रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 781, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्तान्त का क्रमिक विकास देखकर किसी स्वतन्त्र रामकथा की कल्पना नितान्त निर्मूल सिद्ध होती है । बुल्के का उक्त कथन भी निस्सार है, क्योंकि यह कहा जा चुका है कि ईश्वर के ऐश्वर्यपूर्ण और माधुर्यपूर्ण दो प्रकार के चरित्र होते हैं । प्रथम पक्ष में अलौकिकता तथा दिव्यता का वर्णन बाहुल्येन होता है । द्वितीय पक्ष में लौकिकता का प्राधान्य रहता है । प्रथम पक्ष वैधी भक्ति का विषय होता है एवं द्वितीय पक्ष रागानुगा भक्ति का विषय होता है । वाल्मीकि- रामायण में अधिकांश माधुर्यपूर्ण चरित्र का वर्णन होने से लौकिकता का ही प्राधान्य है । उपनिषदों, पुराणों, संहिताओं तथा अध्यात्म आदि रामायणों में ऐश्वर्यपूर्ण चरित्र का प्राधान्येन वर्णन है । फलतः वाल्मीकिरामायण में सामान्यतया राम को एक आदर्श पुरुष तथा सीता को एक आदर्श नारी के रूप में चित्रित किया गया है । क्वचित् क्वचित् प्रसंगानुसार उनकी ब्रह्मरूपता भी वर्णित है । परन्तु द्वितीय पक्षवाले ग्रन्थों में अलौकिक अंशों का ही प्राधान्येन वर्णन है, अतः उन ग्रन्थों में मायासीता-हरण का वर्णन ठीक ही है । इसके अतिरिक्त रावण आदि का मरण देवताओं और दानवों के द्वारा न होकर नर और वानरों द्वारा ही होता है; इसलिए भी राम, सीता, सुग्रीव, हनुमान् आदि के लौकिक रूप का ही प्राधान्येन वर्णन है । स्वतन्त्र रामकथा न होने पर भी अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग, व्यक्त तथा अव्यक्त रूप, गुण आदि का वर्णन सर्वथा सङ्गत ही है । अतीत घटनाओं एवं वस्तुस्थितियों में तर्कों एवं कल्पनाओं का मूल्य कुछ भी नहीं है, क्योंकि वे वस्तुस्थिति के विपरीत हो सकती हैं। इतिहास एवं देवता, ऋषि आदि के वचन ही मुख्य प्रमाण होते हैं। अतः मायासीता-हरण या राम और सीता की दिव्यरूपता तथा अलौकिकता को भक्तिभावना या आदर्शवाद से प्रेरित कल्पनामात्र कहकर उनको अप्रमाण मानना सर्वथा कलुषित मनोवृत्ति का परिचायक है और आर्ष वचनों का अप्रा- माण्य सिद्ध करने का साहसमात्र है । वाल्मीकिरामायण से अन्य रामकथाओं में भी अधिकांश का समन्वय ही है । सीता, कुश, लव, हनुमान् आदि के जन्म ओर सम्बन्ध की विभिन्नता को लेकर बुल्के क्रमिक विकास की पुष्टि करना चाहते हैं । परन्तु विकास या कल्पनामात्र मानकर तो तत्सम्बन्धी आर्ष प्रमाणवचनों को झुठलाना होगा । विपरीत कल्पनाओं को निस्संकोच अप्रमाण ही मानना उचित है, जैसा कि सीता के जन्म के सम्बन्ध में बुल्के भी मानते है । दशरथजातक के अनुसार राम और लक्ष्मण दशरथ के औरस पुत्र एवं सीता औरस पुत्री थीं । इस तरह सीता राम और लक्ष्मण की सहोदरी बहन थीं । बुल्के कहते हैं कि दशरथजातक की रामकथा न केवल ब्राह्मण-रामकथा का विकृत रूप है वरन् उसका रचनाकाल भी वाल्मीकिरामायण के काल से शताब्दियों बाद ही मानना चाहिये । अतः सीता का दशरथ-पुत्री होना बौद्धों की दुषकल्पनामात्र है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता का अयोनिजा होना ही सिद्ध है । वेदवती-वृत्तान्त का भी उसी के साथ समन्वय दिखलाया गया है । वाल्मीकिरामायण की सामग्री से ही सीता की विभिन्न जन्मकथाओं का विकास हुआ है, यह अंशतः ठीक ही है । भूमिजा या अयोनिजा होने पर भी व्यवहारतः सीता जनकजा तो है ही । रावणात्मजा सीता का आर्ष ग्रन्थों से समर्थन नहीं होता, अतः उसे भी विकृति ही मानना उचित है । हनुमान् की कथा का भी आधार वाल्मीकिरामायण ही है । उनके सम्बन्ध में भी बुल्के की विकासकल्पना निराधार है । पुराणों के अनुसार वे शिवावतार हैं । रामायण से भी अप्रतिषिद्ध होने से वह अनुमत ही है । वे वायु- पुत्र अंजनीनन्दन हैं । शिव से हनुमान् के उत्पन्न होने की बात कल्पना नहीं है, वह पुराणादि सम्मत है । जैसे कार्तिकेय शिवपुत्र होने पर अग्नि ने रुद्रतेज को धारण किया था उसी तरह शिवतेज के वायु द्वारा अञ्जना को प्राप् होने से उनके वातात्मज एवं शिवांश होने में कोई विरोध नहीं रह जाता । सीतातयाग की कथाओं की मिथ्या कल्पना द्वारा रामायण से संगति लगाना वस्तुतः असंगत ही है । कवियों को रसाभिव्यक्ति के लिए सौष्ठव या रोचकता के अनुकूल रूपकों की कल्पनाओं में कुछ स्वातन्त्र्य अवश्य है ।