रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 810, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७३३ कहना न होगा कि उक्त विचार भ्रामक एवं भ्रमपूर्ण हैं। वस्तुतः महाभारत कोरा इतिहास नहीं है, किन्तु महाभारत के ब्याज से भगवान् व्यास ने वेदार्थ प्रदर्शित किया है— "भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।" (भाग० पृ० १।४।३०) वस्तुतः रामायण, महाभारत एवं अष्टादश पुराण वेदों के आर्ष भाष्य ही हैं। इतिहास पुरानी घटनाओं का दोहराना मात्र नहीं है, क्योंकि वैसा करना गड़े मुर्दों को उखाड़ने के अतिरिक्त और कुछ न होगा, किन्तु उन्हीं घटनाओं एवं व्यक्तियों का उल्लेख इतिहास कहा जा सकता है जिनके स्मरण से समाज को धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में कुछ सबक सीखने को मिलता हो। इसी लिए तो हरएक घटना ऐतिहासिक घटना नहीं होती और न हरएक व्यक्ति ऐतिहासिक व्यक्ति होता है। वैसा होना सम्भव भी नहीं है। नगरपालिका में नगर में उत्पन्न होनेवाले और मरनेवाले मनुष्यों का उल्लेख होता है, परन्तु नगर में कितने मच्छर उत्पन्न हुए या मरे इसका लेखा-जोखा नहीं होता। क्योंकि वैसा करना संभव नहीं है और सार्थक भी नहीं। ठीक इसी तरह सभी मनुष्यों एवं घटनाओं का इतिहास में उल्लेख नहीं होता है, क्योंकि वैसा सम्भव नहीं और न उससे लाभ ही संभव हैं। यदि संसार भर के एक-एक साल का इतिहास एक ही पन्ने में रखा जाय तो भी आधुनिक ऐतिहासिकों की दृष्टि में सारी दुनियां ६-७ हजार वर्षों की है, परन्तु भारतीय शास्त्रों के अनुसार कुछ कम दो अरब वर्षों की सृष्टि है। सुतरां दो अरब पन्नों का संक्षिप्त इतिहास होगा। फिर उसे कितने दिनों में कौन पढ़ेगा, कब निष्कर्ष निकालेगा और कब उससे सबक सीखेगा ? ऐसी स्थिति में भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार महत्वपूर्ण व्यक्तियों के प्रसङ्ग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतिपादन करना ही इतिहास है। अतएव महाभारत में विस्तृत रूप से धर्म, अर्थ, नीति, काम, मोक्ष आदि का वर्णन है। गीता भी उसी का महत्वपूर्ण अंश है। फिर भी नारदजी का अभिप्राय यह था कि भगवान् के गुणों का वर्णन करने में ही अधिक शक्ति लगानी उचित है। इसी अभिप्राय से शुकदेवजी ने भी कहा कि मैंने जो बड़े-बड़े यशस्वी राजाओं का वर्णन किया है वह विज्ञान-वैराग्य के लिए ही है। उनके वर्णन में कुछ तात्पर्य नहीं है, परन्तु जो उत्तमश्लोक भगवान् के गुणों का वर्णन है उसी का श्रवण करना उचित है वही अमूल्य धन है और उसी से भगवान् में भक्ति हो सकती है। इतिहास सबक सिखानेवाली वस्तु है। पूर्वजों के महत्त्वपूर्ण वृत्तान्तों से शुभ कर्मों के लिए प्रोत्साहन मिलता है और विविध विषयों की शिक्षा मिलती है : "कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् । विज्ञान-वैराग्य-विवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥ यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः । तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ॥" (भाग० १२।३।१४,१५) यह आप मानते हैं कि भगवान् व्यास सच्चे इतिहासकार एवं अपने विषय में तथा अपने पात्रों के सम्बन्ध में निष्पक्ष सत्य वर्णन करने में सर्वाग्रणी हैं। यह भी मानते हैं कि यह एकदम सही हैं— "यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ॥" कहा जाता है—"इतनी उत्कृष्ट रचना के बाद भी व्यास का असन्तोष एक प्रश्नचिह्न बनकर सामने आ जाता है। वह असन्तोष जिसका अनुभव प्रत्येक यथार्थवादी इतिहासकार कर सकता है। प्रश्न यह है कि इतिहास व्यक्ति और समाज को क्या देता है ? स्वयं इतिहासकार की उपलब्धि क्या है ? जो लोग यथार्थ का उद्देश्य केवल यथार्थ ही मानते हैं, वे केवल इस गर्वमात्र से सन्तुष्ट हो सकते हैं, या उसका तात्त्विक समर्थन कर सकते हैं कि उन्होंने सत्य को बिना किसी आवरण के उपस्थित किया है। किन्तु यह तो बौद्धिक विवाद में विजयी बनने का एक कौशल है। विश्व के इतिहास में बड़ा से बड़ा यथार्थवादी भी जीवन को सर्वथा नग्नरूप में नहीं जी सकता है। उसे यह