रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६२१ “अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३१ ) आठ आवरणोंवाली तथा नव द्वारवाली देवताओं की पुरी अयोध्या है। उसमें हिरण्मय ज्योतिर्मय स्वर्ग कोश है। वह ज्योति के द्वारा आवृत है। “अयोध्या नगरी नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी । यस्यांशांशेन वैकुण्ठो गोलोकादिः प्रतिष्ठितः ॥” ( व० सं० ) वसिष्ठसंहिता के अनुसार अयोध्या नगरी सच्चिदानन्दरूपिणी है। वैकुण्ठ, गोलोकादि सब उसी के अंश हैं। “तस्मिन् हिरण्मये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते तस्मिन् । यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३२ ) उस प्रकाशमय तीन अरों, तीन गुणों या सत्, चित् और आनन्द पर आधृत हिरण्मय कोश में आत्मतुल्य परमपूज्य राम ब्रह्म स्थित हैं। “प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा सम्परीवृताम् । पुरं हिरण्मयीं ब्रह्माविवेशापराजिताम् ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३ ) अत्यन्त देदीप्यमान मन को हरण करनेवाली यश से परिवृत अपराजिता सर्वथा अजेय उस हिरण्मयी अयोध्या पुरी में ब्रह्म राम सम्यक् विराजमान हैं। वाल्मीकिरामायण में उसी प्रेमपरिप्लुत अयोध्या पुरी का वर्णन है। “तत्समाकुलसंभ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम् । हयशिक्षितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम् ॥” ( वा० रा० २।४०।१९ ) राम के वियोग से वह पुर ही व्याकुल एवं संभ्रान्त हो गया। मत्त गज भी राम के वियोग की सम्भावना से कुपित हो गये। घोड़ों के हिनहिनाने एवं उनके भूषणों के निःस्वनों से सारा नगर कोलाहलपूर्ण हो गया। पुरवासी कहते हैं— “अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः । उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः ॥” ( वा० रा० २।४५।३० ) अपनी जड़ों के कारण वेगहीन पादप तुम्हारा अनुगमन करने में असमर्थ हैं। वायुवेग से स्वनवान् ये उन्नत पादप आप से लौटने के लिए चीत्कार कर रहे हैं। “लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः । संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहङ्गमाः ॥” ( वा० रा० २।५९।७ ) नदियों के जल मलिन हो गये हैं एवं उनके कमलों के पत्ते निलीनप्राय हो गये हैं (सूख गये हैं)। नदियों, सरोवरों के कमल एवं कमलिनियां संतप्त हो गयी हैं। उनके मीन एवं विहंगमगण लुप्त हो गये हैं। “मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि । उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे संप्रस्थिते वनम् ॥
६९२ रामायणमीमांसा विंश
विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः । अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्कुरकोरकाः ॥ उपतप्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च । परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च ॥ न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रसरन्ति च । रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमिव तद्वनम् ॥ जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च । न विभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम् ॥ अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च । न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ ॥” (वा०रा० २।५९।२, ३–६, ८, ९)
सुमन्त्र ने कहा—राम के वन को प्रस्थित होने पर मैं जब लौटा रथ के घोड़े उष्ण आँसू गिराते हुए मार्ग पर चलने को प्रवृत्त नहीं हुए । महाराज, महाव्यसन से दुःखित आपके देश के वृक्ष पुष्पों, पल्लवों, अङ्कुरों तथा पुष्पमुकुलों के साथ परिम्लान (कुम्हलाये हुए) हो गये हैं। नदियों, सरोवरों तथा छोटे सरोवरों के जल तप्त एवं शुष्क हो गये हैं । वनों एवं उपवनों के पत्ते सूख गये हैं। कोई प्राणी आहार के लिए भी गमनागमन नहीं कर रहे हैं । व्याल भी प्रसर्पण नहीं कर रहे हैं। सारा वन रामशोक से अभिभूत होकर निःशब्द सा हो रहा है। जल और स्थल के सभी पुष्प पहले के समान सौन्दर्य तथा सौगन्ध्य से युक्त नहीं हैं। सारे उद्यान विहंगादिहीन हो शून्य से प्रतीत होते हैं । आराम और क्रीडोद्यान भी अभिरामताशून्य हो रहे हैं। इस तरह अचेतन वृक्ष और लताएँ भी रामप्रेम से व्याप्त हैं ।
जो कहते हैं कि भले पुष्करनाभ के अनेक एक से एक अच्छे अवतार हैं तो भी लताओं में प्रेम प्रदान करनेवाला कृष्ण से अन्य कौन है ? “सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतो भद्राः । कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ॥”
उन्हें उपर्युक्त वाल्मीकिरामायण के श्लोकों का अध्ययन करना चाहिये । इस तरह राम, उनका मङ्गल- मय धाम तथा मङ्गलमय नाम एवं राम की मङ्गलमयी कथा सभी स्वप्रकाश ब्रह्मरूप ही हैं और प्रत्येक के परम कल्याण के स्रोत हैं ।
रघुवंश के अनुसार कुश ने अयोध्या का जीर्णोद्धार किया था । “ऋषभं प्राप्य राजानं निवासमुपयास्यति ।” (वा० रा० ७।१११।२०) के अनुसार पूर्णरूप से वह जननिवास स्थान ऋषभ राजा के काल में ही हो सकी थी । सन्ध्याकरनन्दिकृत रामचरित (सर्ग ४) में वर्णित है कि कुश का कुमुद्वती के साथ विवाह हुआ था । आनन्दरामायण में भी कुश के अनेक विवाहों का वर्णन है । राम के २००० पौत्रों तथा २४ पौत्रियों का उल्लेख है । सेरीराम के अनुसार लव ने इन्द्र- जित् की पुत्री, इसके बाद विभीषण की पुत्री से विवाह कर के लङ्का का राज्य स्वीकार किया था । परन्तु यह सब रामायणविरुद्ध होने से चिन्त्य है । राम ने लङ्का का राज्य विभीषण को दिया था । रामपुत्र उसे स्वीकार करते यह कथमपि सम्भव नहीं ।
रावण ब्राह्मण था । उसके कुल की कन्या से विवाह क्षत्रिय कुल के लिए दोषावह ही था ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९३ कुश और लव की जन्म-कथा राम द्वारा परित्यक्त किये जाने के बाद सीता ने वाल्मीकि के आश्रम में यमल पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकिरामायण (७।६६।३-९) के अनुसार कुशों के अग्रभाग से अग्रज का निर्मार्जन करने का तथा अनुज का कुशों के लव (अधोभाग) से मार्जन करने का आदेश महर्षि वाल्मीकि ने दिया था। अतः क्रम से दोनों का नाम कुश और लवपड़ा था— 'यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैर्मन्त्रसत्कृतैः । निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥ यश्चावरो भवेत्ताभ्यां लवेन सुसमाहितः । निर्मर्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥' (वा० रा० ७।६६।