रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४६ रामायणमीमांसा एकविंश “अति अपार जे सरित बर, जौ नृप सेतु कराहिं । चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु, बिनु श्रम पारहिं जाहिं ॥” ( रा० मा० १।१३ ) यह लिखा जा चुका है कि वाल्मीकिरामायण के एक-एक अक्षर से ब्रह्महत्या का पातक दूर होता है, यह व्यास भगवान् ने कहा है । वाल्मीकिचरित में नाभादास ने भी यही स्वीकार किया है । अतः रामायण का रावणचरित भी रामचरित्र का अङ्ग होने से पवित्र एवं पापनाशक है । रामायण के अनुष्ठानों में सभी श्लोकों को मन्त्र मानकर संपुटित पाठ किया जाता है । तुलसी जिन्हें विशुद्ध-विज्ञान कहते हैं, उन्हीं को तुलसीदास के भक्त बननेवाले “मानसप्रवक्ता” भ्रान्त कहते हुए लज्जित नहीं होते, यह आश्चर्य है । वस्तुतः रामचरितमानस जैसी ही वस्तु अध्यात्मरामायण है । तुलसीदास ने अधिकांश उसी का अनुसरण किया है । अध्यात्मरामायण के अनुसार ही तुलसी ने इतिहास की गौणता और श्रीराम के ऐश्वर्य-विशिष्ट चरित्र का चित्रण किया है । उसके अनुसार शिव-पार्वती-संवाद के रूप में रामचरित्र प्रस्तुत किया है; फिर तो यही कहना ज्यादा सङ्गत है कि अध्यात्मरामायण द्वारा वाल्मीकि की धारणा का संशोधन किया गया, परन्तु यह सब भी निःसार ही है; क्योंकि सभी रामचरित्रों के प्रामाण्य की कसौटी वाल्मीकिरामायण ही है । इसी लिए महाभारत की भावदीप टीका के रचयिता ने रामचरित्रों में वाल्मीकिरामायण का ही परम प्रामाण्य मानकर उसी के अनुसार महाभारत के रामचरित्र का अर्थ किया है । महाभारत में लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण का वध वर्णित है । उसे उन्होंने यों कहकर समाहित किया कि लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण मृतप्राय हो गया था किन्तु वध तो वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम द्वारा ही मानना उचित है । ठीक ही है, महर्षि वाल्मीकि ने ब्रह्माजी के आदेशानुसार समाधि द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण, श्रीसीता आदि सभी रामायण के पात्रों का चरित्र हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि का प्रत्यक्ष अनुभव करके वर्णन किया है । संवाददाताओं के तारों व टेलीप्रण्टरों के अनुसार या सुनी-सुनायी कथाओं के अनुसार नहीं लिखा है। अतः ऐतिहासिक तथ्य न होने पर तो कोई भी रामायण या महाभारत या भागवत केवल गप्प या उपन्यासमात्र रह जायगा । इसलिए रामचरितमानस के राम एवं उनके चरित्र की तथ्यरूपता या सच्चाई का आधार वाल्मीकिरामायण ही है । कहा जाता है कि “व्यास और तुलसीदास दोनों ही श्रीकृष्ण और श्रीराम को इतना ठोस मानते हैं कि उनकी तुलना में उन्हें सारा इतिहास मिथ्या प्रतीत होता है ।” परन्तु यह कहना असङ्गत है, क्योंकि इसका अर्थ यह है कि राम और कृष्ण वेदान्तवेद्य पारमार्थिक सत्य हैं और इतिहास आदि मिथ्या है। यदि यही बात है तो क्या राम और कृष्ण के चरित्र आदि भी मिथ्या हैं ? यदि इतिहास और चरित्र दोनों ही मिथ्या हैं तो भी उस पूर्वोक्त कथन का क्या अर्थ है ? राजा आदि की कथाएँ मिथ्या हैं, राम और कृष्ण की कथाएँ सत्य हैं, तो इस कथन में क्या आधार है ? वेदान्त का एक अंश लेकर एक अंश छोड़ देना तो अर्धजरतीय न्याय ही होगा । महानुभाव ! यदि आप इतिहास-पुराणों का प्रामाण्य न स्वीकार करेंगे और राम, कृष्ण आदि के जन्मों तथा चरित्रों को ऐतिहासिक तथ्य न मानेंगे तो लेने के देने पड़ जायेंगे । यह भी कहना गलत है कि “श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों इस पृथ्वी पर स्थूलरूप में काल-विशेष में अवतरित होते हैं, किन्तु उनका जन्म नहीं होता । यद्यपि तत्कालीन अधिकांश व्यक्तियों ने उन्हें साधारण बालकों की भाँति ही जन्म लेते हुए देखा था ।” यह सब भी अनर्गल प्रलापमात्र है । यदि भगवान् का जन्म नहीं होता, तो उनके जन्म और कर्म के चिन्तन, वर्णन का महत्त्व ही क्यों है ? गीता तो स्पष्ट कहती है जो मेरे ( भगवान् के ) दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्वतः जानते हैं, वे जन्म तथा कर्म के बन्धनों से मुक्त होकर मुझ ( भगवान् ) को प्राप्त करते हैं—