रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 774, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९७ में सुग्रीव, विभीषण तथा सभी वानर, ऋक्ष आदि आ पहुँचे और सभी राम के साथ जाने को उत्सुक थे। राम ने सब को अपने साथ जाने को कहा, किन्तु विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मयन्द और द्विविद को कलियुग के अन्त तक रहने का आदेश दिया। दूसरे दिन प्रातः राम सब के साथ सरयूतीर पहुँचे। ब्रह्मा ने प्रकट होकर राम से निवेदन किया कि आप अपने भाइयों सहित विष्णुरूप में प्रवेश करें। राम ब्रह्मा का अनुरोध स्वीकार कर साक्षात् विष्णुरूप में प्रकट हो गये। ब्रह्मा ने रामस्वरूप विष्णु के आज्ञानुसार सब के लिए सन्तानक या साकेत लोक प्राप्त कराया। सबने सरयू के जल का स्पर्श कर अनायास देहत्याग कर साकेत धाम को गमन किया। ब्रह्मा ने यह भी कहा कि पशु-पक्षी आदि जो प्राणी आपका स्मरण करते हुए प्राणत्याग करेंगे सब साकेत लोक में प्रवेश करेंगे। वह सन्तानकलोक ब्रह्मलोक के अत्यन्त अव्यवहित है। सुग्रीवादि जो विशिष्ट देवांश थे वे अपने-अपने अंशों में पहुँच गये। अन्त में स्थावर और जङ्गम सभी सरयू-जल का स्पर्श कर परम धाम को पहुँच गये। ऐसा ही कथानिर्वहण अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रघुवंश आदि में पाया जाता है। भागवतपुराण के अनुसार सीता अपने पुत्रों को वाल्मीकि मुनि के हाथ में सौंप कर राम का ध्यान करती हुई भूमि में प्रवेश करती है। राम यह समाचार सुनकर बहुत दुःखी हुए। अन्य कई कथाओं में सीता के भूमि-प्रवेश को भिन्न-भिन्न रूप दिया गया है। पउमचरियं के अनुसार भी सीता ने अग्नि-परीक्षा से अपने सतीत्व को प्रमाणित किया था। जब राम ने सीता से अयोध्या में रहने का अनुरोध किया तो उन्होंने बाल कटाकर जैन दीक्षा ले ली। क्षुद्र स्वार्थी जैन लोग दीक्षा देने की धुन में सब कथाओं को मनमानी ढंग से विकृत करते हैं। पर्व १०२ में कहा गया है कि रत्नचूल, मणिचूल नामक देवताओं ने राम और लक्ष्मण के प्रेम की परीक्षा लेने के उद्देश्य से लक्ष्मण को राम की मृत्यु का मिथ्या समाचार सुना दिया, जिससे तत्काल लक्ष्मण का देहावसान हो गया। राम के पुत्र लवण और अंकुश लक्ष्मण की मृत्यु से विरक्त होकर तप करने चले गये। राम लक्ष्मण की अन्त्येष्टि करके लवण-पुत्र अङ्करुह को राज्य सौंप कर तपस्वी के रूप में भ्रमण करने लगे। उनके अनुसार राम सब प्रलोभनों को ठुकराकर कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर १७००० वर्ष जीवित रह कर निर्वाण प्राप्त करते हैं। जिनके नाम से संसार को निर्वाण मिलता है, निरीश्वरवादी जैन उन राम के लिए तपस्या द्वारा निर्वाणप्राप्ति की बात करते हैं। इनके द्वारा कल्पित नाम भी इनकी बातों को मिथ्या सिद्ध करते हैं, क्योंकि आज तक ये नाम व्यवहार में आये ही नहीं। ब्रह्मपुराण (अध्याय १५४) के अनुसार अङ्गद और हनुमान् राम के अश्वमेध के अवसर पर अयोध्या पहुँच कर सीता-त्याग का वृत्तान्त सुनकर गोदावरी की ओर प्रस्थान करते हैं। इसपर राम सीता का स्मरण करते हुए अयोध्यावासियों के साथ गोदावरी के तट पर तपस्या करने जाते हैं। बुल्के कहते हैं कि यह पउमचरियं का प्रभाव है। परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि वैदिक पुराण जैन कथाओं से अत्यन्त प्राचीन हैं, यह कहा जा चुका है। ब्रह्मपुराण भी व्यासदेव की ही उक्ति है। सुखान्त कथा उत्तररामचरित के अनुसार राम अपने पुत्रों तथा सीता के साथ अयोध्या लौट आते हैं। क्षेमेन्द्रकृत बृहत्कथामञ्जरी के अनुसार राम वाल्मीकि द्वारा उक्त अपने पुत्र कुश और लव को एवं विशुद्धा दयिता पत्नी को अयोध्या लाये-- "पुत्रौ कुशलवाभिख्यो उक्तौ वाल्मीकिना स्वयम् । तौ प्राप्य रामो दयितां विशुद्धा मानिनाय ताम् ॥” कुन्दमाला के अनुसार भी पृथिवी स्वयं प्रकट हो सीता के सतीत्व का साक्ष्य देकर लुप्त हो जाती है। तत्पश्चात् राम सीता तथा पुत्रों के साथ अयोध्या लौटते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार राम धनुष पर बाण रख