७,८) इससे भी स्पष्ट है कि गानोपजीवी कुशीलव की यहाँ चर्चा नहीं है। यहाँ कुश और लव नाम के दो राजकुमार हैं और वे सीतापुत्र हैं। अतः बुल्के की यह कल्पना निरर्थक है कि कुशीलव गानविद्योपजीवी थे। भवभूति के अनुसार लक्ष्मण के चले जाने पर सीता को वन में प्रसव-पीड़ा होती है। उससे निराश होकर वे आत्महत्या के विचार से गङ्गा में कूद पड़ती हैं। जल में ही उनके दो पुत्र होते हैं। पृथिवी तथा गङ्गा देवियाँ सीता को दो पुत्रों के साथ रसातल ले जाती हैं। बाद में कुछ बड़े होने पर गङ्गा दोनों पुत्रों को शिक्षा देने के लिए वाल्मीकि महर्षि को सौंप देती हैं। इसके अनुसार कुश और लव अपने माता-पिता के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे । अन्तिम अङ्क में वाल्मीकि की आज्ञा से सीता प्रकट होकर राम के साथ अयोध्या लोटती हैं। कुन्दमाला के अनुसार राम कुश और लव से उनके माता-पिता के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। तो वे अपनी माता वनदेवी को बताते हैं। परन्तु पिता के सम्बन्ध में कुश ने कहा कि मैं नहीं जानता। लव ने कहा मैं जानता हूँ। मेरे पिता का नाम निरनुक्रोश है, क्योंकि एक दिन माँ ने क्रुद्ध होकर कहा था "निरनुक्रोशतनयौ"। यह सुनकर राम के नेत्रों में अश्रु आ गये। यह कथा कल्पान्तर की हो सकती है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो वाल्मीकि के आश्रम में ही कुश और लव का जन्म हुआ था एवं वेदादि की शिक्षा भी उन्हें वहीं मिली थी। कथासरित्सागर तथा तिब्बती रामायण के अनुसार सीता ने एक ही पुत्र को जन्म दिया था। उसका नाम लव था। सीता लव को लेकर नदी में स्नान करने गयी। वाल्मीकि ने कुटी में आकर सोचा कि कोई हिंस्र पशु बालक को उठा ले गया, इसलिए उन्होंने तपोबल द्वारा कुश से एक बालक की सृष्टि की। लौटने पर सीता ने उसे पुत्रवत् ग्रहण किया। इस प्रकार सीता के कुश और लव दो पुत्र हुए। काश्मीरीरामायण (९।११८३-९३) के अनुसार दशरथ स्वप्न में पुत्र के लिए राम से अनुरोध करते हैं। राम वसिष्ठ की सम्मति से अश्वमेधयज्ञ करते हैं। फलस्वरूप सीता गर्भवती होती है। यह भी कल्पान्तरीय कथा है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो अश्वमेधयज्ञ में ही कुश और लव ने रामायण का गान किया था। किसी कथा के अनुसार सीता कुश को वाल्मीकि की रक्षा में छोड़ कर जाती है, किन्तु मार्ग में वानरियों का उपदेश सुनकर लौट आती हैं। वाल्मीकि नया पुत्र बनाकर देते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार भी एक वानरी पाँच पुत्रों को ढोती है। इसपर सीता लौटकर वाल्मीकि को बिना बताये पुत्र को ले जाती हैं। रामकियेन में वानरियों से सीता के मिलने का वृत्तान्त है। सीता वानरियों को बच्चों के साथ कूदती देख कर बच्चों की समुचित सुरक्षा न करने के कारण उनकी भर्त्सना करती हैं। वानरियों ने उत्तर दिया कि तुम तो अपना पुत्र ध्यानमग्न ऋषि के पास छोड़ कर आयी। तुम हमसे भी अधिक असावधान हो। यह सुनकर सीता अपने पुत्र को लेने के लिए लौट पड़ती है। अन्य वृत्तान्त के अनुसार सुग्रीव-सेना के वानर वन में सीता की सेवा करते हैं। वानर उनके पुत्र को टहलाने ले जाते थे। किसी दिन सीता नदी तट पर सो गयी। इतने में एक वानरी उनके पुत्र
६९४ रामायणमीमांसा विंश को टहलाने ले गयी । बाद में सीता दुःख से द्रवित हो गयी । इस पर वाल्मीकि ने एक बालक की सृष्टि की । सिंहली रामकथा के अनुसार वाल्मीकि ने सीता-पुत्र न देखकर एक कमल से दूसरा बालक बनाया । ऐसी अन्य भी अनेक कल्पनाएँ हैं जो वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने के कारण कल्पान्तरीय कही जा सकती हैं । वाल्मीकिरामायण में अश्वमेध की यज्ञभूमि में लव और कुश रामायण का गान करते हैं । वहीं राम अपने पुत्रों का परिचय पाते हैं । बहुत सी राम-कथाओं में कुश और लव राम की सेना से भी युद्ध करते हैं । युद्ध का मुख्य कारण यह है कि कुश और लव ने रामाश्वमेध के घोड़े को बाँध लिया था । पउमचरियं (पर्व ९७-१००) के अनुसार लवण तथा अंकुश (लव तथा कुश) - अपनी माता के साथ पुण्डरीकपुर के राजा वज्रजङ्घ के यहाँ रहते हैं एवं सिद्धार्थ से शिक्षा पाते हैं। उनके यहाँ विवाह एवं दिग्विजय के बाद नारद आकर उनकी माता के त्याग की घटना का समाचार सुनाते हैं । इसपर लवण और अंकुश राम तथा लक्ष्मण से प्रतिशोध लेने के लिए सेना लेकर अयोध्या पर आक्रमण कर देते हैं । लवण राम से एवं अंकुश लक्ष्मण से युद्ध करते हैं । युद्ध के अनिश्चित होने पर नारद आकर राम और लक्ष्मण को लवण तथा अंकुश के जन्म का रहस्य बतलाते हैं । इसपर राम अपने पुत्रों से मिल कर उनको पास ही रखते हैं । बाद में सीता की अग्नि-परीक्षा होती है ( पर्व १०२) । हनुमान् पुत्रों का पक्ष लेकर राम के विरुद्ध युद्ध करते हैं । कथासरित्सागर ( ५१) के अनुसार कुश और लव शिवलिङ्ग से खेल खेलते हैं । प्रायश्चित्त के लिए वाल्मीकि लव को कुबेर के सरोवर से स्वर्णकमल तथा वाटिका में मन्दार लाकर शिवपूजन का आदेश करते हैं । लक्ष्मण उस समय राम के पुरुषमेध के लिए शुभलक्षणसम्पन्न पुरुष खोज रहे थे । उन्होंने लव को बन्दी बना लिया । इसपर वाल्मीकि कुश को अयोध्या भेजते हैं । वाल्मीकि के दिव्य अस्त्रों से कुश ने लक्ष्मण और राम को पराजित किया । बाद में राम पुत्रों का परिचय प्राप्त करते हैं और सीता को बुला भेजते हैं । आनन्दरामायण ( जन्मकाण्ड ६।८ ) के अनुसार वाल्मीकि के आश्रम में अपने पुत्रों के साथ रहनेवाली सीता नौ दिन का संयोगकरण व्रत करना चाहती हैं । इसके लिए अयोध्या के सरोवर के स्वर्णकमलों की आवश्यकता पड़ती है । पञ्चवर्षीय लव छिप कर ले आता है । आठवें दिन चौदह पहरे- दारों को परास्त कर उनसे कहता है कि मैं वाल्मीकि के आदेशानुसार यह कमल ले जा रहा हूँ । नवें दिन १००० रक्षकों को पराजित करता है । सीता व्रत पूरा करती है । बाद में शिष्यों सहित वाल्मीकि को रामाश्वमेध का निमन्त्रण आता है । वाल्मीकि सीता तथा शिष्यों सहित आकर सरयूतीर पर ठहरते हैं । इतने में वहाँ यज्ञाश्व पहुँचता है । लव उसे बाँध लेता है तथा राम की समस्त सेना को पराजित करता है । लक्ष्मण लव को पराजित करते हैं । कुश आकर लक्ष्मण को पराजित करता है । फिर देर तक राम कुश का युद्ध होता है । युद्ध में किसी की जीत नहीं होती । राम ने कुश और लव के सम्बन्ध में वाल्मीकि से प्रश्न किया । महर्षि ने कहा—कल इसका रहस्य ज्ञात होगा । दूसरे दिन कुश और लव रामायण का गान कर अपना परिचय देते हैं । पश्चात् सीता को बुलाया जाता है । सतीत्व का साक्ष्य देने के पश्चात् वह राम तथा पुत्रों के साथ अयोध्या में रहने लगती है । भावार्थरामायण ( ७।६६,६७ ) में भी यही वृत्तान्त है । बुल्के की कालकल्पना भारतीय संस्कृतिविरोधी पाश्चात्यों की कल्पना पर ही आधारित है, अतः विश्वसनीय नहीं है । बृहत्कथा तो भवभूति से प्राचीन है ही । उत्तररामचरित अङ्क ५,६ में लव का पहले यज्ञाश्व की रक्षा करनेवाली राम की सेना तथा अन्त में लक्ष्मण-पुत्र चन्द्रकेतु से युद्ध होता है । राम पहुँच कर तथा दोनों का युद्ध रोक कर परिचय प्राप्त करते हैं । अन्त में सीता को ग्रहण करते हैं । रामाश्वमेध के अनुसार लव का भरतपुत्र पुष्कल से युद्ध होता है । जैमिनीयाश्वमेध ( अध्याय २९-३६ ) के अनुसार लव यज्ञाश्व को बाँधकर सैनिकों का वध कर शत्रुघ्न से पराजित होते हैं । कुश शत्रुघ्न को पराजित करते हैं । बाद में कुश और लव दोनों ही लक्ष्मण, हनुमान् तथा भरत पर विजय प्राप्त करते हैं एवं राम को आहत करते हैं । अन्त में वाल्मीकि राम की समस्त सेना को अमृत जल से पुनर्जीवित करते हैं ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९५ पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६०-६४) में राम, लक्ष्मण तथा भरत युद्ध में नहीं आते। सीता अपने सतीत्व के प्रभाव से राम-सेना को जीवित करती है। पौराणिक