रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 782, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरन्तु उसका आधार इतिहास एवं पुराण होना ही चाहिये । अतः पुराणों तथा संहिताओं के अनुसार कल्पभेद के अनुसार उनकी वास्तविकता को स्वीकार कर ही समन्वय करना उचित है । यही स्थिति सीतात्याग के सम्बन्ध में भी समझनी चाहिये । सामान्यतया लोकापवाद और धोबी के अपवाद में समन्वय हो ही सकता है, फिर भी यह तय है कि धोबी जैसे कुछ इनेगिने लोग ही सीता के निन्दक थे, तो भी राम ने बहुमत का ही नहीं अल्पमत का भी सम्मान करने का उदाहरण उपस्थित किया था । अतएव बहुजनहिताय बहुजनसुखाय जैसे आधुनिक आदर्श वाक्यों की अपेक्षा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय के आदर्श को प्रोत्साहन दिया था । रावण-चित्र आदि की कल्पना किसी अंश में प्रामाणिक होने पर भी सर्वांश में प्रामाणिक नहीं । बाल्मीकिरामायण प्रोक्त सीता के आदर्श के विरुद्ध सभी कल्पनाएँ अप्रामाणिक ही हैं । प्रामाणिक कथाओं का ही समन्वय करना आवश्यक है । अप्रामाणिक कल्पनाओं का तो खण्डन करना ही उचित है । इसी तरह रजस्तमोमयी छाया सीता का त्याग तथा सात्त्विकी सीता का राम के वामाङ्ग में निवास भी विकास की परिणति न होकर वस्तुस्थितिमूलक ही है । और जैसा कि पीछे कहा जा चुका है—चन्द्र-चन्द्रिका, भानु-प्रभा, जल-तरङ्ग, अमृत-माधुर्य एवं आनन्द-माधुर्यसार-सर्वस्व का जैसे विप्रलम्भ हो ही नहीं सकता वैसे ही सीता राम का तो विश्लेषण असंभव ही है । किन्तु जब स्थूलरूप से दोनों विग्रहवान् होते हैं, तभी संयोग और वियोग की कथा भी उपस्थित होती है । उनमें भी छायामयी काल्पनिक या मायामयी सीता का ही त्याग होना सङ्गत है । अचिन्त्यशक्तिसमुद्भूत सच्चिदानन्दमयी सीता का त्याग असंभव ही था, अतः लोकसंग्रहार्थ मायामयी सीता का त्याग ही वास्तविक है । इस स्थिति का माधुर्यलीला में स्पष्टीकरण न होकर ऐश्वर्यलीला में ही वर्णन करना उचित था । अतः पुराणादि में उसका वर्णन है, परन्तु बुल्के उसे नवीन कल्पना बता कर सन्तोष करते हैं । इसमें वे होमर काव्य की हेलन का भी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो अत्यन्त भद्दा एवं असङ्गत है । इसी तरह कुश और लव के चरित तथा कथानिवर्हण की विभिन्नता को भी बुल्के स्वाभाविक विकास का परिणाम मानते हैं और वे समझते हैं कि कुश नाम के आधार पर कुश घास से उसकी सृष्टि की कथा उत्पन्न हुई । परन्तु यह उनकी निराधार ही दुष्कल्पना है । वेदों और शास्त्रों में अन्वर्थ नामों का बहुधा उल्लेख मिलता है । अतः बाल्मीकिरामायण में स्पष्ट उल्लिखित है कि कुश के ऊर्ध्व भाग से मार्जन करने से कुश तथा कुश के अधोभाग ( लव ) से मार्जन करने से लव ये नाम प्रसिद्ध हुए । केवल बुल्के की अटकल से उस आर्ष उल्लेख को अप्रामाणिक मानना सर्वथा असङ्गत है । आगे बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार कुश और लव वाल्मीकि के साथ राम के अश्वमेधयज्ञ की भूमि में पहुँच कर रामायण का गान करते हैं । इनके वहाँ पहुँचने का कारणविशेष नहीं बताया जा सकता है । बाद की रामकथाओं में कुश और लव की वीरता दिखलाने के उद्देश्य से रामाश्वमेध के पूर्व राम-सेना से इनके युद्ध का वर्णन किया गया ।" परन्तु बुल्के का उक्त कथन अत्यन्त निस्सार है । कारण कि पूर्वापर प्रसङ्ग के अनुसार "कारण" स्पष्ट ही है । प्रथम तो बाल्मीकिरामायण से ही स्पष्ट है । रामाश्वमेध में राम ने जैसे अन्य ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों को यज्ञ में निमन्त्रित किया था, वैसे ही वाल्मीकि महर्षि को भी । महर्षि वाल्मीकि उसी यज्ञ में निमन्त्रित होकर गये थे । उनके साथ उनके आश्रमवासी सीता एवं उनके पुत्रों का जाना स्वाभाविक था । इसके अतिरिक्त सीताचरित्र रामचरित्र का निर्माण कर वेदार्थ उपबृंहण तथा जनकल्याण के साथ सीताचरित्र की विशुद्धि भी उद्देश्य था । इसी उद्देश्य से राम के सदृश परम सुन्दर सीतापुत्र कुश और लव को तन्त्रीवादन के साथ रामायण-गान कराया गया था । उनके रामायण-गान प्रचार की योग्यता की परीक्षा भी आश्रम में ली गयी थी । जिसमें वे पूर्णरूप से उत्तीर्ण हुए थे । रामाश्वमेध के प्रसंग से भारत एवं विश्व के सभी श्रेणी के राजर्षि, विविध वर्गों के प्रतिनिधि तथा देवता, राक्षस, ८९