रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८९ अनादि काल से वाराणसी में मरनेवालों को शिवजी रामनाम का उपदेश करते हैं— “पेयं पेयं श्रवणपुटके रामनामाभिरामं ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् । जल्पन् जल्पन् प्रकृतिविकृतौ प्राणिनां कर्णमूले वीथ्यां वीथ्यामटति जटिलः कोऽपि काशीनिवासी ।।” ( काशीरहस्य ) भक्तवर प्रह्लाद भी रामनाम का महत्त्व मानते हैं— “रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम् । पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना ।।” ( नृ० पु० ) प्रह्लाद कहते हैं राम-नाम जपनेवालों को भय कहाँ ? क्योंकि राम-नाम सब तापों की निवृत्ति का एकमात्र औषध है । हे तात ! देखिये मेरे शरीर के निकट आग भी जल के समान ठण्डी प्रतीत होती है । भक्तगण उन्हीं का आश्रयण करते हैं— “अपराधसहस्रभाजनं पतितं भीमभवार्णवोदरे । अगतिं शरणागतं हरे कृपया केवलमात्मसात्कुरु ।।” नाथ, मैं सहस्रों अपराधों का भाजन हूँ, अतएव भयङ्कर भवार्णव में पड़ा हूँ । मेरा कोई सहारा नहीं है, मैं आपकी शरण में आया हूँ । हे हरे ! आप मुझे अपना लेने की कृपा करें । “न धर्मनिष्ठोऽस्मि न चात्मवेदी न भक्तिमांस्त्वच्चरणारविन्दे । अकिञ्चनोऽनन्यगतिः शरण्यं त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये ।।” न मैं धर्मनिष्ठ हूँ, न आत्मवेदी हूँ और न ही आपके चरणों में भक्तिमान् हूँ । अकिञ्चन एवं अनन्यगति मैं आपके शरणागतरक्षणपरायण चरणों की शरण में प्रपन्न हूँ । स्कन्दयामल तन्त्र के निर्वाणखण्ड में रुद्रवाक्य है— “रेफोऽग्निरहमेवोक्तो विष्णुः सोमो म उच्यते । आवयोर्मध्यगो ब्रह्मा रविराकार उच्यते ।।” राम-नाम का रेफ ( र ) अग्नि का वाचक है, वह अग्नि मैं ही हूँ । रामनाम का 'म' सोमात्मक 'विष्णु का वाचक है, दोनों के मध्य में रहनेवाले आकार का अर्थ ब्रह्मा है । वही आदित्य भी है । इस तरह प्रणव के समान ही रामनाम भी ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मक है । “चिन्मयेऽस्मिन् महाविष्णो जाते दाशरथौ हरौ । रघोः कुलेऽखिलं राति राजते यो महीस्थितः ।। स राम इति लोकेषु विद्वद्भिः प्रकटीकृतः ।” ( रा० पू० ता० १।२ ) रघुकुल में महाविष्णु के दाशरथि राम के रूप में प्रकट होने पर जो अखिल अभीष्ट देते हैं और भूमि में स्थित होकर देदीप्यमान हैं, उनका नाम राम पड़ा । “रमन्ते योगिनो यस्मिन्नित्यानन्दे चिदात्मनि । इति रामपदेनैतत्परं ब्रह्माभिधीयते !!” ( रा० उ० ता० १।६ )