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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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७५२ रामायणमीमांसा एकविंश

ऐतिहासिक दृष्टि से लोगों की समालोचनाओं के रहते हुए भी श्रीराम का ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक रूप भी मान्य है। वाल्मीकि तथा व्यास के द्वारा रचित रामायण, महाभारत, पुराण, संहिता, तन्त्र, आगम एवं मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद्, वेद के आधार पर ही राम व्यापक परमात्मा और ऐतिहासिक अवतारी भी हैं। उनकी विस्तृत कथा का आधार वाल्मीकिरामायण ही है। कोई भी कथा प्रामाणिक होने पर आदरणीय हो सकती है। श्रीराम वानरों के मित्र थे, शबरी के फल खानेवाले हैं। निषादराज के मित्र हैं। उनका गीध तथा भुशुण्डि से भी सम्बन्ध था, यह सब यदि ऐतिहासिक नहीं है, तब क्या कल्पनामात्र है ? याद रहे, अपौरुषेय-वेद एवं तन्मूलक आर्ष वचनों के आधार पर ही श्रीराम एवं उनके मित्र सिद्ध होगें, अन्यथा निर्मूल गल्पमात्र सब बात समझी जा सकती है। किसी साधु-सन्त, महात्मा या वक्ता तथा कल्पक की कल्पना कल्पना ही रह जायेगी। तुलसीदास की रामायण भी उनकी अपनी कल्पना नहीं है। उन्होंने “नानापुराणनिगमागम” के आधार पर ही रामचरित गाया है। वे वाल्मीकिरामायण के सेतु द्वारा ही रामचरित का रसास्वादन करते हैं। यदि वाल्मीकिरामायण की उपेक्षा करनेवाला कोई भी हो निश्चित ही तुलसी एवं उनके राम का भक्त नहीं हो सकता। यह ठीक है कि “तुलसी के राम प्रत्येक देश, काल और व्यक्ति के हैं। उन्हें देश, काल तथा जाति की संकीर्ण परिधि में नहीं बाँधा जा सकता है। अनाथ तुलसी इन्हीं राम का आश्रय पाकर धन्य हुए थे।” परन्तु वे राम क्या दशरथनन्दन नहीं थे ? क्या वे कौशल्यानन्दवर्धन नहीं थे ? वस्तुतः कौन कहता है कि दशरथनन्दन ऐतिहासिक राम ईश्वर नहीं, वे प्रत्येक देश एवं काल के नहीं हैं ? वे सब देश तथा सब काल के होते हुए भी ऐतिहासिक भी हैं। अयोध्या ऐतिहासिक नगरी थी। सूर्यवंशी राजा दशरथ उसके सम्राट् थे। वसिष्ठजी उनके पुरोहित थे। उनके प्रयत्न से सर्वव्यापी राम उनके पुत्ररूप में प्रकट हुए थे— जग निवास प्रभु प्रगटे अखिललोक विश्राम।” (रा० मा० १।१९१) इस ऐतिहासिक तथ्य का अपलाप करने से ईश्वर राम की भक्ति भी असम्भव हो है। निर्गुण निराकार राम को सगुण साकार रामरूप या श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होने के लिए और अपनी लीलाओं का रसास्वादन कराने के लिए भी किसी देश और काल में किसी माता-पिता से प्रकट होना पड़ता है। लीलाओं के लिए भी अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों का उपयोग करना पड़ता है। इसी लिए तो “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति” के अनुसार “जब जब होइ धर्म कै हानी” तब तब भगवान् का प्रादुर्भाव माना जाता है। यह कहना सङ्गत नहीं है कि “व्याकरण शब्दानुशासन है। वह व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति शब्दा- नुशासन के लिए। व्याकरण जब एक भवन की भाँति होता है। तब वह भाषा को सुरक्षा प्रदान करता है। किन्तु उसका अतिरेक व्याकरण को कारागार बना देता है। जहाँ भाषा का सहज स्वरूप समाप्त होकर केवल कृत्रिमता शेष रह जाती है।” (मा० मु० ३) क्योंकि व्याकरण तो अपशब्दों से साधु शब्दों का विश्लेषण करता है। वही शब्दों का संस्कार है। शब्दों के सहज स्वरूप की अभिव्यक्ति व्याकरण के द्वारा होती है। सूत्रों से प्रकृति और प्रत्ययों द्वारा शब्द-संस्कार की पद्धति केवल बाल-व्युत्पादनार्थ है। शब्द तो नित्य ही हैं। यदि शब्द का निश्चित स्वरूप न होगा तो उसके रूपान्तरण की कोई सीमा न रहेगी। फिर तो उसका अर्थसम्बन्ध भी न रह सकेगा। ऐसी स्थिति में अन्य भाषाओं के समान संस्कृत शब्दों का रूपान्तरण होने से कालान्तर में उनका ज्ञान भी असम्भव हो जायगा। नियमित रूप होने का ही परिणाम है कि लाखों वर्ष पुराने वाल्मीकिरामायण का अर्थ आज भी समझा जा सकता है। परन्तु जिन भाषाओं का रूप बदल जाता है उनका अर्थ पचास वर्षों में ही दुर्ज्ञेय हो जाता है।

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