रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 772, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९५ पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६०-६४) में राम, लक्ष्मण तथा भरत युद्ध में नहीं आते। सीता अपने सतीत्व के प्रभाव से राम-सेना को जीवित करती है। पौराणिक आख्यानों के आधार पर भी काव्य और नाटकों की कथाएँ समझनी चाहिये। अतः पौराणिक आख्यान सुतरां काव्य और नाटकों से अति प्राचीन हैं। रामकेर्ति के अनुसार सीतापुत्रों ने वाल्मीकि से धनुर्विद्या की शिक्षा पायी थी। किसी दिन अपने बाणों से उन्होंने एक विशाल वृक्ष को नष्ट कर दिया। जिससे अयोध्या में भूकम्प हुआ। ज्योतिषियों ने कहा यह एक महान् राजा की धनुर्विद्या का परिणाम है। उस राजा का पता लगाने के लिए एक अश्व छोड़ा गया। हनुमान्, भरत, और शत्रुघ्न ने उसका अनुसरण किया। सीतापुत्रों ने अश्व को बाँध लिया। हनुमान् को हराकर उनके हाथ बाँध दिये और उनके शरीर पर लिख दिया कि इसका स्वामी इसे खोलेगा। शत्रुघ्न आदि के असफल होने पर अयोध्या जाकर राम की शरण लेनी पड़ी। बाद में हनुमान् सीता के पुत्र को बन्दी बना कर अयोध्या ले जाते हैं। लक्ष्मण अपनी माता से एक मायामय अँगूठी पाकर अपने भाई को छुड़ाने अयोध्या गये। अयोध्या पहुँच कर जब लक्ष्मण ने छद्मवेशी रमा की सहायता से उस अँगूठी को राम के पास पहुँचा दिया। अँगूठी के प्रभाव से उसके बन्धन टूट गये। यहाँ राम और लक्ष्मण के बाणों ने पुष्पमाला बनकर अपने को राम के प्रति अर्पित किया। तब राम ने यह कहकर ब्रह्मास्त्र चलाया कि यदि ये पराये हैं तो ब्रह्मास्त्र इन्हें नष्ट कर दे। यदि ये सम्बन्धी हैं तो मिष्ठान्न के रूप में बदल जावे। ब्रह्मास्त्र मिष्ठान्न बन गया। इस प्रकार उनको सम्बन्धी जानकर तथा लक्ष्मण से सीतातयाग की वास्तविक कथा सुनकर राम ने सीता के पास जाकर क्षमा याचना की। परन्तु सीता ने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया, किन्तु बालकों को राम के पास भेज दिया। सेरीराम के अनुसार सीता के पुत्रों ने मृगया खेलते समय एक हरिण का वध किया जिसे राम ने पहले ही आहत किया था। लक्ष्मण उसका पीछा करते हुए बालकों के पास पहुँचे। हरिण को लेकर झगड़ा हुआ, बालक लक्ष्मण को बाँध कर कलि के पास पहुँचाते हैं। राम लक्ष्मण की खोज करते हुए महरीसि कलि के पास पहुँचे और पुत्रों का परिचय प्राप्त किया। ऐसी ही और भी कई प्रकार की कथाएँ प्रचलित हैं। जो कथा वाल्मीकिरामायण से जितनी दूर हुई उसमें उतनी ही विकृति आ गयी। बुल्के का ७५२ वें अनु० में यह कहना सर्वथा असत्य है कि आदिरामायण राम के अभिषेक तथा उनके ऐश्वर्यशाली राज्य के संक्षिप्त वर्णन पर समाप्त होता था। राम द्वारा रावण की पराजय तथा सीता की पुनःप्राप्ति राम-कथाओं का वर्ण्य विषय था। क्योंकि संक्षिप्त वर्णन का सविस्तर वर्णन एवं उत्तर की घटनाओं तथा पुत्रों का जन्म तथा अन्त में राम का परमधाम गमन आदि अत्यावश्यक विषयों को छोड़कर इतने बड़े और महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की समाप्ति सम्भव नहीं थी। तथाकथित आदिरामायण सर्वथा अप्रामाणिक है, क्योंकि संसार में आजतक कहीं उसका नामनिशान तक नहीं है। गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार प्रतिनारायण रावण के मर जाने पर बलदेव जैन दीक्षा लेते हैं। लक्ष्मण की मृत्यु के बाद राम विरक्त होकर दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। सीता भी आर्यका बन अच्युत स्वर्ग प्राप्त करती हैं। वस्तुतः ये सब चण्ड खाने की गप्पें है। क्योंकि जैनी केवल रामकथा की लोकप्रियता का लाभ उठाकर जैन- दीक्षा का प्रचारमात्र करते हैं। उनकी कथा का वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है। बुल्के उक्त कथाओं को सुखान्त कथा की संज्ञा देते हैं। पर यह भी चिन्त्य है, क्योंकि कल्पभेद से उत्तरकाण्ड की कथा में सुखान्त कथा का निर्वहण है ही। देशी और विदेशी अनेक कथाओं में राम तथा सीता दोनों पुत्रों के साथ अयोध्या में पुनः सुखपूर्वक निवास करते हैं। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड की कथा दुःखान्त है। लोकापवाद के कारण राम अपनी निर्दोष पत्नी को त्याग देते हैं। अश्वमेध के अवसर पर पुत्रों को देखकर सीता को बुला भेजते हैं। वाल्मीकि सीता के साथ सभा