रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७४७ “जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।। ( गीता ४।९ ) गीता में भगवान् यह भी कहते हैं कि मैं अज, अव्यय एवं सब भूतों का ईश्वर होकर भी अपनी सच्चिदा- नन्दलक्षणा प्रकृति का आश्रयण कर के माया कृपा शक्ति से उत्पन्न होता हूँ— “अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ।। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।। ( गीता ४।६-८ ) तुलसीदासजी महाराज ठीक इसी प्रकार कहते हैं— “जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।। तब तब धरि प्रभु बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जनपीरा ।। (रा० मा० १।१२०।३-४) “असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुतिसेतु । जग बिस्तारहिं बिसद जस रामजन्म कर हेतु ।।'' ( रा० मा० १।१२१ ) “रामजनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तें एका ।। जनम एक दुइ कहउँ बखानी । सावधान सुनु सुमति भवानी ।। (रा० मा० १।१२१।१,२) “एक जनम कर कारन एहा । जेहि लगि राम धरी नरदेहा ।।” ( रा० मा० १।१२३।२) “जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल । चर अरु अचर हर्षजुत रामजनम सुखमूल ।।” ( रा० मा० ३।१९० ) “जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं ।” ( रा० मा० १।३३।३ ) इससे अधिक भगवान् के जन्म में क्या प्रमाण हो सकता है । आखिर शरीर धारण ही तो जन्म है । जीव भी तो देह ही ग्रहण कर जन्म लेता है । वस्तुतः देखा जाय तो जीव भी अजन्मा ही है— “न जायते म्रियते वा कदाचित् ।” ( गीता २।२० ) जीव के लिए भी कहा गया है कि वह कभी “जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमंते, अपक्षीयते, विनश्यति” इन षड्विध भाव-विकारों से संसृष्ट नहीं होता । भेद यही है कि जीवों के भौतिक शरीर होते हैं और ईश्वर अपनी दिव्य लीलाशक्ति के योग से सच्चिदानन्दमय दिव्य श्रीविग्रह धारण करते हैं । अविद्या वश जीव अल्पज्ञ एवं अल्पशक्ति होता है और परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, नित्य तथा शुद्धबुद्ध-मुक्तस्वभाव होते हैं । उनका श्रीविग्रह प्रकटरूप से अमुक-अमुक देश और काल में अनुभूत होता है, अप्रकट रूप से वह नित्य एवं विभु भी है । “यथा अनेक वेष धरि, नृत्य करइ नट कोइ । सोइ सोइ भाव देखावइ, आपु न होइ न सोइ ।। ( रा० मा० ७।७२ ) इस दोहे का यह अर्थ नहीं कि ऐतिहासिक दृष्टि के राम से भिन्न ही कोई राम तुलसी को अभीष्ट थे । किन्तु इसका अर्थ इतना ही है कि राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि अनेक रूपों में वेदान्त-वेद्य परब्रह्म का प्रादुर्भाव होता है ।