रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६२१ “अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३१ ) आठ आवरणोंवाली तथा नव द्वारवाली देवताओं की पुरी अयोध्या है। उसमें हिरण्मय ज्योतिर्मय स्वर्ग कोश है। वह ज्योति के द्वारा आवृत है। “अयोध्या नगरी नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी । यस्यांशांशेन वैकुण्ठो गोलोकादिः प्रतिष्ठितः ॥” ( व० सं० ) वसिष्ठसंहिता के अनुसार अयोध्या नगरी सच्चिदानन्दरूपिणी है। वैकुण्ठ, गोलोकादि सब उसी के अंश हैं। “तस्मिन् हिरण्मये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते तस्मिन् । यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३२ ) उस प्रकाशमय तीन अरों, तीन गुणों या सत्, चित् और आनन्द पर आधृत हिरण्मय कोश में आत्मतुल्य परमपूज्य राम ब्रह्म स्थित हैं। “प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा सम्परीवृताम् । पुरं हिरण्मयीं ब्रह्माविवेशापराजिताम् ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३ ) अत्यन्त देदीप्यमान मन को हरण करनेवाली यश से परिवृत अपराजिता सर्वथा अजेय उस हिरण्मयी अयोध्या पुरी में ब्रह्म राम सम्यक् विराजमान हैं। वाल्मीकिरामायण में उसी प्रेमपरिप्लुत अयोध्या पुरी का वर्णन है। “तत्समाकुलसंभ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम् । हयशिक्षितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम् ॥” ( वा० रा० २।४०।१९ ) राम के वियोग से वह पुर ही व्याकुल एवं संभ्रान्त हो गया। मत्त गज भी राम के वियोग की सम्भावना से कुपित हो गये। घोड़ों के हिनहिनाने एवं उनके भूषणों के निःस्वनों से सारा नगर कोलाहलपूर्ण हो गया। पुरवासी कहते हैं— “अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः । उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः ॥” ( वा० रा० २।४५।३० ) अपनी जड़ों के कारण वेगहीन पादप तुम्हारा अनुगमन करने में असमर्थ हैं। वायुवेग से स्वनवान् ये उन्नत पादप आप से लौटने के लिए चीत्कार कर रहे हैं। “लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः । संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहङ्गमाः ॥” ( वा० रा० २।५९।७ ) नदियों के जल मलिन हो गये हैं एवं उनके कमलों के पत्ते निलीनप्राय हो गये हैं (सूख गये हैं)। नदियों, सरोवरों के कमल एवं कमलिनियां संतप्त हो गयी हैं। उनके मीन एवं विहंगमगण लुप्त हो गये हैं। “मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि । उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे संप्रस्थिते वनम् ॥