रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३४ रामायणमीमांसा एकविंश सत्य ज्ञात होता है कि सर्वथा यथार्थ में जीना असम्भव है। इसी लिए वे स्वयं तो आवरण में ही जीते हैं। वस्त्र, भोजन, भाषण इन सबको परिवर्तन के आवरण से आवृत्त करके ही व्यक्ति जीवन को जीने योग्य बनाता है। यथार्थ- वाद के प्रति उसका आग्रह केवल बौद्धिक गोष्ठियों में विवाद के लिए ही दिखायी देता है। वह एक चतुर व्यापारी की भाँति यथार्थवाद को दूसरों के हाथ में बेचकर स्वयं के लिए सुख-सुविधा की सामग्री एकत्र करता है।" यदि उक्त वक्ता को इतिहास और उसके यथार्थवाद का यही स्वरूप इष्ट है, तो स्पष्ट है कि उसने दोनों बातों को नहीं समझा और उसका यह कहना गलत है कि कृष्णद्वैपायन व्यास को सच्चे इतिहासकार के रूप में ही देखना चाहिये, क्योंकि इतिहासकार होने के साथ-साथ वे महान् दार्शनिक और महान् योगी भी थे। उन्होंने "गीता" जैसी वस्तु भी संसार को प्रदान की है, जिससे सारा संसार उपकृत है। उत्कृष्ट कोटि का नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र एवं धर्मशास्त्र प्रदान किया हैं। मोक्षधर्म द्वारा उत्कृष्ट ज्ञान-विज्ञान का भी वर्णन किया हैं। ब्रह्मसूत्र जैसे वेदान्तदर्शन द्वारा उन्होंने औपनिषद ब्रह्म के अपरोक्ष स्वरूपसाक्षात्कार का प्रकार और विधान भी बताया है। वे स्वयं साधक ही नहीं सिद्ध भी थे। फिर उनकी तुलना, उन इतिहासकारों से कैसे की जा सकती है, जो "चतुर व्यापारी की भाँति यथार्थवाद को दूसरों के हाथ बेचकर स्वयं के लिए सुख-सुविधाओं की सामग्री एकत्र करते हैं।" महाभारत एवं अन्य पुराणों की दृष्टि से ही नहीं, श्रीमद्भागवत की दृष्टि से भी महर्षि व्यास ऋतम्भरा प्रज्ञासम्पन्न महान् योगी थे । देवर्षि नारद से उन्होंने स्वयं कहा था— “परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैः स्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ।” ( भाग० १।५।९ ) धर्मानुष्ठानों एवं व्रतों के द्वारा परावर ब्रह्म में मैंने अवगाहन किया है, फिर भी मुझे सन्तोष नहीं है। मेरी इस न्यूनता का जो कारण हो, वह आप कहिये। इसपर नारदजी ने यही कहा कि आपके असन्तोष का कारण यह है कि आपने धर्म आदि अर्थों का जितने विस्तार से वर्णन किया है, वैसा भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं किया— “यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः । न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥” ( भाग० १।५।९ ) इसी कारण नारदजी ने विस्तृत वर्णन किया है— चाहे कितने ही चित्र-पद वाक्य क्यों न हों अगर उनमें श्रीहरि के यश का वर्णन नहीं है तो वे वायसतीर्थमात्र हैं, और जिन काव्यों में भगवान् के यशोङ्कित नामों का वर्णन हो, वे भले असम्बद्ध हों तो भी सज्जन उनका सादर श्रवण, वर्णन और गान करते हैं। भगवत्प्रेमवर्जित नैष्कर्म्य ब्रह्मात्मसाक्षात्कारात्मक ज्ञान भी शोभित नहीं होता । फिर भला भगवत्प्रेम के बिना कर्म का क्या महत्त्व हो सकता है ? श्रीनारदजी स्वयं भगवान् व्यास को सामान्य इतिहासकार न मानते हुए कहते हैं— “अथो महाभाग भवानमोघदृक् शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः । उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ॥” (भाग० १।५।१३) अर्थात् हे महाभाग व्यासजी ! आपकी दृष्टि अमोघ है, आपकी कीर्ति पवित्र है। आप सत्यरत एवं धृतव्रत हैं। आप सम्पूर्ण जीवों की बन्ध से मुक्ति के लिए समाधि द्वारा भगवान् की दिव्य लीलाओं का स्मरण करें और उनका वर्णन करें । क्या अन्य इतिहासकार भी व्यास के समान सत्यरत, धृतव्रत एवं अमोघदृक् हैं ? अन्त में व्यासजी ने भक्तियोग में समाहित हो निर्मल अन्तःकरण से साक्षात् परम पुरुष और माया, जीव तथा भक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव किया और श्रीभागवतसंहिता की रचना की ।