रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“भारताध्ययनं पुण्यमपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापान्यशेषतः ॥” महाभारत का अध्ययन अन्तःकरण को शुद्ध करनेवाला है । जो कोई श्रद्धा के साथ इसके किसी एक श्लोक के एक पाद का भी अध्ययन करता है उसके सब पाप सम्पूर्णरूप से मिट जाते हैं। स्त्रीपर्व, श्राद्धादि, अनुशासनपर्व, शान्तिपर्व, मोक्षधर्म आदि में तो उच्चकोटि का विवेक-विज्ञान आदि का वर्णन है। श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है कि व्यास मुनि ने भगवद्गुणों की विवक्षा से ही महाभारत की रचना की थी— “मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां सखापि ते भारतमाह कृष्णः ।” (भा० ३।५।१२) इतिहास का वर्णन वाल्मीकिरामायण एवं श्रीमद्भागवत में भी है ही, वहाँ इतिहास-वर्णन का जो उद्देश्य अभीष्ट है, वही भारत में अभीष्ट है । यद्यपि महाभारत में मुख्यरूप से श्रीकृष्ण का ही वर्णन है, तथापि यदि धर्मराज, अर्जुन आदि पाण्डवों को ही उसका मुख्य नायक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं; क्योंकि श्रीमद्भागवत के अनुसार पाण्डव भगवत्प्रिय परमभक्त हैं । गोस्वामीजी के अनुसार “राम ते अधिक राम कर दासा ।” श्रीभागवत के अनुसार जो सुख भगवान् के चरणारविन्दों के ध्यान और भगवद्भक्तजनों की कथा के श्रवण में मिलता है, वह सुख स्वमहिम ब्रह्म में भी नहीं मिलता । फिर, काल की तलवार से विलुलित विमानों से गिरनेवाले देवताओं के सुख की तो उससे तुलना ही कैसे की जा सकती है ? “या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किन्त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ॥” (भाग० ४।९।१०) अतः यह कहना नितान्त अशुद्ध और पाप है—“यदि व्यास ने अपने उसी जन्म में महाभारत के बाद श्रीमद्भागवत की रचना करके अपनी भूल का परिमार्जन किया था, तो वाल्मीकि ने तुलसी के रूप में जन्म लेकर अपनी धारणा को संशोधित रूप दिया है। वाल्मीकिरामायण में ऐतिहासिक दृष्टि की प्रधानता थी । इसके स्थान पर रामचरितमानस भावनात्मक दर्शन को साकार रूप प्रदान करता है। इसके वर्ण्य भगवान् श्रीराम हैं।” ऐसे लोगों के लिए ही भगवान् शङ्कर उमाजी से कहते हैं— “बातुल भूतबिबस मतवारे । ते नहिं बोलहि बचन सँभारे ॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना ॥” (रा० मा० १।११४।४) श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी स्वयं कपीश्वर हनुमान्जी के समान ही कवीश्वर वाल्मीकि को विशुद्ध विज्ञान- वाले मानते हैं और सीताराम-गुणग्राम-पुण्यारण्य विहारी मानकर दोनों की एक साथ वन्दना करते हैं— “सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥” (रा० मा० १। मङ्गलाचरण ४) इसी प्रकार महर्षि व्यासजी की वन्दना करके गोस्वामीजी उनसे मनोरथ-पूर्ति की कामना करते हैं— “व्यास आदि कविपुङ्गव नाना । जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ॥ चरनकमल बन्दौ तिन्ह केरे। पूरहु सकल मनोरथ मेरे ॥” (रा० मा० १।१३।१,२) फिर उनकी भूल सुधार या उनकी पुरानी धारणा का तुलसीदास द्वारा संशोधन मानना घोर पाप है। इसे तुलसीदास कभी भी सहन नहीं कर सकते । वे स्वयं कहते हैं—जैसे किसी नृप द्वारा निर्मित सेतु के सहारे पिपीलिका (चींटी) बिना श्रम के नदी पार कर जाती है, वैसे ही व्यास, वाल्मीकि मुनिराजों से निर्मित रामायण का सहारा लेकर हम लोग भी रामचरित्र वर्णन का रस प्राप्त कर लेते हैं— ९४