रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९० रामायणमीमांसा विंश योगी जिस नित्य चिदानन्द आत्मा में रमण करते हैं वही राम हैं अथवा जो ज्ञानादि लक्ष्मी प्रदान करते हैं वही राम हैं। “रां ज्ञानादिलक्ष्मीम् अमति ददातीति रामः, ज्ञानादीनां प्राप्तिर्यस्मात्स रामः ।” विविध ऐश्वर्यों, धनों, लक्ष्मी आदि की जिससे प्राप्ति होती है, वही राम है। “यथैव वटबीजस्थः प्राकृतश्च महान् द्रुमः। तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम्॥ रेफारूढमूर्तयः स्युः शक्तयस्तिस्र एव च।” जैसे महान् वटवृक्ष वटबीज में रहता है, वैसे ही यह चराचर प्राकृत महान् जगत् राम के बीज 'रां' मन्त्र में रहता है। तीनों उत्पादिनी, पालिनी तथा संहारिणी शक्तियाँ रेफसमन्वित हैं। “राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः। राम एव परं तत्त्वं श्रीरामो ब्रह्म तारकम्॥” (रा० उ० ता० १।६ ) राम ही परम ब्रह्म हैं, राम ही परम तप हैं, राम ही परम तत्त्व हैं एवं राम ही तारक ब्रह्म हैं। “कांस्यघण्टानिनादस्तु यथालीयति शान्तये। ॐकारस्तु तथा योज्यः शान्तये सर्वमिच्छता॥ यस्मिन् विलीयते शब्दस्तद् ब्रह्म परिगीयते।” कांस्य घण्टा का नाद जैसे क्रमेण लीन हो जाता है उसी तरह प्रणव के उच्चारण में अ, उ और म के समाप्त होने पर अनुस्वार ध्वनि नाद से शान्ति की अनुभूति होती है। वही की वही स्थिति राम में होती है। “राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचकः। विश्वानामीश्वरो यो हि तेन रामः प्रकीर्तितः ॥” रा शब्द विश्व का वाचक है और म ईश्वर का वाचक है तथा विश्वों का ईश्वर ही राम है। “रा चेति लक्ष्मीवचनो मश्चापीश्वरवाचकः। लक्ष्मीपति गतिं रामं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥” इसी तरह 'रा' लक्ष्मी का वाचक है और 'म' ईश्वर का वाचक है। लक्ष्मी का ईश्वर ही राम है। “तरुणादित्यसंकाशं चतुर्वर्गप्रदायकम्। पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं तदा॥ त्रिशक्तिसहितं रामं त्रिबिन्दुसहितं सदा। आत्मादितत्त्वसंयुक्तं हृदिस्थं प्रणमाम्यहम् ॥” (कामधेनुतन्त्र ) तरुण आदित्य के समान 'रा' और 'म' वर्ण चतुर्वर्गप्रद एवं पञ्चदेवमय तथा पञ्चप्राणमय हैं। रामनाम की महिमा से निर्गुण एवं सगुण रामब्रह्म का प्राकट्य होता है। “कदा पुनः शङ्खरथाङ्गकल्पकध्वजारविन्दाङ्कुशवज्रलाञ्छनम्। त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्धानमलङ्करिष्यति ॥”(आलवन्दारस्तोत्र ३४) श्रीयामुनाचार्य कहते हैं- शङ्ख, चक्र, ध्वज, कमल, अङ्कुश और वज्र के चिह्नों से अङ्कित आपके चरणारविन्द कब मेरे मस्तक को अलङ्कृत करेंगे? अन्य भक्तों के अनुसार भगवच्चरणारविन्द में आकाश, गोष्पद, स्वस्तिक, जम्बूफल, कलश, सुधासरोवर, अर्धचन्द्र, षट्कोण, मीनबिन्दु, ऊर्ध्वरेखा आदि के भी चिह्न हैं।