आख्यानों के आधार पर भी काव्य और नाटकों की कथाएँ समझनी चाहिये। अतः पौराणिक आख्यान सुतरां काव्य और नाटकों से अति प्राचीन हैं। रामकेर्ति के अनुसार सीतापुत्रों ने वाल्मीकि से धनुर्विद्या की शिक्षा पायी थी। किसी दिन अपने बाणों से उन्होंने एक विशाल वृक्ष को नष्ट कर दिया। जिससे अयोध्या में भूकम्प हुआ। ज्योतिषियों ने कहा यह एक महान् राजा की धनुर्विद्या का परिणाम है। उस राजा का पता लगाने के लिए एक अश्व छोड़ा गया। हनुमान्, भरत, और शत्रुघ्न ने उसका अनुसरण किया। सीतापुत्रों ने अश्व को बाँध लिया। हनुमान् को हराकर उनके हाथ बाँध दिये और उनके शरीर पर लिख दिया कि इसका स्वामी इसे खोलेगा। शत्रुघ्न आदि के असफल होने पर अयोध्या जाकर राम की शरण लेनी पड़ी। बाद में हनुमान् सीता के पुत्र को बन्दी बना कर अयोध्या ले जाते हैं। लक्ष्मण अपनी माता से एक मायामय अँगूठी पाकर अपने भाई को छुड़ाने अयोध्या गये। अयोध्या पहुँच कर जब लक्ष्मण ने छद्मवेशी रमा की सहायता से उस अँगूठी को राम के पास पहुँचा दिया। अँगूठी के प्रभाव से उसके बन्धन टूट गये। यहाँ राम और लक्ष्मण के बाणों ने पुष्पमाला बनकर अपने को राम के प्रति अर्पित किया। तब राम ने यह कहकर ब्रह्मास्त्र चलाया कि यदि ये पराये हैं तो ब्रह्मास्त्र इन्हें नष्ट कर दे। यदि ये सम्बन्धी हैं तो मिष्ठान्न के रूप में बदल जावे। ब्रह्मास्त्र मिष्ठान्न बन गया। इस प्रकार उनको सम्बन्धी जानकर तथा लक्ष्मण से सीतातयाग की वास्तविक कथा सुनकर राम ने सीता के पास जाकर क्षमा याचना की। परन्तु सीता ने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया, किन्तु बालकों को राम के पास भेज दिया। सेरीराम के अनुसार सीता के पुत्रों ने मृगया खेलते समय एक हरिण का वध किया जिसे राम ने पहले ही आहत किया था। लक्ष्मण उसका पीछा करते हुए बालकों के पास पहुँचे। हरिण को लेकर झगड़ा हुआ, बालक लक्ष्मण को बाँध कर कलि के पास पहुँचाते हैं। राम लक्ष्मण की खोज करते हुए महरीसि कलि के पास पहुँचे और पुत्रों का परिचय प्राप्त किया। ऐसी ही और भी कई प्रकार की कथाएँ प्रचलित हैं। जो कथा वाल्मीकिरामायण से जितनी दूर हुई उसमें उतनी ही विकृति आ गयी। बुल्के का ७५२ वें अनु० में यह कहना सर्वथा असत्य है कि आदिरामायण राम के अभिषेक तथा उनके ऐश्वर्यशाली राज्य के संक्षिप्त वर्णन पर समाप्त होता था। राम द्वारा रावण की पराजय तथा सीता की पुनःप्राप्ति राम-कथाओं का वर्ण्य विषय था। क्योंकि संक्षिप्त वर्णन का सविस्तर वर्णन एवं उत्तर की घटनाओं तथा पुत्रों का जन्म तथा अन्त में राम का परमधाम गमन आदि अत्यावश्यक विषयों को छोड़कर इतने बड़े और महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की समाप्ति सम्भव नहीं थी। तथाकथित आदिरामायण सर्वथा अप्रामाणिक है, क्योंकि संसार में आजतक कहीं उसका नामनिशान तक नहीं है। गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार प्रतिनारायण रावण के मर जाने पर बलदेव जैन दीक्षा लेते हैं। लक्ष्मण की मृत्यु के बाद राम विरक्त होकर दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। सीता भी आर्यका बन अच्युत स्वर्ग प्राप्त करती हैं। वस्तुतः ये सब चण्ड खाने की गप्पें है। क्योंकि जैनी केवल रामकथा की लोकप्रियता का लाभ उठाकर जैन- दीक्षा का प्रचारमात्र करते हैं। उनकी कथा का वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है। बुल्के उक्त कथाओं को सुखान्त कथा की संज्ञा देते हैं। पर यह भी चिन्त्य है, क्योंकि कल्पभेद से उत्तरकाण्ड की कथा में सुखान्त कथा का निर्वहण है ही। देशी और विदेशी अनेक कथाओं में राम तथा सीता दोनों पुत्रों के साथ अयोध्या में पुनः सुखपूर्वक निवास करते हैं। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड की कथा दुःखान्त है। लोकापवाद के कारण राम अपनी निर्दोष पत्नी को त्याग देते हैं। अश्वमेध के अवसर पर पुत्रों को देखकर सीता को बुला भेजते हैं। वाल्मीकि सीता के साथ सभा
६९६ रामायणमीमांसा विंश में पहुँच कर सीता के सतीत्व का साक्ष्य देते हैं। राम जनता को विश्वास दिलाने के उद्देश्य से सीता से अनुरोध करते हैं। सीता अपने सतीत्व का प्रमाण देती हुई कहती हैं—यदि मैं राघव से अन्य पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती हूँ तो माधवी देवी मुझे विवरस्थान प्रदान करे। "याऽहं राघवादन्यं मनसाऽपि न चिन्तये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥" पृथ्वी एक दिव्य सिंहासन पर बैठी हुई भूमि से प्रकट होती है और सीता को अपने अङ्क में लेकर भूमि में पुनः प्रवेश करती है। राम विलाप करते हैं। पृथ्वी से सीता को लौटाने का अनुरोध करते हैं। अन्त में देवगणों के साथ ब्रह्मा आकर राम को उनके परम विष्णुरूप का स्मरण दिलाते हुए सान्त्वना देते हैं और परमधाम में सीता समागम की बात कहते हैं— “राम राम न सन्तापं कर्तुमर्हसि सुव्रत । स्मर त्वं पूर्व्वकं भावं स्मर त्वं जन्म वैष्णवम् ॥” ( वा० रा० ७।९७।१४ ) सीता का भूमि-प्रवेश उत्तरकाण्ड निर्वहण का प्रथम सोपान है। द्वितीय सोपान लक्ष्मणत्याग पर समाप्त होता है। सीता के अन्तर्धान होने के पश्चात् कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी का वैकुण्ठवास होता है। लक्ष्मण के पुत्रों की राज्य-व्यवस्था के लिए अनेक विजय-यात्राएँ होती हैं। लक्ष्मण-त्याग इस प्रकार वर्णित हैँ—काल तपस्वी के वेष में आकर एकान्त में ही बात करना चाहते हैं। राम से प्रतिज्ञा कराते हैं कि जो कोई हम दोनों को बात करते देखे व सुने वह राम द्वारा मारा जाय— “यः शृणोति निरीक्षेद् वा स वध्यो भविता तव ।” ( वा० रा० ७।९८।१३ ) राम लक्ष्मण को द्वार पर खड़े रहने का आदेश देते हैं, एकान्त पाकर काल राम को ब्रह्मा का सन्देश देते हैं कि रामावतार का समय समाप्त हो रहा है। इतने में दुर्वासा लक्ष्मण के पास पहुँच कर तुरन्त राम से मिलने का अनुरोध करते हैं। लक्ष्मण ने बड़ी नम्रता से कहा जो आज्ञा है, मैं पूर्ण करूँगा। राघव कार्यव्यग्र हैं, कुछ क्षण प्रतीक्षा कीजिये। मुनि ने क्रुद्ध होकर कहा, अभी जाकर राम से मेरा आना कहो अन्यथा तुम्हारे देश को, तुमको, राघव को, भरत को और तुम लोगों की सन्तानों को शाप दूँगा। लक्ष्मण-वंशनाश की अपेक्षा अपना ही मरण श्रेष्ठ समझ कर राम के पास अन्दर जाते हैं— “एकस्य मरणं मेऽस्तु माऽभूत् सर्वविनाशनम् ।” ( १०३।१२ ) ( १०५।९ ) बाद में राम अपनी प्रतिज्ञा के वशीभूत होकर लक्ष्मण का परित्याग करते हैं— “विसर्जये त्वां सौमित्रे मा भूद् धर्मविपर्ययः । त्यागो वधो वा विहितः साधूनां ह्युभयं समम् ॥” ( १०७।१३ ) इसपर लक्ष्मण सरयू के तट पर जाकर श्वासरोधकर समाधिस्थ हो गये। फिर सशरीर अपने दिव्य शेषरूप में प्रकट हो गये। इन्द्रादि देवता विष्णु का चतुर्थांश पाकर प्रसन्न होकर लक्ष्मण की पूजा करते हैं (सर्ग १०३ तथा १०६)। लक्ष्मण के वियोग के कारण दुःखी होकर राम ने भरत को राज्य सौंप कर वन जाने की इच्छा प्रकट की। किन्तु भरत ने तथा अयोध्या की प्रजा ने राम के साथ जाने की अनुमति ले ली। तब राम ने पुत्रों को कुशावती तथा श्रावस्ती में राजसिंहासन पर बैठा कर शत्रुघ्न को बुला भेजा। अयोध्या के दूतों से यह जान कर कि राम, भरत एवं प्रजा के साथ परम धाम जाने की तैयारियाँ कर रहे हैं। शत्रुघ्न ने अपने पुत्रों को राज्य देकर अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। राम ने शत्रुघ्न को भी साथ चलने की अनुमति प्रदान कर दी। इतने
