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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 827

७५० रामायणमीमांसा एकविंश दक्षिण पर आक्रमण किया । आर्य राम ने द्रविड़ रावण को परास्त किया । भूतकाल का बदला श्रीराम के चित्रों से लेने की चेष्टा की जा रही है ।” क्योंकि रामायण की दृष्टि से वैसा सिद्ध नहीं है । अन्य प्रामाणिक इतिहास भी वैसा नहीं है । आपका यह कहना कि “वर्तमान युग की राजनीति को उसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है—सावधान ! वही इतिहास फिर लौटने न पावे । मिथ्या उन्माद की सृष्टि करके राजनीतिक-लाभ प्राप्त करने की चेष्टा की जा रही है ।” परन्तु इस उन्माद का समाधान है, ऐतिहासिक वस्तुस्थिति का सम्यक् प्रचार, न कि पलायनवाद । याद रहे । आप कितना भी कहें कि राम-रावण ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं, किन्तु वे आध्यात्मिक सत्-असत् के प्रतीक हैं तो भी राम का पुतला जलाना बन्द नहीं करेंगे । उनका स्पष्ट कहना है कि आप लोग रामलीला करना कराना बन्द कर दो । क्या आप यह स्वीकार करेंगे ? काशी में श्रीतुलसीदासजी के समय से ही रामलीला प्रचलित है और उस पराधीनता के युग में जब कि हिन्दुओं का अपना कोई राजा नहीं था । उस समय रामलीला के जादू से लोगों के मुर्दार मन में उत्साहित जीवन आया था और सभी बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष गरज कर बोलते थे--बोलो राजा रामचन्द्र भगवान् की जय । आज भी वह गर्जन की परम्परा सुरक्षित है ही । वे स्पष्ट मानने लगे थे कि वास्तव में हम स्वतन्त्र हैं । हमारा राजा रामचन्द्र ही हैं और नहीं । यदि आप जैसे लोग रामलीला बन्द भी कर दें, तो उनका यह भी आग्रह होगा कि आप राम-रावण की कथा भी बन्द करो । अन्त में वाल्मीकिरामायण और मानस की पुस्तकों को जप्त करायेंगे और प्रत्यक्ष उनकी होली खेलेंगे । अतः पलायनवाद समाधान नहीं है । हम मन्दिरों में शङ्ख-घड़ि- याल बजाते हैं । बहुत लोगों को बहुत बुरा लगता है और कुत्ते बेचारे तो रोने ही लगते हैं । क्या करें, बन्द कर दें घण्टा, घड़ियाल और शङ्ख बजाना, बन्द कर दें पूजा करना ? इसी तरह यह भी कहना निरर्थक है कि “उत्तरभारत में भी राम निर्विवाद नहीं हैं । एक ओर तो उन्हें वर्ण-व्यवस्था के आधार पर आलोचना का विषय बनाया जा रहा है । राम शूद्रविरोधी और ब्राह्मणवादी हैं । इससे लगता होगा कि ब्राह्मण तो उनके समर्थक होंगे ही; किन्तु कई ब्राह्मणपुङ्गव कहते हैं कि क्षत्रिय राम के समक्ष भगवान् परशुराम की पराजय और स्तुति कराकर तुलसीदास ने अनर्थ कर डाला । कई लोग राम-रावण के युद्ध को ब्राह्मण-क्षत्रिय के संघर्ष के रूप में देखते हैं । हो सकता है आगे चलकर श्रीराम को ब्राह्मण-द्वेषी सिद्ध किया जाय ।” उक्त सभी बातें रामायण के विरुद्ध ही हैं । अगर रामायण का प्रामाण्य मान्य नहीं, तो राम होना ही असिद्ध है । यदि रामायण का प्रामाण्य मान्य है तो उसके अनुसार श्रीराम एक निष्पक्ष वेदादिशास्त्रानुसारी सम्राट् के रूप में अवतीर्ण परब्रह्म थे । वे धर्मविरुद्ध आचरण करने पर रावण जैसे ब्राह्मण को भी प्राणदण्ड दे सकते हैं तो किसी धर्मविरुद्ध शूद्र को भी प्राणदण्ड दे सकते हैं । अतएव वसिष्ठादि ब्राह्मण और निषादराज, कोल, भिल्ल और किरात ही क्यों बन्दर, भालू, गीध, कौए आदि भी राम के अनन्य उपासक थे । -आज भी रामलीलाओं में स्त्री-पुरुष, बाल- वृद्ध, ब्राह्मण-शूद्र सभी सम्मिलित होकर अपने निष्पक्ष सर्वहितकारी राजा रामचन्द्रजी महाराज की जय-जयकार करते हुए उनके रथ को खींचते हैं । उनके विमान में कन्धा लगाकर धन्य-धन्य होते हैं । राम-परशुराम की कथा शास्त्र- प्रामाण्यवादियों की दृष्टि में वस्तुस्थिति है, अपमान का वहाँ प्रश्न ही क्या है ? पुराणों के अनुसार एक भगवान् विष्णु ही राम हैं । विष्णु के ही अंश परशुराम हैं । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम “ब्राह्मणानामुपासिता” ब्राह्मणों के उपासक हैं । श्रीतुलसी के अनुसार श्रीराम विप्रपदपूजा का कवच पहनते हैं— “कवच अभेद विप्रपद पूजा ।” (रा० मा० ६।७९।५) और उनकी भक्ति का मुख्य आधार ही विप्रचरणप्रीति है— “प्रथमहिं बिप्रचरन अति प्रीती ।” (रा० मा० ३।१५।३)