भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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यह भी कहना ठीक नहीं कि “रङ्गमञ्च पर अभिनेता के रूप में जो क्रियाएँ की जाती हैं, उनके द्वारा उनके चरित्र की आलोचना नहीं की जाती केवल अभिनय के उद्देश्य पर ही दृष्टि रखी जाती है।” क्योंकि अभिनय भी मनमानी नहीं किया जाता। उसके लिए भी नाट्यशास्त्र का आश्रयण करना पड़ता है। अप्रामाणिक अभिनय कभी भी लक्ष्यसिद्धि का साधक नहीं होता है। भगवान् राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं। श्रीभागवत के अनुसार भी उनका अवतरण मर्त्यशिक्षण के लिए होता है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ॥” ( भाग० ५।१९।५) वाल्मीकिरामायण या अध्यात्मरामायण या रामचरितमानस की दृष्टि से राम के चरित्र मानवों के लिए आदर्श हैं। वेदादि-शास्त्रों ने मानव-जीवन का जो विधान बताया है, उसे कार्यान्वित कर के आदर्श रूप उपस्थित करना बहुत कठिन और महत्त्वपूर्ण काम है। इसी लिए इस कठिन काम को राम ने उठाया और निभाया। कर्म क्या हैं, कैसे हैं, उनका कैसे और कौन कब अनुष्ठान करें ? उसे गीता स्पष्ट शब्दों में कहती है कि जो शास्त्रविधि का उल्लङ्घन करके यथेष्ट चेष्टा करता है उसे सिद्धि, परा गति कुछ भी नहीं मिलती— “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” ( गीता १६।२४ ) अतः हर एक कर्तव्य और अकर्तव्य को शास्त्र के अनुसार जानकर ही कर्म करना उचित है। गोस्वामी तुलसीदास भी यही कहते हैं— “बरनाश्रम निज-निज धरम निरत बेदपथ लोग । चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥” ( रा० मा० ७।२० ) “सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्मनिरत श्रुतिरीती ॥”(रा० मा० ७।२०।१) भक्ति के साधन रूप में यही कहा— “निज निज धरम निरत श्रुतिरीती ॥” ( रा० मा० ३।१५।३ ) श्रीकृष्ण ने गीता में भी यही कहा—यदि मैं शास्त्रानुसारी कर्म न करूँ तो ये लोग नष्ट हो जायेंगे और मैं सङ्कर का कर्ता बन जाऊँगा— “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥” ( गीता ३।२४ ) अतएव इस कथन में भी कुछ सार नहीं है कि “भगवान् यदि राम की भूमिका में उतरते हैं तो उनके पार्षद जय-विजय रावण-कुम्भकर्ण की भूमिका में आते हैं। सत्-असत् के शाश्वत संघर्ष को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना ही उसका उद्देश्य था, जिससे व्यक्ति अपने हृदयस्थ रावण को पहचान कर उसके विनाश की प्रक्रिया को जान ले।” क्योंकि उस स्थिति में प्रश्न होगा कि राम-रावण नाम के कोई प्रामाणिक वस्तु हैं या केवल काल्पनिक भावरूप ही हैं ? यदि पहली बात है तब तो ऐतिहासिकता से पिण्ड नहीं छूटेगा, यदि काल्पनिक ही हैं तब तो फिर रावण अपने भीतर की ही कोई दुर्वृत्तियों का पुञ्ज हैं, वैसे ही राम भी सद्वृत्तियों का पुञ्ज ही हैं, फिर राम नाम का जप, रामचरित्र का श्रवण, पठन, पाठ आदि का क्या महत्त्व होगा ? सिद्धान्ततः राम ऐतिहासिक होने पर भी नित्य हैं, क्योंकि वेद के तुल्य ही रामायण तथा महाभारत भी नित्य हैं। इसी लिए वे वेद के उपबृंहण हैं। जैसे प्रतिकल्प में वेदों का प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही महाभारत, रामायण का प्रादुर्भाव होता है। भेद यह है कि वेदों की अक्षरानुपूवीं में कोई परिवर्तन नहीं होता है, किन्तु रामायण तथा महाभारत की आनुपूर्वी में परिवर्तन होता है। परार्थ और सिद्धान्त एक से रहने पर भी अक्षरानुपूवीं में परिवर्तन हो सकता है। भगवान् का गोलोक, साकेत

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