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९७ में सुग्रीव, विभीषण तथा सभी वानर, ऋक्ष आदि आ पहुँचे और सभी राम के साथ जाने को उत्सुक थे। राम ने सब को अपने साथ जाने को कहा, किन्तु विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मयन्द और द्विविद को कलियुग के अन्त तक रहने का आदेश दिया। दूसरे दिन प्रातः राम सब के साथ सरयूतीर पहुँचे। ब्रह्मा ने प्रकट होकर राम से निवेदन किया कि आप अपने भाइयों सहित विष्णुरूप में प्रवेश करें। राम ब्रह्मा का अनुरोध स्वीकार कर साक्षात् विष्णुरूप में प्रकट हो गये। ब्रह्मा ने रामस्वरूप विष्णु के आज्ञानुसार सब के लिए सन्तानक या साकेत लोक प्राप्त कराया। सबने सरयू के जल का स्पर्श कर अनायास देहत्याग कर साकेत धाम को गमन किया। ब्रह्मा ने यह भी कहा कि पशु-पक्षी आदि जो प्राणी आपका स्मरण करते हुए प्राणत्याग करेंगे सब साकेत लोक में प्रवेश करेंगे। वह सन्तानकलोक ब्रह्मलोक के अत्यन्त अव्यवहित है। सुग्रीवादि जो विशिष्ट देवांश थे वे अपने-अपने अंशों में पहुँच गये। अन्त में स्थावर और जङ्गम सभी सरयू-जल का स्पर्श कर परम धाम को पहुँच गये। ऐसा ही कथानिर्वहण अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रघुवंश आदि में पाया जाता है। भागवतपुराण के अनुसार सीता अपने पुत्रों को वाल्मीकि मुनि के हाथ में सौंप कर राम का ध्यान करती हुई भूमि में प्रवेश करती है। राम यह समाचार सुनकर बहुत दुःखी हुए। अन्य कई कथाओं में सीता के भूमि-प्रवेश को भिन्न-भिन्न रूप दिया गया है। पउमचरियं के अनुसार भी सीता ने अग्नि-परीक्षा से अपने सतीत्व को प्रमाणित किया था। जब राम ने सीता से अयोध्या में रहने का अनुरोध किया तो उन्होंने बाल कटाकर जैन दीक्षा ले ली। क्षुद्र स्वार्थी जैन लोग दीक्षा देने की धुन में सब कथाओं को मनमानी ढंग से विकृत करते हैं। पर्व १०२ में कहा गया है कि रत्नचूल, मणिचूल नामक देवताओं ने राम और लक्ष्मण के प्रेम की परीक्षा लेने के उद्देश्य से लक्ष्मण को राम की मृत्यु का मिथ्या समाचार सुना दिया, जिससे तत्काल लक्ष्मण का देहावसान हो गया। राम के पुत्र लवण और अंकुश लक्ष्मण की मृत्यु से विरक्त होकर तप करने चले गये। राम लक्ष्मण की अन्त्येष्टि करके लवण-पुत्र अङ्करुह को राज्य सौंप कर तपस्वी के रूप में भ्रमण करने लगे। उनके अनुसार राम सब प्रलोभनों को ठुकराकर कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर १७००० वर्ष जीवित रह कर निर्वाण प्राप्त करते हैं। जिनके नाम से संसार को निर्वाण मिलता है, निरीश्वरवादी जैन उन राम के लिए तपस्या द्वारा निर्वाणप्राप्ति की बात करते हैं। इनके द्वारा कल्पित नाम भी इनकी बातों को मिथ्या सिद्ध करते हैं, क्योंकि आज तक ये नाम व्यवहार में आये ही नहीं। ब्रह्मपुराण (अध्याय १५४) के अनुसार अङ्गद और हनुमान् राम के अश्वमेध के अवसर पर अयोध्या पहुँच कर सीता-त्याग का वृत्तान्त सुनकर गोदावरी की ओर प्रस्थान करते हैं। इसपर राम सीता का स्मरण करते हुए अयोध्यावासियों के साथ गोदावरी के तट पर तपस्या करने जाते हैं। बुल्के कहते हैं कि यह पउमचरियं का प्रभाव है। परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि वैदिक पुराण जैन कथाओं से अत्यन्त प्राचीन हैं, यह कहा जा चुका है। ब्रह्मपुराण भी व्यासदेव की ही उक्ति है। सुखान्त कथा उत्तररामचरित के अनुसार राम अपने पुत्रों तथा सीता के साथ अयोध्या लौट आते हैं। क्षेमेन्द्रकृत बृहत्कथामञ्जरी के अनुसार राम वाल्मीकि द्वारा उक्त अपने पुत्र कुश और लव को एवं विशुद्धा दयिता पत्नी को अयोध्या लाये-- "पुत्रौ कुशलवाभिख्यो उक्तौ वाल्मीकिना स्वयम् । तौ प्राप्य रामो दयितां विशुद्धा मानिनाय ताम् ॥” कुन्दमाला के अनुसार भी पृथिवी स्वयं प्रकट हो सीता के सतीत्व का साक्ष्य देकर लुप्त हो जाती है। तत्पश्चात् राम सीता तथा पुत्रों के साथ अयोध्या लौटते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार राम धनुष पर बाण रख
६९८ रामायणमीमांसा विंश कर सृष्टि का संहार करना आरम्भ करते हैं तब पृथिवी भयभीत होकर सीता को लोटा देती है। पूर्णकाण्ड के अनुसार सोमवंशी राजाओं के आक्रमण तथा सन्धि के पश्चात् हस्तिनापुर में ब्रह्मा ने राम से वैकुण्ठ पधारने का आग्रह किया। राम ने स्वीकार किया। राम ने एक विशाल सेना के साथ कुश को राजधानी में भेज दिया। मन्थरा तथा धोबी को स्वर्ग जाने की अनुमति नहीं मिली। विभीषण, जाम्बवान् तथा हनुमान् को पृथिवी पर रहने का आदेश मिला। राम विष्णु के रूप में व्यक्त हो गये, सीता लक्ष्मी, लक्ष्मण शेष भगवान् तथा भरत और शत्रुघ्न शङ्ख और चक्र के रूप में परिणत हो गये। वानर देवताओं के शरीर में और अयोध्यावासी अपना शरीर त्यागकर दिव्य देह-धारियों के रूप में सुशोभित होने लगे। कथासरित्सागर (१।१।११२), जैमिनीयाश्वमेध (अ० ३६), पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६७), रामचन्द्रिका (प्रकाश २६), रामलिङ्गामृत आदि के अनुसार कुश और लव युद्ध के बाद सीता राम से मिल कर उनके साथ अयोध्या लौट जाती हैं। तिब्बतीरामायण के अनुसार हनुमान् अन्य वानरों के साथ अयोध्या आने का निमन्त्रण पाकर राम से मिलते हैं। सीता त्याग का वृत्तान्त सुनकर वह वर्णन करते हैं कि किस परिस्थिति में उन्होंने सीता को लङ्का में देखा था। हनुमान् का प्रमाण स्वीकार करके राम सीता को बुला भेजते हैं। जिसपर सीता पुत्रों के साथ लौटती हैं। सेरीराम में सीता की शपथ क्रिया के फलस्वरूप किकवी देवी तथा सब जानवरों को १२ वर्ष तक गूँगा देखकर राम को विश्वास हुआ कि सीता निर्दोष है। अतः वे सीता को अयोध्या लाने के लिए महरीसी कलि के यहाँ चले आये। उन्होंने राम का अभिप्राय जानकर राम और सीता के १४ दिवसीय विवाहोत्सव का आयोजन किया। जिसके अन्त में सीता अपने पुत्रों के साथ राम की राजधानी लौटीं। वहाँ किकवी देवी ने क्षमा याचना की। उससे उसका तथा सब जानवरों का गूँगापन दूर हो गया। पुत्रों के विवाह के बाद राम किसी तपस्वी के पास अयोध्या में तपस्वी जीवन बिताने लगे। चालीस वर्ष तक तपश्चर्या कर के राम परम धाम गये। सेरतकाण्ड में भी सीता-त्याग के बाद सीता और राम का सम्मिलन वर्णित है। लव को उत्तराधिकारी बना कर राम ने सीता, लक्ष्मण और विभीषण के साथ तपोमय जीवन बिताया। अन्त में वानर देवभाव में तथा सीता और राम लक्ष्मी तथा विष्णु के रूप में प्रकट हो गये। रघुनाथ महन्त के अद्भुत रामायण के अनुसार पातालप्रवेश के बाद सीता को अपने पुत्रों को देखने की इच्छा होती है। उन्होंने वासुकि को उन्हें लाने भेजा। वासुकि ब्राह्मण के वेष में बालकों को अस्त्र- विद्या सिखाने का बहाना बना कर उनको सीता के पास ले गये। राम ने उन्हें वापस लाने के लिए हनुमान् को भेजा। हनुमान् स्त्रीरूप धारण कर पाताल में प्रविष्ट होकर रत्नमञ्जरी नामक सीता की सखी कहकर सीता के पास जाने लगे। सीता ने नागों को आदेश दिया कि इस स्त्री को पकड़ लाओ। तब हनुमान् वानररूप से सबको परास्त करते