भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 799

एकविंश अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा जगज्जननी जानकी के प्रति वनमानव द्वारा प्रयुक्त अत्यन्त अशोभन अभद्र शब्दों का उत्तर इसी प्रकार गणेशचन्द्र जोशी मन्वन्तर ने वनमानव महाकाव्य लिखकर जनकजा एवं अशोकवासिनी दो भागों में प्रकाशित किया है, जिसे राजस्थान सरकार ने उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पाठ्यपुस्तकों में सम्मिलित किया है। जनकजाखण्ड के आपत्तिजनक अंश निम्नोक्त हैं। सम्पूर्ण पुस्तक कई प्रयत्न करने पर भी प्राप्त नहीं हुई। पृष्ठ ( १ ) सीता विद्रोहिणी थी न कि पतिपरायणा ५ ( २ ) सीता राम के साथ विवाह से असन्तुष्ट थी १८२—१८४ ( ३ ) राम प्रपंचक थे १६३ ( ४ ) बाल्मीकि और तुलसी खुशामदी थे १६६ ( ५ ) राम दासता के समर्थक थे १६८ ( ६ ) राम को आदर्श कहकर भक्त कवियों ने पाषण्ड का बाजार जोड़ा है १७१ ( ७ ) राम दशरथ के नहीं वरन् वसिष्ठ के वीर्य से उत्पन्न थे १७४ ( ८ ) राम छली थे १७७ ( ९ ) लक्ष्मण सीता के अनुगामी और द्विवर थे १७८ ( १० ) सीता स्वयं रावण के साथ गयी २०७—२०८ ( ११ ) सीता रावण के ही योग्य थी १८८ ( १२ ) सीता रावण को चाहती थी १९२—२०१ ( १३ ) सीता लक्ष्मण की प्रेमिका थी १९२ ( १४ ) सीता वन से लौटने को तैयार न थी १९७ ( १५ ) राम का वनगमन नाटकमात्र था १९५—१९६ ( १६ ) सीता लङ्का में रहने को लालायित थी १९९ ( १७ ) लक्ष्मण सीता पर आसक्त थे २०१ ( १८ ) राम स्तेनवृत्ति के थे २०७—२०८ ( १९ ) सीता जनक की नहीं किसी अन्य की जायी थी ( २० ) लक्ष्मण व रावण में सीता के प्रति प्रेम की प्रतियोगिता थी २१५ ( २१ ) सीता के तीन प्रेमी राम, रावण और लक्ष्मण २१६ ( २२ ) लव लङ्का का वंशज था २२० ( २३ ) सीता की तुलना गधी से २२२ ( २४ ) सीता रावण एवं लङ्का पर मुग्ध थी २६२—२६३