भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 826

में प्रकटरूप से रहना सिद्ध ही है। भगवान् नित्य एवं सर्वत्र सुलभ होने पर भी प्रकटरूप से ऐतिहासिक रूप में ही भगवान् के जन्म और कर्म होते हैं। उन्हीं का वर्णन और श्रवण होता है। उन्हीं से प्राणियों की सद्गति होती है। "ऐतिहासिक दृष्टि से राम का चरित्र देखने पर अनगिनत प्रश्न उठ खड़े होते हैं।" यह कथन जल्पवाद है। केवल सहस्रों प्रश्न खड़े होंगे, इसलिए सत्य का अपलाप कर के भगवान् को एक भावात्मक वस्तु ही मान लेना उचित नहीं, “सति कुड्ये चित्रोल्लेखः” भित्ति होने पर हो चित्र होता है। यदि कोई ऐतिहासिक तथ्य वस्तु है, तभी उसमें आध्यात्मिक कल्पनाएँ भी सङ्गत हो सकेंगी। ऐसा नहीं तो आकाश-चित्रवत् सब कल्पनामात्र ही रह जायेगी और हर प्रश्न का समाधान है ही। "ऐतिहासिक दृष्टि से राम को एक भूतकालीन राजकुमार के रूप में देखना उसी दलदल में फँस जाना है जिससे भक्तों ने हमें उबारने की चेष्टा की है।" इसका उत्तर स्पष्ट है—श्री- राम ऐतिहासिक राजकुमार के रूप में परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे और वे आज भी साकेत धाम में प्रकटरूप से रहते हैं। जहाँ भी भक्त उनका शुद्ध भाव से आह्वान करता है वहीं वे प्रकट होते हैं। इस सम्बन्ध में सम्पूर्ण महाभारत, रामायण तथा पौराणिक साहित्य प्रमाण हैं। किसी भक्त ने कहीं भी यह नहीं कहा कि श्रीराम दशरथ के यहाँ राजकुमाररूप से प्रकट नहीं हुए थे। तुलसी तो मानते हैं— "जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहि मुनि ध्यान । सुइ दसरथसुत भगतहित कोसलपति भगवान् ॥” (रा० मा० १।११८) इतना ही नहीं निर्गुण निराकार ब्रह्म के समान ही सगुण साकार ब्रह्म भी सर्वव्यापी होता है। इस विषय पर जीवगोस्वामी प्रभृति आचार्यों ने बहुत-कुछ लिखा है। अतः राम का ऐतिहासिक स्वरूप मानना दलदल में फँसना नहीं है, किन्तु वैसा न मानना ही नास्तिकता के दलदल में फँस जाना है। कहा जाता है कि "आजकल ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं, जो श्रीराम को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर दुर्भावनाओं की सृष्टि में संलग्न हैं। कुछ लोग इसमें उत्तर और दक्षिण का सङ्घर्ष देखते हैं। यह आर्य और द्रविड़ के सङ्घर्ष के रूप में देखा जा रहा है। दक्षिण में यह बहुत प्रचलित तथ्य बनता जा रहा है कि उत्तर ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। आर्य राम ने द्रविड़ रावण को परास्त किया। भूत काल का बदला अब श्रीराम के चित्रों से लेने की चेष्टा की जा रही है।" श्रीरामचरित्र को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर दुर्भावनाओं की सृष्टि में जो लोग लगे हैं, वे वेदादि- शास्त्रों का प्रामाण्य नहीं मानते। रामायण का भी प्रामाण्य नहीं मानते, उनको आप तो क्या ! कोई भी नहीं मना सकता है। किन्तु जो रामायण पढ़ेगा, उसका प्रामाण्य स्वीकार करेगा, वह कभी राम-रावण के सङ्घर्ष को आर्य- द्रविड़ का सङ्घर्ष नहीं कह सकता, क्योंकि वाल्मीकिरामायण से ही सिद्ध है कि रावण महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और विश्रवा का पुत्र था। मानस में भी कहा गया है—'उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती।' (रा० मा० ६।१९।२) वह वैदिक ब्राह्मण था। पुलस्त्य आदि वैदिक आर्य थे, अनार्य नहीं थे। श्रीराम भी वैदिक आर्य थे—"आर्यः सर्वसमश्चैव''''।'' हाँ, वह (रावण) असुरों और राक्षसों की भावनाओं का पोषक था और स्वयं माता के सम्बन्ध द्वारा उनसे सम्बन्धित था। वस्तुतः भगवान् का पार्षद था और भगवान् की इच्छा से ही उनकी युद्ध की चिक्रीडिषा की पूर्ति के लिए सनकादि के शाप के व्याज से रावण रूप में अवतीर्ण था। यह सब रामायणप्रामाण्य से ही सिद्ध है। यदि रामायण का प्रामाण्य अमान्य है, तो न तो आपके भावात्मक राम सिद्ध होंगे और न रावण सिद्ध होगा। क्योंकि आधुनिक इतिहास में उनका अस्तित्व है ही नहीं। आधुनिक ऐतिहासिक एवं प्रागैतिहासिक काल सब ६ हजार वर्ष के भीतर का ही है; उसमें न राम हैं और न रावण है। अतएव यह सब निर्मूल है कि "उत्तर ने

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