हैं। तदनन्तर उन्होंने सीता से मिलकर लव और कुश को राम के पास ले जाने का निवेदन किया। सीता सहमत हुईं। वे स्वयं सिंहासन पर विराजमान होकर राम के समक्ष भूमि से प्रकट हुईं। राम के हाथों लव और कुश का समर्पण कर सीता यह प्रतिज्ञा कर अन्तर्धान होती है कि प्रतिदिन नित्य क्रिया के पश्चात् आपकी सेवा में उपस्थित हुआ करूँगी। रामकेति एवं रामकियेन के अनुसार लव-कुश-युद्ध के बाद सीता ने दोनों पुत्रों को सौंप दिया। अयोध्या लौटाने का राम का अनुरोध स्वीकार नहीं किया। जब राम ने अपनी मृत्यु का समाचार भिजवाया तब सीता लौट कर राम के शरीर के सामने विलाप करने लगी। तब राम परदे की ओट से प्रकट होकर सान्त्वना देने लगे। तब वे क्रुद्ध होकर नागराज विषण की शरण लेकर पृथ्वी में प्रवेश कर गयीं। हनुमान् ने भी पाताल जाकर सीता से लौटने का अनुरोध किया। सीता ने अस्वीकार कर दिया। अन्त में राम के राक्षस-वध कार्य से सन्तुष्ट हो इन्द्र ने देवताओं की सभा में ईश्वर से राम के विरह का वर्णन किया। ईश्वर ने राम और सीता दोनों को कैलास बुला कर समझाया। राम ने सीता से क्षमा माँगी। अन्त में सीता ईश्वर का अनुरोध मान कर अपने पति के साथ अयोध्या लौट गयीं। इस तरह अनेक कथाएँ बुल्के ने उद्धृत कर रामकथा में अराजकता फैलाने का प्रयत्न किया
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९९ हैं। उनके मतभेद का अनुचित लाभ उठाकर वे सबको अप्रामाणिक एवं विकास या प्रक्षेप सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत और पुराणों के अनुसार ही रामचरित का निर्धारण किया जा सकता है। अन्य कथाओं को उनके अनुकूल ही लगाना चाहिये। राम सीता के सम्बन्ध में सदा ही शङ्कारहित थे। लोकापवाद निवारण एवं लोकसंग्रह की दृष्टि से ही राम ने अग्निपरीक्षा के पहले ही शङ्का की थी। अग्नि-परीक्षा के बाद तो शङ्का का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था, किन्तु स्वयं राम के द्वारा अग्नि- परीक्षा तथा सीताशुद्धि का प्रचार इतना महत्त्वपूर्ण नहीं समझा जाता, जितना एक कन्द-मूल-फलाशी, वल्कलवसनधारी तपोघन महर्षि के द्वारा उचित समझा गया। इसी लिए लोकापवाद के कारण सीता को वन में भेजना ही उचित समझा। वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रघुवंश, उत्तर- रामचरित आदि में स्पष्ट देखा गया है कि राम का सीता में शुद्धप्रेम ज्यों का त्यों था, और यज्ञों में सीता की स्वर्णप्रतिमा ही यजमानपत्नी के रूप में विराजमान थी। सीता भी राम की इस स्थिति को जानती थी। रघुवंश के अनुसार उन्होंने यही कहा था कि प्राणीमात्र के प्रति कल्याण बुद्धि रखनेवाले आपका मुझपर कामचार नहीं है। यह दुःख वज्रपात मेरे ही कर्मों का फल हो सकता है— "कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममेव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ॥" आगे वह कहती हैं— "साऽहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा ने जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ॥" मैं प्रसव के अनन्तर सूर्याभिमुख रहकर इसलिए तपश्चर्या करूंगी कि जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और पुनः कभी वियोग न हो। इससे विरुद्ध कल्पनाएँ देश और काल की परिस्थिति के प्रभाव से विकृति- स्वरूप ही समझनी चाहिये । उपसंहार उपसंहार में बुल्के ने पूर्व की वस्तुओं को दुहराया भर है। वे आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की रचना का आधार उन प्रत्यक्ष अनुभवों एवं आर्ष विज्ञानों, जो वाल्मीकिरामायण में वर्णित हैं, को न मानकर रामकथाविषयक गाथाओं तथा आख्यानकाव्यों को मानते हैं, जो कि उपस्थित का परित्याग एवं अनुपस्थित की कल्पना ही है। वे कहते हैं कि "जिस दिन प्राचीन गाथासाहित्य को वाल्मीकि ने एक कथासूत्र में ग्रथित कर आदिरामायण की सृष्टि की थी, उसी दिन से रामकथा की दिग्विजय प्रारम्भ हुई थी और वह काल भी ईसा की कुछ शती पूर्व का ही है।" परन्तु वह सत्य का अपलाप ही है। वाल्मीकिरामायण से ही विदित है कि राम के राज्यकाल में ही ब्रह्मा की प्रेरणा से आर्ष ज्ञान प्राप्त कर महर्षि ने सीताचरित्र या रामायण का निर्माण किया था। सीता के पुत्र कुश एवं लव को गानविद्योपजीवी कहना भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के सर्वथा विरुद्ध है। महाभारत रामोपाख्यान, हरिवंश आदि सभी प्रचलित रामायण पर ही निर्भर हैं। उनका आधार बुल्के की तथाकथित आदिरामायण प्रमाणशून्य ही है। राम का अवतार भी भावना नहीं प्रमाण- सिद्ध वस्तुस्थिति है। बौद्ध और जैन साहित्य में जैनी साधक या बोधिसत्त्व बनकर स्थान प्राप्त करना राम के लिए कोई महत्त्व की बात नहीं है। किन्तु जैनों और बौद्धों ने रामकथा की लोकप्रियता का अनुचित लाभ उठाकर कथा को विकृत ही बनाया है। वे कहते हैं कि "जैनियों के अनुसार राम, लक्ष्मण तथा रावण जैनधर्मावलम्बी ही नहीं, जैनियों ने उन्हें अपने महापुरुषों में स्थान दिया है। राम ब्राह्मण-
७०० रामायणमीमांसा विंश धर्म में विष्णु के अवतार, बौद्धों में बोधिसत्त्व, तथा जैनधर्म में आठवें बलदेव माने गये हैं । संस्कृतसाहित्य, संस्कृत-ललितसाहित्य की प्रत्येक शाखा में, भारतीय भाषाओं एवं निकटवर्ती देशों के साहित्यों में राम- कथा एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्तकर सकी। इस विस्तृत रामकथासाहित्य से रामकथा की व्यापकता और लोकप्रियता का अनुमान किया जा सकता है।" किन्तु राम के स्वाभाविक अनन्त गुणों एवं महिमा का यह अनिवार्य प्रभाव था। जैसे विरोधी भी किसी न किसी रूप में ईश्वर से प्रभावित होते हैं, उसी तरह राम के आदर्श एवं चरित्रों के विरोधी लोग भी रामकथा से असंस्पृष्ट नहीं रह सके । अनु० ७६० वें में वे कहते हैं कि "संस्कृत-धार्मिकसाहित्य में रामकथा का व्यापक प्रभाव कम था, क्योंकि एक तो वैदिक साहित्य के निर्माणकाल में रामकथा प्रचलित नहीं थी, दूसरे रामभक्ति की उत्पत्ति से पूर्व जनसाधारण के धार्मिक जीवन में रामकथा के लिए व्यापक स्थान नहीं था। वैदिक साहित्य में रामकथा का नितान्त अभाव था । हरिवंश तथा प्राचीनतम पुराणों में अवतारों के साथ राम का नाम भी लिया गया है। इनकी संक्षिप्त कथा आदिरामायण पर समाश्रित थी । बाद के महापुराणों तथा उपपुराणों में रामकथाविषयक सामग्री बढ़ने लगी । विशेष कर स्कन्दपुराण, पद्मपुराण तथा महाभागवत देवीपुराणों में रामभक्ति पल्लवित होने के पश्चात् असंख्य साम्प्रदायिक रामायणसंहिताएँ प्रचलित हुईं, जिनमें अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, तत्त्वसंग्रह आदि उल्लेख्य हैं।" इससे स्पष्ट ही है कि बुल्के अपनी काट-छांट से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि रामायण ई० दो तीन शताब्दी पूर्व लिखी गयी । उसमें भी राम को विष्णु या ब्रह्म नहीं माना गया था। वेदों के समय रामकथा नहीं थी। रामभक्ति एवं रामकथा अर्वाचीन ही हैं। रामभक्ति के प्रभाव से ही विविध रामायणों में परिवर्तन, परिवर्धन, विकास और प्रक्षेप हुए हैं। इस तरह वे छलछद्म से रामकथा के प्रशंसक बनकर भी वस्तुतः उसका एवं उसके नायक राम का अपकर्ष ही वर्णन करते हैं। पर वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत है। वेद तथा