रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 828, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५१ हाँ, पलायनवाद की नीति में भले ही ऐतिहासिक राम से पिण्ड छुड़ाकर कोई काल्पनिक राम का गुणगान करो तो भी वेदादि शास्त्र न माननेवालों का मन आप बदल नहीं सकते । संसार में लोग रामायण की कथा को एक सत्य घटना मानकर ही उसके अनुसार परमात्मा का श्रीरामरूप में अवतरण मानते हैं और उनके चरित्रों के सुनने में पुण्य-प्राप्ति है, अतः उससे लाभ उठाते हैं । वस्तुतः ऐतिहासिक दृष्टि से भगवान् राम के चरित्र की समीक्षा से घबड़ाने की बात नहीं है। राम अनादि अनन्त ब्रह्माण्ड में भी हैं और सब व्यक्तियों के अन्तरात्मा हैं। फिर भी अवतार की दृष्टि से वे व्यक्ति भी हैं। सर्वरहित एवं सर्वस्वरूप हैं तो भी वे धर्मसंस्थापन के लिए अवतीर्ण थे, अतः उस धर्म का पालन करते थे। साथ ही वे एक धार्मिक सम्राट् एवं वैदिक धर्म के रक्षक थे । वे आर्य, अनार्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र न होते हुए भी अवतार की दृष्टि से क्षत्रिय थे । उन्होंने कहा— “हम क्षत्रिय मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं ॥” (रा० मा० ३।१८।५) "राम जाति-पाँति नहीं मानते थे ।” यह कहना सत्य का अपलाप करना है। जब वे धर्म-संस्थापनार्थ आये थे और वैदिक धर्म जातिमूलक ही है, तब यह कैसे हो सकता है कि राम जाति-पाँति न मानें । “मानउँ एक भगति कर नाता ।” (रा० मा० ३।३४।२) का यही अर्थ है कि किसी भी जाति का व्यक्ति उनको भजकर कृतार्थ हो सकता है। भक्ति न होने पर जाति, पाँति, कुल, धर्म सब व्यर्थ होते हैं। किन्तु भक्ति के साथ वे वैसे ही महत्त्वपूर्ण होते हैं जैसे अङ्क रहने पर शून्य का गौरव होता है। कोई भी समझदार शून्य को निरर्थक नहीं कह सकता, क्योंकि शून्य अङ्क बिना शून्य हैं पर अङ्क रहने पर दशगुना विस्तार के हेतु होते हैं। इसी अर्थ में यह पंक्ति कही गयी है— “भगतिहीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥” (रा० मा० ३।३४।३) कहा जाता है कि-- “सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई । केवट मीत कहे सुख मानत वानर बन्धु बड़ाई ॥” कहा जाता है कि “ब्राह्मणों को समादर देते हैं पर आनन्द उन्हें तभी आता है जब केवट उन्हें मित्र कह कर पुकारता है ।” परन्तु इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि राम जाति पाँति नहीं मानते । “नीचहूँ सो करत प्रीति....।” इस पद्य से तो स्पष्ट है कि राम जाति मानते थे क्योंकि उक्त पद में जातिवाचक शब्द का संप्रयोग है । रही बात प्रीति की सो जाति प्रेम में बाधक नहीं है। इसी लिए तो राम उच्च कुल के होते हुए भी नीच, कुजाति वालों से प्रेम करते थे । यह उनकी महत्ता है। गीध, शबरी, वानर, भालू, कोल-भील, किरातों से भगवान् राम प्रेम करते हैं, उनके मित्र हैं, इन बातों में विवाद नहीं है; परन्तु— 'बरनाश्रम निज निज धरम निरत वेदपथ लोग । चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहि भय सोक न रोग ॥” ( रा० मा० ७।२०) यह वाणी श्रीराम को अस्वीकृत है क्या ? कहा जाता है कि “ऐतिहासिक दृष्टि से राम के चरित्र को देखने से अनेक प्रश्न खड़े होते हैं ।” यही क्यों परमेश्वर पर क्या कम विवाद है ? जैनों और बौद्धों का बहुत बड़ा समाज है । उनकी दृष्टि में जगतकारण ईश्वर मानना भी अनेक मूर्खताओं में से एक है । सांख्य और मीमांसकों की दृष्टि में भी ईश्वर की समालोचना की गयी है । इस तरह क्या आस्तिक ईश्वर मानना छोड़ देंगे ? संसार में लोग अपने-अपने विश्वास एवं धारणाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न मत रखते हैं, तो भी ईश्वरवादी अपनी-अपनी भावना के अनुसार ईश्वर की भक्ति करते ही हैं। वैसे ही