रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 830, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस सम्बन्ध में पूर्ण परिचय न हो उचित है कि उस सम्बन्ध में प्राणी अनधिकार चेष्टा न करे । पृ० २३ मानसमुक्ता का सारा प्रसङ्ग काल्पनिक एवं आभासमय है । “भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥” वस्तुतः भवानी और शङ्कर दोनों ही नित्य वस्तु हैं । शङ्कर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिपति परमेश्वर हैं । भवानी अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्ति हैं । केवल ब्रह्म की उपासना नहीं बनती, किन्तु शक्तिविशिष्ट ब्रह्म एवं साधिष्ठाना शक्ति की ही पूजा होती है । स्वरूपतः दोनों ही एक हैं । साधिष्ठाना शक्ति एवं शक्तिमद् ब्रह्म का एक ही अर्थ होता है । इसी लिए जैसे श्रीतुलसीदास ने—'नमामीशमीशान' आदि स्तोत्र में शिवजी को ब्रह्मरूप कहा है वैसे ही पार्वती के लिए भी—"भव भव विभव पराभवकारिणि" कहकर उन्हें भी ब्रह्मरूप ही कहा है, क्योंकि “जन्माद्यस्य यतः” (ब्रह्मसूत्र १।१।२) के अनुसार जो सम्पूर्ण जगत् का उत्पादक, पालक और संहारक है वही ब्रह्म है । जैसे राम और कृष्ण दोनों ही में ब्रह्म के लक्षण सम्पूर्ण हैं वैसे ही शिव और पार्वती दोनों में ब्रह्म के सम्पूर्ण लक्षण हैं । वही बात सीता-राम और राधा-कृष्ण के सम्बन्ध में जाननी चाहिये । जैसे एक नट अनेक रूपों में रङ्गमञ्च पर आता है वैसे ही वेदान्तवेद्य परब्रह्म अनेक रूपों में आता है । ब्रह्म का ऊँचा से ऊँचा जो रूप है वह सीतोपनिषद् में सीता के लिए कहा गया है । सीता या राम, भवानी या शङ्कर दोनों ही निर्गुण निराकार, सगुण निराकार एवं सगुण साकार हैं । यह बात वेदों, उपनिषदों, महाभारत, रामायण, पुराणों एवं तन्त्रों में स्पष्ट है । उन्हीं भवानी और शङ्कर में श्रद्धा और विश्वास का आरोप है : भवानी और शङ्कर के स्वरूप में ही श्रद्धा और विश्वास को महत्त्वपूर्ण मानकर उनका आदर करना चाहिये । वस्तुतः वे दोनों तो नित्य ब्रह्मरूप हैं । किन्तु श्रद्धा तथा विश्वास दोनों ही अन्तःकरण के धर्म हैं । शास्त्रों ने तो गुरु तथा वेदान्त वाक्यों में विश्वास को ही श्रद्धा कहा है फिर भी जैसे भवानी और शङ्कर एक होते हुए भी व्यावहारिक रूप में एक में जननीस्वभाव-सुलभ कोमलता का अधिक प्राधान्य है— ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।" ( अपराधक्षमा० स्तो० ) और दूसरे में ईश्वर के अनुगुण मर्यादा-पालन में दृढ़ता का प्राधान्य है। श्रद्धा में कोमलता का झुकाव अधिक होता है । विश्वास में दृढ़ता, स्थिरता और कठोरता अधिक है । यदि और सूक्ष्मदृशा से देखें तो शिव अग्निरूप हैं तथा भवानी सोमरूप हैं । सोम में कोमलता तथा सरसता है । अग्नि में प्रकाश, उष्णता और दृढ़ता होती है । सारा संसार ही अग्नीषोमात्मक है । संसार की जितनी भी कोमल वस्तुएँ हैं उन सब में सोम का प्राधान्य है । जितनी कठोर वस्तुएँ हैं उनमें अग्नि का प्राधान्य है । उपनिषदों में यज्ञगत जल, दधि, दुग्ध, घृत, सोमरस आदि श्रद्धापदवाच्य कहे गये हैं । उन श्रद्धापदवाच्य पदार्थों से समवेत कर्मों एवं तज्जन्य अपूर्व या अदृष्ट को भी श्रद्धा या अप् शब्द से व्यवहृत किया जाता है । श्रद्धा होने पर ही प्राणी में इष्ट के प्रति झुकाव होता है । जिसके प्रति श्रद्धा होती है उसके प्रति प्राणी का अन्तःकरण, अन्तरात्मा और सिर झुक जाता है । विश्वास से उसमें दृढ़ता आ जाती है । भक्ति में भी द्रवता होती है, कोमलता रहती है । अन्तःकरण को लाक्षा ( लाह ) के समान कठोर द्रव्य माना गया है । वह तापक भावों से द्रवीभूत हो जाता है । स्नेह, काम, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि के सम्पर्क से अन्तःकरण पिघलता है । जैसे पिघली हुई लाक्षा ९५