उपनिषदें अनादि हैं। उनके उपबृंहणभूत रामायण, महाभारत, पुराण भी अनादि हैं। उनका समय-समय पर ऋषियों द्वारा आविर्भावमात्र होता है। उनके अनुसार राम अनन्त ब्रह्माण्डों के नायक परब्रह्म हैं। उनकी भक्ति अनादि है। वैदिक साहित्य में भी रामकथा पर्याप्तमात्रा में है ही। रामायण उसी का उपबृंहणमात्र है। यह सब मेरे लिखे तत्तत् प्रकरणों से सिद्ध है। वे रघुवंश, रावणवध, भट्टिकाव्य, महावीरचरित, जानकीहरण, कुन्दमाला, अनर्घराघव, बालरामायण, महानाटक आदि तथा रामसम्बन्धी श्लेषकाव्य, विलोमकाव्य, चित्रकाव्य तथा शृंगारिक खण्डकाव्यों से संस्कृतसाहित्य में राम- कथा का विकास मानते हैं । आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी रामकथा की व्यापकता अद्वितीय है। किन्तु इन सब भाषाओं का सर्वप्रथम महाकाव्य प्रायः कोई रामायण ही है तथा बाद की बहुत सी रचनाओं की कथावस्तु भी रामकथा से सम्बन्ध रखती है। इसके अतिरिक्त इन सब भाषाओं का सबसे लोकप्रिय काव्यग्रन्थ प्रायः कोई रामायण ही है। उनमें तमिलरामायण, द्विपदरामायण, तोरवेरामायण, असमियारामायण, कृत्तिवासरामायण, रामचरितमानस, बलरामदासरामायण, भावार्थरामायण आदि काव्य हैं। परन्तु बुल्के उनके प्रतिपाद्य सिद्धान्तों को महत्त्व नहीं देते। उन सिद्धान्तों एवं प्रतिपाद्य अंशों को भक्तभावना का विलास एवं विकासमात्र मानकर सन्तोष कर लेते हैं। वे अपने को तुलसीदास का विशेष भक्त कहते हैं, किन्तु तुलसी के परब्रह्म राम को वे उनकी भावनामात्र मानते हैं। वे भारतीय साहित्य में रामकथा की व्यापकता की अपेक्षा विदेश में उसको लोकप्रियता को आश्चर्यजनक मानते हैं। उनमें बौद्ध अनामकं जातकं, दशरथकथानं और उनके चीनी भाषानुवाद, तिब्बती, खोतानी आदि रामायण भी हैं। हिन्दोनेशिया की सेरीराम, सेरतकाण्ड, रामकेति, रामकियेन आदि प्रमुख हैं। बुल्के यह भी मानते हैं कि रामकथा की इस व्यापकता एवं लोकप्रियता का श्रेय वाल्मीकिकृत रामायण को ही है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शायद ही किसी ऐसे कवि का प्रादुर्भाव हुआ हो जिसने भारत के आदि कवि के समान इतने व्यापक रूप
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७०१ से परवर्ती साहित्य को प्रभावित किया हो । बुल्के का यह कथन तभी महत्त्वपूर्ण होता यदि वे वाल्मीकिरामायण के भारत एवं भारतीय टीकाकारों द्वारा स्वीकृत रूप को मानते और तदनुसार ही राम की नररूपता के साथ नारायण- रूपता भी समझ पाते । अतः पाश्चात्य ईसाई कूटनीतिज्ञों की प्रशंसा निस्सार तथा अविश्वसनीय ही होती है। जैसे कि मैक्समूलर ने एक जगह वेदों को मानव जाति की सर्वप्रथम भाषा कहकर प्रशंसा की है। अन्यत्र यह भी कह दिया है कि आज हम जिस परिस्थिति में रह रहे हैं उसमें वेदमन्त्र जैसे ऊलजलूल वस्तुओं को मँडराते रहने का कोई अधिकार नहीं है। वे कहते कि प्रस्तुत सिंहावलोकन सामग्री से स्पष्ट है कि रामकथा न केवल भारतीय वरन् एशियाई संस्कृति का महत्त्वपूर्ण तत्त्व बन गयी है। वस्तुतः तोड़-मरोड़ एवं विविध विकृतियाँ रामकथा में अगर न लायी गयी होतीं तो वह सम्पूर्ण विश्व एवं मानवता की संस्कृति का सर्वस्व होता। अब भी अविकृत वाल्मीकिरामायण महाकाव्य सम्पूर्ण संसार के सन्मुख सर्वाङ्गीण सर्वतोमुखी, सर्वतोभद्र अभ्युदय एवं निःश्रेयस का मार्ग और आदर्श उपस्थापित करता है। ७६५ वें अनु० में विभिन्न रामकथाओं की मौलिक एकता की चर्चा करते हुए वे डा० वेबर, डा० याकोबी, दिनेशचन्द्र आदि के मतों की आंशिक समालोचना भी करते हैं। बेचारे वेबर तो फिर भी सीताहरण, रावण आदि का मूल रूप वैदिक साहित्य में ही मानते हैं, परन्तु बुल्के वैसा नहीं मानते हैं। बुल्के यह भी कहते हैं कि "उनकी दृष्टि में दूसरे भाग की घटनाओं का मूल रूप वैदिक साहित्य में सुरक्षित है, इसके लिए कोई प्रमाण नहीं दिया गया। इस भाग की प्रधान कथावस्तु "स्त्रीहरण और उसके लिए युद्ध" असाधारणतया अलौकिक नहीं कही जा सकती। अतः राम के निर्वासन की भाँति सीताहरण तथा रावण-वध अर्थात् रामकथा की समस्त आधिकारिक कथावस्तु का ऐतिहासिक आधार मानना अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है। अतः रामकथा के दो अथवा तीन स्वतन्त्र भागों की कल्पना का कहीं भी समीचीन आधार नहीं मिलता, अतः रामकथाविषयक आख्यानकाव्य एक ही मूल स्रोत रह जाता है। अर्थात् एक ऐतिहासिक घटनासम्बन्धी प्राचीन आख्यानकाव्य के आधार पर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की।" परन्तु समुद्र पार के रहनेवाले तथा भारतीय परम्परा से सर्वथा अनभिज्ञ बुल्के को जानना चाहिये कि उनकी इस कल्पना से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण स्वयं रामायण के अविभाज्य अङ्ग बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड हैं, जिनमें रामायण का मूलस्रोत वेद, उपनिषद् तथा ब्रह्मा का वरदान, महर्षि वाल्मीकि की समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा आर्षज्ञान द्वारा सम्पूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शन रामायण का मूल स्रोत है। वेद का उपबृंहण करने के लिए ही महर्षि ने अपने शिष्य सीतापुत्रों को वाल्मीकिरामायण महाकाव्य पढ़ाया था। पुराणों द्वारा भी इसी की पुष्टि होती है। पुराण तो स्पष्ट ही कहते हैं-वेदवेद्य परमात्मा जब दशरथनन्दन राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी रामायण के रूप में महर्षि प्राचेतस के मुख से अवतीर्ण हुए- 'वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ॥” लौकिक घटनाओं द्वारा भी अलौकिक तत्त्व का सम्बन्ध रहता है। लौकिक वाक्, त्वक् और चक्षु द्वारा भी सात्त्विकी, राजसी, वैदिकी तथा लौकिकी प्रवृत्तियों के संघर्ष से भी देवासुर-संघर्ष परिलक्षित होता है। यह छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों की प्राणविद्या से स्पष्ट है। लौकिक भोजन में भी प्राणाग्निहोत्र का विधान है। उसी तरह राम और रावण एवं कौरव और पाण्डव संघर्ष द्वारा देवासुर-संग्राम बोधित होता है, पर वह गौणरूप से ही। उस स्थिति में कृषि की अधिष्ठात्री सीता तथा पर्जन्य एवं इन्द्र के अधिष्ठाता देवता राम एवं वृत्र का प्रतिनिधि रावण सरलता से समझा जा सकता है। वृत्र या रावण द्वारा परिम्लान कृषिदेवता सीता का संत्राण इन्द्र राम द्वारा होना स्वाभाविक है। आन्तर देवासुर-संघर्ष ही कभी बाह्य राम-रावण के संघर्ष तथा कौरव-पाण्डव के संघर्ष का रूप धारण
