रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९८ रामायणमीमांसा विंश कर सृष्टि का संहार करना आरम्भ करते हैं तब पृथिवी भयभीत होकर सीता को लोटा देती है। पूर्णकाण्ड के अनुसार सोमवंशी राजाओं के आक्रमण तथा सन्धि के पश्चात् हस्तिनापुर में ब्रह्मा ने राम से वैकुण्ठ पधारने का आग्रह किया। राम ने स्वीकार किया। राम ने एक विशाल सेना के साथ कुश को राजधानी में भेज दिया। मन्थरा तथा धोबी को स्वर्ग जाने की अनुमति नहीं मिली। विभीषण, जाम्बवान् तथा हनुमान् को पृथिवी पर रहने का आदेश मिला। राम विष्णु के रूप में व्यक्त हो गये, सीता लक्ष्मी, लक्ष्मण शेष भगवान् तथा भरत और शत्रुघ्न शङ्ख और चक्र के रूप में परिणत हो गये। वानर देवताओं के शरीर में और अयोध्यावासी अपना शरीर त्यागकर दिव्य देह-धारियों के रूप में सुशोभित होने लगे। कथासरित्सागर (१।१।११२), जैमिनीयाश्वमेध (अ० ३६), पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६७), रामचन्द्रिका (प्रकाश २६), रामलिङ्गामृत आदि के अनुसार कुश और लव युद्ध के बाद सीता राम से मिल कर उनके साथ अयोध्या लौट जाती हैं। तिब्बतीरामायण के अनुसार हनुमान् अन्य वानरों के साथ अयोध्या आने का निमन्त्रण पाकर राम से मिलते हैं। सीता त्याग का वृत्तान्त सुनकर वह वर्णन करते हैं कि किस परिस्थिति में उन्होंने सीता को लङ्का में देखा था। हनुमान् का प्रमाण स्वीकार करके राम सीता को बुला भेजते हैं। जिसपर सीता पुत्रों के साथ लौटती हैं। सेरीराम में सीता की शपथ क्रिया के फलस्वरूप किकवी देवी तथा सब जानवरों को १२ वर्ष तक गूँगा देखकर राम को विश्वास हुआ कि सीता निर्दोष है। अतः वे सीता को अयोध्या लाने के लिए महरीसी कलि के यहाँ चले आये। उन्होंने राम का अभिप्राय जानकर राम और सीता के १४ दिवसीय विवाहोत्सव का आयोजन किया। जिसके अन्त में सीता अपने पुत्रों के साथ राम की राजधानी लौटीं। वहाँ किकवी देवी ने क्षमा याचना की। उससे उसका तथा सब जानवरों का गूँगापन दूर हो गया। पुत्रों के विवाह के बाद राम किसी तपस्वी के पास अयोध्या में तपस्वी जीवन बिताने लगे। चालीस वर्ष तक तपश्चर्या कर के राम परम धाम गये। सेरतकाण्ड में भी सीता-त्याग के बाद सीता और राम का सम्मिलन वर्णित है। लव को उत्तराधिकारी बना कर राम ने सीता, लक्ष्मण और विभीषण के साथ तपोमय जीवन बिताया। अन्त में वानर देवभाव में तथा सीता और राम लक्ष्मी तथा विष्णु के रूप में प्रकट हो गये। रघुनाथ महन्त के अद्भुत रामायण के अनुसार पातालप्रवेश के बाद सीता को अपने पुत्रों को देखने की इच्छा होती है। उन्होंने वासुकि को उन्हें लाने भेजा। वासुकि ब्राह्मण के वेष में बालकों को अस्त्र- विद्या सिखाने का बहाना बना कर उनको सीता के पास ले गये। राम ने उन्हें वापस लाने के लिए हनुमान् को भेजा। हनुमान् स्त्रीरूप धारण कर पाताल में प्रविष्ट होकर रत्नमञ्जरी नामक सीता की सखी कहकर सीता के पास जाने लगे। सीता ने नागों को आदेश दिया कि इस स्त्री को पकड़ लाओ। तब हनुमान् वानररूप से सबको परास्त करते हैं। तदनन्तर उन्होंने सीता से मिलकर लव और कुश को राम के पास ले जाने का निवेदन किया। सीता सहमत हुईं। वे स्वयं सिंहासन पर विराजमान होकर राम के समक्ष भूमि से प्रकट हुईं। राम के हाथों लव और कुश का समर्पण कर सीता यह प्रतिज्ञा कर अन्तर्धान होती है कि प्रतिदिन नित्य क्रिया के पश्चात् आपकी सेवा में उपस्थित हुआ करूँगी। रामकेति एवं रामकियेन के अनुसार लव-कुश-युद्ध के बाद सीता ने दोनों पुत्रों को सौंप दिया। अयोध्या लौटाने का राम का अनुरोध स्वीकार नहीं किया। जब राम ने अपनी मृत्यु का समाचार भिजवाया तब सीता लौट कर राम के शरीर के सामने विलाप करने लगी। तब राम परदे की ओट से प्रकट होकर सान्त्वना देने लगे। तब वे क्रुद्ध होकर नागराज विषण की शरण लेकर पृथ्वी में प्रवेश कर गयीं। हनुमान् ने भी पाताल जाकर सीता से लौटने का अनुरोध किया। सीता ने अस्वीकार कर दिया। अन्त में राम के राक्षस-वध कार्य से सन्तुष्ट हो इन्द्र ने देवताओं की सभा में ईश्वर से राम के विरह का वर्णन किया। ईश्वर ने राम और सीता दोनों को कैलास बुला कर समझाया। राम ने सीता से क्षमा माँगी। अन्त में सीता ईश्वर का अनुरोध मान कर अपने पति के साथ अयोध्या लौट गयीं। इस तरह अनेक कथाएँ बुल्के ने उद्धृत कर रामकथा में अराजकता फैलाने का प्रयत्न किया