद्भागवत के परम भागवत भीष्म ने शर-शय्या पर पड़े हुए, अन्तिम श्रीकृष्णस्तुति में कहा था— "व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद् विमुखस्य दोषबुद्ध्या । कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥" (भाग० १।९।३६) जब दोनों सेनाओं को सामने सामने निहार कर अर्जुन ममता, राग आदि दोष-बुद्धि के कारण स्वजनवध से विमुख हो गया । तब जिस भगवान् ने आत्मविद्या प्रदान कर के अर्जुन की उस कुमति का हरण किया था, उस परम पुरुष के चरणों में मेरी रति हो । इससे स्पष्ट है कि वैसे युद्ध से विमुख होना ही दोष था । वह युद्ध धर्म था, उसके त्यागने से ही अकीर्ति और पाप था । अब कहिये, क्या तुलसीदासजी इस युद्ध को अनुचित कहेंगे ? कदापि नहीं । फिर वे महाभारत पर कटाक्ष कैसे कर सकते थे ? श्रीनारद के उपदेश से श्रीव्यास ने जिस श्रीमद्भागवत का निर्माण किया है, उसमें भी अनेक युद्धों का वर्णन है । भगवान् कृष्ण का जन्म ही दुष्टों के संहार के लिए हुआ था । अर्जुन उन्हीं कृष्ण का अंश था । महाभारत संग्राम में भी भगवान् की प्रेरणा से ही क्षत्रियत्वरूप में प्रकट असुरों का संहार हुआ । अर्जुन और कृष्ण दोनों ने भूभार-हरण का कार्य किया था । यह मुख्य प्रश्न नहीं है कि किसने बन्धुओं को मारा और किसने गैर को मारा । विवेकी की दृष्टि में अपराधियों का वध होना चाहिये । चाहे वे बन्धु हों, चाहे गैर लोग हों । न्यायशील राजा निरपराध शत्रु-पुत्र का भी वध नहीं करेगा और अपराधी होने पर अपने औरस पुत्र को भी प्राणदण्ड दे सकता है । अपराधी होने से ही कौरवों का वध करना उचित था । अपराधी होने के कारण ही राम द्वारा रावण का वध उचित था । अपराधी बन्धु को न मारना, अन्य को मारना यह भारी पक्षपात और अन्याय कहा जायगा । फिर पाण्डवों ने तो श्रीकृष्ण पर छोड़ दिया था कि आप जैसा चाहें, कौरवों से सन्धि कर के युद्ध टालने का प्रयत्न करें । भगवान् कृष्ण स्वयं दूत बनकर अनेक महर्षियों को साथ लेकर कौरवों की सभा में गये । बहुत कुछ प्रयत्न किया, किन्तु सन्धि न हो सकी । अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण के परामर्श से तथा उन्हीं के नेतृत्व में पाण्डवों ने युद्ध किया । यदि पाण्डव युद्ध के दोषी हैं तो उनके पहले भगवान् कृष्ण दोषी ठहरेंगे ? क्योंकि पाण्डवों के तो एकमात्र चक्षु श्रीकृष्ण ही थे ओर कृष्ण की शक्ति से अर्जुन एक ही रथ से दुरत्यय कौरव-सैन्य-सागर पार कर सका था । सन्त तुलसीदासजी या कोई भी पाण्डवों को युद्ध का दोषी नहीं कह सकते हैं । श्रीमद्भागवत में भी युधिष्ठिर को अजातशत्रु और 'धर्मभृतां वरिष्ठः' कहा गया है । कहां तक कहें श्रीभागवत के अनुसार भगवान् कृष्ण ने ब्रह्मशाप के व्याज से अपने कुल का भी संहार करा दिया, जो संसार में 'यादवन्याय' के नाम से प्रसिद्ध है । इसे श्रीतुलसीदासजी क्या कहेंगे ? लेकिन भागवतकार कहते हैं— "कण्टकं कण्टकेनैव द्वयं चापीशितुः समम् ।" ( भाग० १।१५।३४ ) "एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभुः । यदून् यदुभिरन्योन्यं भूभारान् संजहार ह ॥" ( भाग० १।१५।२६ ) श्रीभगवान् ने अतिशय बलिष्ठ यदुओं से इतर राजाओं का संहार कराकर, तत्पश्चात् उन्हें भी आपस में ही लड़ाकर भू-भार का संहार किया था । श्रीभागवत में भगवत्प्रिय पाण्डवों के संप्रयाण को परमपवित्र स्वस्त्ययन कहा गया है उसके श्रवण से हरिभक्ति की प्राप्ति कही गयी है— "यः श्रद्धयैतद् भागवत्प्रियाणां पाण्डोः सुतानामिति संप्रयाणम् । श्रृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥" (भाग० १।१५।५२) कहा जाता है कि "श्रीमद्भागवत में भी इतिहास का अभाव नहीं है। उसमें भी राजाओं का इतिहास और उनकी वंशावली का वर्णन है; किन्तु इसमें दो भिन्नताएँ हैं—पाण्डवों के स्थान पर इसके केन्द्र भगवान् कृष्ण हैं और इतिहास वर्णन का उद्देश्य इतिहास न होकर उसके प्रति वितृष्णा और वैराग्य उत्पन्न करना है । सारे इति-