कर लेता है । मन्त्ररामायण के विवरण में वेदमन्त्रों द्वारा अनेक रामचरित वर्णित हैं । उपनिषदों में और व्यक्तरूप से रामचरित का वर्णन है । इस तरह अलौकिक तथा नित्य होने पर भी रामकथा लौकिक एवं ऐतिहासिक हो जाती है । ऐसे प्रामाणिक स्रोत को छोड़कर अप्रामाणिक अनुपलब्ध काल्पनिक गाथाओं एवं आख्यानों को रामायण का स्रोत मानना सर्वथा असङ्गत ही है । बौद्ध-त्रिपिटक की गाथाएँ तथा महाभारत वनपर्व तथा द्रोणपर्व की अत्यन्त संक्षिप्त रामकथाएँ भी वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर हैं, क्योंकि विस्तृत कथा से ही आवश्यकतानुसार संक्षेप किया जा सकता है । वेदों एवं उपनिषदों में बड़ी से बड़ी कथाओं का भी सूत्ररूप में वर्णन होता है । अतः उन्हें भी आख्यानकाव्यों पर आदृत मानना उचित है । वस्तुस्थिति तो यह है कि जैसे आज अनेक आख्यान वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर हैं वैसे ही पाली, चीन, बौद्ध रामकथाएँ भी वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप हैं । अतएव बुल्के यह ठीक ही कहते हैं कि उनका मूल स्रोत ब्राह्मण-रामकथा ही है । चाहे गद्य हो चाहे संक्षिप्त हो उनका आधार अप्रामाणिक अनुपलब्ध आख्यान नहीं हैं । जैसे महाभारत का संक्षिप्त रामोपाख्यान रामायण पर निर्भर है वैसे ही अतिसंक्षिप्त पूर्वोक्त चीनी और पाली कथाएँ तथा द्रोणपर्व और शान्तिपर्व की अतिसंक्षिप्त कथाएँ भी रामायण पर निर्भर हैं। यह मानना उचित है । बुल्के कहते हैं कि जैन रामकथा में न केवल मिथ्या ब्राह्मण-रामकथा का उल्लेख है वरन् इनके कथानक के निरीक्षण से स्पष्ट है कि जैन कवि वाल्मीकिरामायण से भली-भाँति परिचित थे तथा उन्होंने उसकी कथावस्तु के प्रसङ्गों को जानबूझकर बदलकर एक नया रूप दिया है । इस सम्बन्ध में हम बुल्के से सर्वथा सहमत हैं । वज्रमुख की कन्या लङ्का देवी का वृत्तान्त, नल तथा नील द्वारा समुद्र, सेतु तथा सुबेल राजाओं की पराजय, द्रोणमेघ की कन्या विशल्या के स्नानजल से लक्ष्मण की चिकित्सा करने का प्रसङ्ग इसके उदाहरण समझे जा सकते हैं । अन्य संस्कृत तथा भारतीय भाषाओं के साहित्यों तथा विदेशी रामकथा-साहित्य का मूल स्रोत वाल्मीकिरामायण की रामकथा ही है । यह भी बुल्के का कहना ठीक ही है । इस अत्यन्त विस्तृत भारतीय तथा विदेशी रामकथा-साहित्य में कहीं परस्पर विरोधी बातें मिलती हैं । इस विरोध का साम्प्रदायिक साहित्य में समन्वय है ही । विभिन्न कल्पों में कोटि-कोटि रामावतार हुए हैं । इन असंख्य अवतारों के कारण रामचरित में विभिन्नता आ गयी है । परन्तु बुल्के इसे साम्प्रदायिक मत मानते हैं । लेकिन यह संगत नहीं है । बुल्के राम को ईश्वर नहीं मानते, न ही उन्हें ईश्वर का अवतार मानते हैं । इसी लिए उन्हें यह साम्प्रदायिक प्रतीत होता है । परन्तु वाल्मीकिरामायण में राम की ब्रह्मरूपता, युद्धकाण्ड जैसे सर्वसम्मत प्रामाणिक काण्ड में भी, स्वीकृत है । तभी आनन्दरामायण का यह कहना सम्मत हुआ है कि — “पुनः पुनः कल्पभेदाज्जाताः श्रीराघवस्य च । अवताराः कोटिशोऽत्र तेषु भेदः क्वचित् क्वचित् ॥” ( पूर्णकाण्ड ७।२९ ) तुलसीदास भी यही कहते हैं— “कलप भेद हरिचरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन गाये ॥” मत्स्यपुराण ( ५३।१० ), अद्भुतरामायण ( सर्ग १ ), आनन्दरामायण ( यात्राकाण्ड सर्ग २; राज्य- काण्ड सर्ग १ ), पद्मपुराण ( ४।१।२४ ) आदि में वाल्मीकिकृत एक शतकोटिप्रविस्तर रामायण का उल्लेख है, जिसके विभाजन से ही विभिन्न रामायणों का आविर्भाव है । सम्प्रदाय शब्द का अर्थ है—किसी विद्या का, कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड तथा अवान्तर किसी विषय का अनादि अविच्छिन्न पारम्पर्य । यहाँ सम्प्रदाय शब्द का अनुचित या संकीर्ण दलबन्दी या फिरकापरस्ती अर्थ नहीं है, जैसा कि आजकल समझा जाता है । उसी अविच्छिन्न आचार्य-पारम्पर्य रूप सम्प्रदाय के बल पर वेद की अपौरुषेयता तथा अनादिता स्थित है । उसी आधार पर मन्त्र के तुल्य ही ब्राह्मणभाग का भी अविच्छिन्न पारम्पर्य है-‘तुल्यं साम्प्रदायिकम्’ ( जै० सू० ) में कहा गया है कि जैसे मन्त्रों में साम्प्रदायिकता
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७०३ के आधार पर अनादिता अपौरुषेयता है वैसे ही ब्राह्मणभाग में भी साम्प्रदायिकता अनादि अविच्छिन्न आचार्य-पारम्पर्य के कारण अपौरुषेय अनादि होने से स्वतः प्रामाण्य मान्य है। अतएव उस प्रामाणिक साहित्य में रामकथाओं का मूलस्रोत शतकोटिश्लोकात्मक रामायण ही है। विभिन्न अवतारों के कारण कथाओं में मौलिक भेद भी इसी तरह उपपन्न हो जाता है। परन्तु बुल्के इसे न मानने में हेतु देते हुए कहते हैं—"एक ओर इसी प्रकार की रामकथाओं के अस्तित्व के बहिरङ्ग प्रमाण नहीं दिये जा सकते और दूसरी ओर अन्तरङ्ग प्रमाण नहीं मिलते।" परन्तु उनके दोनों हेतु स्वयं में निष्प्रमाण हैं, क्योंकि अतीत घटनाओं में प्रमाण प्रामाणिक उल्लेख ही हो सकता है। प्रामाणिक उल्लेख पुराणों तथा रामायणों में मिलता ही है। विभिन्न गाथाओं या आख्यानकाव्यों का तो स्वरूप ही उपलब्ध नहीं है, फिर उनमें अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग प्रमाण का तो प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि जिसका स्वरूप ही सिद्ध नहीं होता उसका किसी भी हेतु से त्राण नहीं होता— "न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः।" दार्शनिकों का मत है कि हेतुओं से उसकी रक्षा नहीं हो सकती जो उत्पन्न होते ही मर जाता है। फलतः वाल्मीकिरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों आदि के अनुसार भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण ही सब रामकथाओं का मूलस्रोत है। उस मूल के भी मूलस्रोत वेद तथा उपनिषद ही हैं। बुल्के की रामकथा में रामकथा-साहित्य की विभिन्नताओं का जो तुलनात्मक अध्ययन किया गया है वह स्वयं अशुद्ध, असङ्गत और अपूर्ण है, यह दिखाया जा चुका है। परन्तु आज शतकोटिप्रविस्तर रामायण प्रमाणसिद्ध होने पर भी सम्पूर्ण रूप से वैसे ही उपलब्ध नहीं है जैसे ११३१ वेदों की शाखाएँ होने पर भी उपलब्ध नहीं हैं। फलतः शतकोटिप्रविस्तर रामायण आज उपलब्ध नहीं है, किन्तु उसका सारभूत चतुर्विंशत्साहस्री संहिता वाल्मीकि- रामायण विद्यमान है। प्रायः अधिकांश भारतीय एवं अभारतीय रामकथाओं का आधार वही है। फिर भी अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, वसिष्ठरामायण तथा पुराणों, संहिताओं तथा विभिन्न रामायणों को जिनका वाल्मीकिरामायण से समन्वय नहीं हो सकता तथा जिनमें मौलिक भेद हैं उन सब रामायणों को शतकोटि प्रविस्तर रामायण का ही अंश मानना उचित है। बुल्के की दृष्टि है कि उन सबको विकास, परिवर्धन, परिवर्तन या मिथ्या कल्पना ही समझना चाहिए। किन्तु उनकी दृष्टि में प्रचलित रामायण भी प्रामाणिक नहीं है। वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सर्वथा नवीन हैं तथा शेष काण्डों में भी पर्याप्त प्रक्षेप हैं। उनकी तथाकथित आदि- रामायण भी उन गाथाओं आख्यान काव्यों पर निर्भर है जिनका अस्तित्व ही न तो उपलब्ध है और न प्रमाणसिद्ध ही है। ऐसी स्थिति में उनके अनुसार प्रसिद्ध एवं उपस्थित का अपलाप, प्रामाणिक वेद, उपनिषद्, शतकोटिप्रविस्तर रामायण, वर्तमान वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायणसंहिताओं और पुराणों की रामायणों का अप्रामाण्यापादन और अप्रसिद्ध की कल्पना तथा उसका प्रामाण्यापादन आदि अनेक दोष आते हैं। ७६८ वें अनु० में वे कहते हैं कि "रामायण के प्रामाणिक काण्डों (अर्थात् अयोध्या से लेकर युद्धकाण्ड तक पाँच काण्डों) के कथानक पर आदि कवि की छाप इतनी स्पष्ट है तथा इसमें आधिकारिक कथावस्तु की गति इस प्रकार अबाधरूप से आगे बढ़ती है कि बाद की रामकथाओं में इन काण्डों का कम विकास हुआ है।" इससे स्पष्ट ही है कि बुल्के बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड को प्रामाणिक नही मानते तथा अवशिष्ट पाँच काण्डों में भी जिन्हें वे प्रामाणिक मानते हैं, उनमें भी परिवर्धन, विकास या प्रक्षेप मानते हैं। फलतः इन काण्डों में राम, सीता आदि की ब्रह्मरूपता, लक्ष्मीरूपता और हनुमान् आदि की दिव्यता देवरूपता आदि का जो वर्णन है उसे वे प्रक्षिप्त या विकास का परिणाम मान लेते हैं। इसी तरह बुल्के अर्वाचीन साहित्यों में मायासीता के हरण को महत्वपूर्ण परिवर्तन मानते हैं। और उसका आधार उनकी दृष्टि में आदर्शवाद और भक्तिभावना ही है। अतएव वे कहते हैं कि माया-सीता के इस
