भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 821

७४४ रामायणमीमांसा एकविंश ह्रास का वर्णन करने के बाद उसकी निरर्थकता की घोषणा की गयी है। इतिहास किस दिशा में प्रेरित करता है, इसका बड़ा ही मार्मिक चित्र श्रीमद्भागवत के अन्तिम परिच्छेद में प्रस्तुत किया गया है— “कथं सेयमखण्डा भूः पूर्वैर्मे पुरुषैर्धृता । मत्पुत्रस्य च पौत्रस्य मत्पूर्वा वंशजस्य वा ।। तेजोऽबन्नमयं कायं गृहीत्वाऽऽत्मतयाऽबुधाः । महीं ममतया चोभो हित्वाऽन्तेऽदर्शनं गताः ।। ये ये भूपतयो राजन् भुञ्जन्ति भुवमौजसा । कालेन ते कृताः सर्वे कथामात्राः कथासु च ।।” (भाग० १२।२।४२-४४) वे लोग यही सोचा करते हैं कि मेरे दादा-परदादा इस अखण्ड भूमण्डल का शासन करते थे, अब वह मेरे वंशज किस प्रकार इसका उपभोग करें। वे मूर्ख इस आग, पानी और मिट्टी के शरीर को अपना आपा मान बैठते हैं, और बड़े अभिमान के साथ डींग हाँकते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है। अन्त में शरीर और पृथ्वी, दोनों को छोड़कर स्वयं अदृश्य हो जाते हैं। सबको काल ने अपने विकराल गाल में धर दबाया। इतिहास में उनकी कहानी ही शेष रह गयी है। संसार में बहुत-से महान् पुरुष हो गये हैं, जो सम्पूर्ण लोकों में अपने यश का विस्तार कर के यहाँ से चल बसे। उनकी कथाएँ तुम्हें ज्ञान और वैराग्य का उपदेश करने के लिए कही गयी हैं। इन्हें वाणी का वैभव-मात्र न समझो। इनमें परमार्थ-तत्त्व भरा हुआ है। भगवान् श्रीकृष्ण का गुणानुवाद समस्त अमङ्गलों का नाश करनेवाला है। बड़े-बड़े महात्मा उसी का गान करते हैं। जो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेममयी भक्ति की लालसा रखता हो, उसे नित्य-निरन्तर भगवान् के दिव्यगुणानुवाद का ही श्रवण करते रहना चाहिये— “कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् । विज्ञान-वैराग्य-विवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥ यस्तूत्तमश्लोक-गुणानुवादः सङ्गीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः । तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ।।” (भाग० १२।३।१४,१५) वस्तुतः लेखक को भ्रम है। गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही कहा है— ‘जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ।।’ (रा० मा० ७।७२।२) किन्हीं भी इतिहास की घटनाओं का दुहरानामात्र इतिहास का उद्देश्य नहीं है, किन्तु पूर्वजों के इतिहास से उत्तम-उत्तम शिक्षा ग्रहण करने के लिए ही इतिहास पढ़ा जाता है। पीछे लिखा जा चुका है कि किसी वृत्त-वर्णन के प्रसङ्ग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन इतिहास है। उक्त श्लोक का अर्थ यह है कि राजन्, संसार में यश फैलाकर अन्त में परलोक चले जानेवाले महापुरुषों की जो कथाएँ मैंने सुनायी हैं, वह विज्ञान तथा वैराग्य उपदेश के लिए ही हैं। इसके अतिरिक्त सब वाणी का वैभवमात्र है। उसमें परमार्थ कुछ नहीं है। “इन्हें वाणी का वैभव मात्र न समझो। इनमें परमार्थ-तत्त्व भरा हुआ है।” यह अर्थ असङ्गत है, क्योंकि वह संस्कृत शब्दों की मर्यादा के विरुद्ध है। पर इन पङ्क्तियों के लेखक के लिए संस्कृत का काला अक्षर भैंस बराबर है, फिर यदि कोई इनसे पूछे कि रामायण में भी वाली-सुग्रीव, रावण-विभीषण आदि की लड़ाई ठीक महाभारत के भाइयों की लड़ाई के समान क्यों न मान लें तो इन रामायणजी की पैरों के नीचे की धरती खिसक जायेगी। महाभारत के अध्ययन से तो पद-पद पर विवेक, विज्ञान, वैराग्य और पुण्य का ही लाभ होता है। कहा ही है—