भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 773

६९६ रामायणमीमांसा विंश में पहुँच कर सीता के सतीत्व का साक्ष्य देते हैं। राम जनता को विश्वास दिलाने के उद्देश्य से सीता से अनुरोध करते हैं। सीता अपने सतीत्व का प्रमाण देती हुई कहती हैं—यदि मैं राघव से अन्य पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती हूँ तो माधवी देवी मुझे विवरस्थान प्रदान करे। "याऽहं राघवादन्यं मनसाऽपि न चिन्तये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥" पृथ्वी एक दिव्य सिंहासन पर बैठी हुई भूमि से प्रकट होती है और सीता को अपने अङ्क में लेकर भूमि में पुनः प्रवेश करती है। राम विलाप करते हैं। पृथ्वी से सीता को लौटाने का अनुरोध करते हैं। अन्त में देवगणों के साथ ब्रह्मा आकर राम को उनके परम विष्णुरूप का स्मरण दिलाते हुए सान्त्वना देते हैं और परमधाम में सीता समागम की बात कहते हैं— “राम राम न सन्तापं कर्तुमर्हसि सुव्रत । स्मर त्वं पूर्व्वकं भावं स्मर त्वं जन्म वैष्णवम् ॥” ( वा० रा० ७।९७।१४ ) सीता का भूमि-प्रवेश उत्तरकाण्ड निर्वहण का प्रथम सोपान है। द्वितीय सोपान लक्ष्मणत्याग पर समाप्त होता है। सीता के अन्तर्धान होने के पश्चात् कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी का वैकुण्ठवास होता है। लक्ष्मण के पुत्रों की राज्य-व्यवस्था के लिए अनेक विजय-यात्राएँ होती हैं। लक्ष्मण-त्याग इस प्रकार वर्णित हैँ—काल तपस्वी के वेष में आकर एकान्त में ही बात करना चाहते हैं। राम से प्रतिज्ञा कराते हैं कि जो कोई हम दोनों को बात करते देखे व सुने वह राम द्वारा मारा जाय— “यः शृणोति निरीक्षेद् वा स वध्यो भविता तव ।” ( वा० रा० ७।९८।१३ ) राम लक्ष्मण को द्वार पर खड़े रहने का आदेश देते हैं, एकान्त पाकर काल राम को ब्रह्मा का सन्देश देते हैं कि रामावतार का समय समाप्त हो रहा है। इतने में दुर्वासा लक्ष्मण के पास पहुँच कर तुरन्त राम से मिलने का अनुरोध करते हैं। लक्ष्मण ने बड़ी नम्रता से कहा जो आज्ञा है, मैं पूर्ण करूँगा। राघव कार्यव्यग्र हैं, कुछ क्षण प्रतीक्षा कीजिये। मुनि ने क्रुद्ध होकर कहा, अभी जाकर राम से मेरा आना कहो अन्यथा तुम्हारे देश को, तुमको, राघव को, भरत को और तुम लोगों की सन्तानों को शाप दूँगा। लक्ष्मण-वंशनाश की अपेक्षा अपना ही मरण श्रेष्ठ समझ कर राम के पास अन्दर जाते हैं— “एकस्य मरणं मेऽस्तु माऽभूत् सर्वविनाशनम् ।” ( १०३।१२ ) ( १०५।९ ) बाद में राम अपनी प्रतिज्ञा के वशीभूत होकर लक्ष्मण का परित्याग करते हैं— “विसर्जये त्वां सौमित्रे मा भूद् धर्मविपर्ययः । त्यागो वधो वा विहितः साधूनां ह्युभयं समम् ॥” ( १०७।१३ ) इसपर लक्ष्मण सरयू के तट पर जाकर श्वासरोधकर समाधिस्थ हो गये। फिर सशरीर अपने दिव्य शेषरूप में प्रकट हो गये। इन्द्रादि देवता विष्णु का चतुर्थांश पाकर प्रसन्न होकर लक्ष्मण की पूजा करते हैं (सर्ग १०३ तथा १०६)। लक्ष्मण के वियोग के कारण दुःखी होकर राम ने भरत को राज्य सौंप कर वन जाने की इच्छा प्रकट की। किन्तु भरत ने तथा अयोध्या की प्रजा ने राम के साथ जाने की अनुमति ले ली। तब राम ने पुत्रों को कुशावती तथा श्रावस्ती में राजसिंहासन पर बैठा कर शत्रुघ्न को बुला भेजा। अयोध्या के दूतों से यह जान कर कि राम, भरत एवं प्रजा के साथ परम धाम जाने की तैयारियाँ कर रहे हैं। शत्रुघ्न ने अपने पुत्रों को राज्य देकर अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। राम ने शत्रुघ्न को भी साथ चलने की अनुमति प्रदान कर दी। इतने