४. चतुर्थ काण्ड: युद्ध एवं उत्तरकाण्ड: रावण-वध, सीता-अग्निपरीक्षा, रामराज्य व महाग्रन्थ उपसंहार
वृत्तान्त का क्रमिक विकास देखकर किसी स्वतन्त्र रामकथा की कल्पना नितान्त निर्मूल सिद्ध होती है । बुल्के का उक्त कथन भी निस्सार है, क्योंकि यह कहा जा चुका है कि ईश्वर के ऐश्वर्यपूर्ण और माधुर्यपूर्ण दो प्रकार के चरित्र होते हैं । प्रथम पक्ष में अलौकिकता तथा दिव्यता का वर्णन बाहुल्येन होता है । द्वितीय पक्ष में लौकिकता का प्राधान्य रहता है । प्रथम पक्ष वैधी भक्ति का विषय होता है एवं द्वितीय पक्ष रागानुगा भक्ति का विषय होता है । वाल्मीकि- रामायण में अधिकांश माधुर्यपूर्ण चरित्र का वर्णन होने से लौकिकता का ही प्राधान्य है । उपनिषदों, पुराणों, संहिताओं तथा अध्यात्म आदि रामायणों में ऐश्वर्यपूर्ण चरित्र का प्राधान्येन वर्णन है । फलतः वाल्मीकिरामायण में सामान्यतया राम को एक आदर्श पुरुष तथा सीता को एक आदर्श नारी के रूप में चित्रित किया गया है । क्वचित् क्वचित् प्रसंगानुसार उनकी ब्रह्मरूपता भी वर्णित है । परन्तु द्वितीय पक्षवाले ग्रन्थों में अलौकिक अंशों का ही प्राधान्येन वर्णन है, अतः उन ग्रन्थों में मायासीता-हरण का वर्णन ठीक ही है । इसके अतिरिक्त रावण आदि का मरण देवताओं और दानवों के द्वारा न होकर नर और वानरों द्वारा ही होता है; इसलिए भी राम, सीता, सुग्रीव, हनुमान् आदि के लौकिक रूप का ही प्राधान्येन वर्णन है । स्वतन्त्र रामकथा न होने पर भी अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग, व्यक्त तथा अव्यक्त रूप, गुण आदि का वर्णन सर्वथा सङ्गत ही है । अतीत घटनाओं एवं वस्तुस्थितियों में तर्कों एवं कल्पनाओं का मूल्य कुछ भी नहीं है, क्योंकि वे वस्तुस्थिति के विपरीत हो सकती हैं। इतिहास एवं देवता, ऋषि आदि के वचन ही मुख्य प्रमाण होते हैं। अतः मायासीता-हरण या राम और सीता की दिव्यरूपता तथा अलौकिकता को भक्तिभावना या आदर्शवाद से प्रेरित कल्पनामात्र कहकर उनको अप्रमाण मानना सर्वथा कलुषित मनोवृत्ति का परिचायक है और आर्ष वचनों का अप्रा- माण्य सिद्ध करने का साहसमात्र है । वाल्मीकिरामायण से अन्य रामकथाओं में भी अधिकांश का समन्वय ही है । सीता, कुश, लव, हनुमान् आदि के जन्म ओर सम्बन्ध की विभिन्नता को लेकर बुल्के क्रमिक विकास की पुष्टि करना चाहते हैं । परन्तु विकास या कल्पनामात्र मानकर तो तत्सम्बन्धी आर्ष प्रमाणवचनों को झुठलाना होगा । विपरीत कल्पनाओं को निस्संकोच अप्रमाण ही मानना उचित है, जैसा कि सीता के जन्म के सम्बन्ध में बुल्के भी मानते है । दशरथजातक के अनुसार राम और लक्ष्मण दशरथ के औरस पुत्र एवं सीता औरस पुत्री थीं । इस तरह सीता राम और लक्ष्मण की सहोदरी बहन थीं । बुल्के कहते हैं कि दशरथजातक की रामकथा न केवल ब्राह्मण-रामकथा का विकृत रूप है वरन् उसका रचनाकाल भी वाल्मीकिरामायण के काल से शताब्दियों बाद ही मानना चाहिये । अतः सीता का दशरथ-पुत्री होना बौद्धों की दुषकल्पनामात्र है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता का अयोनिजा होना ही सिद्ध है । वेदवती-वृत्तान्त का भी उसी के साथ समन्वय दिखलाया गया है । वाल्मीकिरामायण की सामग्री से ही सीता की विभिन्न जन्मकथाओं का विकास हुआ है, यह अंशतः ठीक ही है । भूमिजा या अयोनिजा होने पर भी व्यवहारतः सीता जनकजा तो है ही । रावणात्मजा सीता का आर्ष ग्रन्थों से समर्थन नहीं होता, अतः उसे भी विकृति ही मानना उचित है । हनुमान् की कथा का भी आधार वाल्मीकिरामायण ही है । उनके सम्बन्ध में भी बुल्के की विकासकल्पना निराधार है । पुराणों के अनुसार वे शिवावतार हैं । रामायण से भी अप्रतिषिद्ध होने से वह अनुमत ही है । वे वायु- पुत्र अंजनीनन्दन हैं । शिव से हनुमान् के उत्पन्न होने की बात कल्पना नहीं है, वह पुराणादि सम्मत है । जैसे कार्तिकेय शिवपुत्र होने पर अग्नि ने रुद्रतेज को धारण किया था उसी तरह शिवतेज के वायु द्वारा अञ्जना को प्राप् होने से उनके वातात्मज एवं शिवांश होने में कोई विरोध नहीं रह जाता । सीतातयाग की कथाओं की मिथ्या कल्पना द्वारा रामायण से संगति लगाना वस्तुतः असंगत ही है । कवियों को रसाभिव्यक्ति के लिए सौष्ठव या रोचकता के अनुकूल रूपकों की कल्पनाओं में कुछ स्वातन्त्र्य अवश्य है ।
परन्तु उसका आधार इतिहास एवं पुराण होना ही चाहिये । अतः पुराणों तथा संहिताओं के अनुसार कल्पभेद के अनुसार उनकी वास्तविकता को स्वीकार कर ही समन्वय करना उचित है । यही स्थिति सीतात्याग के सम्बन्ध में भी समझनी चाहिये । सामान्यतया लोकापवाद और धोबी के अपवाद में समन्वय हो ही सकता है, फिर भी यह तय है कि धोबी जैसे कुछ इनेगिने लोग ही सीता के निन्दक थे, तो भी राम ने बहुमत का ही नहीं अल्पमत का भी सम्मान करने का उदाहरण उपस्थित किया था । अतएव बहुजनहिताय बहुजनसुखाय जैसे आधुनिक आदर्श वाक्यों की अपेक्षा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय के आदर्श को प्रोत्साहन दिया था । रावण-चित्र आदि की कल्पना किसी अंश में प्रामाणिक होने पर भी सर्वांश में प्रामाणिक नहीं । बाल्मीकिरामायण प्रोक्त सीता के आदर्श के विरुद्ध सभी कल्पनाएँ अप्रामाणिक ही हैं । प्रामाणिक कथाओं का ही समन्वय करना आवश्यक है । अप्रामाणिक कल्पनाओं का तो खण्डन करना ही उचित है । इसी तरह रजस्तमोमयी छाया सीता का त्याग तथा सात्त्विकी सीता का राम के वामाङ्ग में निवास भी विकास की परिणति न होकर वस्तुस्थितिमूलक ही है । और जैसा कि पीछे कहा जा चुका है—चन्द्र-चन्द्रिका, भानु-प्रभा, जल-तरङ्ग, अमृत-माधुर्य एवं आनन्द-माधुर्यसार-सर्वस्व का जैसे विप्रलम्भ हो ही नहीं सकता वैसे ही सीता राम का तो विश्लेषण असंभव ही है । किन्तु जब स्थूलरूप से दोनों विग्रहवान् होते हैं, तभी संयोग और वियोग की कथा भी उपस्थित होती है । उनमें भी छायामयी काल्पनिक या मायामयी सीता का ही त्याग होना सङ्गत है । अचिन्त्यशक्तिसमुद्भूत सच्चिदानन्दमयी सीता का त्याग असंभव ही था, अतः लोकसंग्रहार्थ मायामयी सीता का त्याग ही वास्तविक है । इस स्थिति का माधुर्यलीला में स्पष्टीकरण न होकर ऐश्वर्यलीला में ही वर्णन करना उचित था । अतः पुराणादि में उसका वर्णन है, परन्तु बुल्के उसे नवीन कल्पना बता कर सन्तोष करते हैं । इसमें वे होमर काव्य की हेलन का भी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो अत्यन्त भद्दा एवं असङ्गत है । इसी तरह कुश और लव के चरित तथा कथानिवर्हण की विभिन्नता को भी बुल्के स्वाभाविक विकास का परिणाम मानते हैं और वे समझते हैं कि कुश नाम के आधार पर कुश घास से उसकी सृष्टि की कथा उत्पन्न हुई । परन्तु यह उनकी निराधार ही दुष्कल्पना है । वेदों और शास्त्रों में अन्वर्थ नामों का बहुधा उल्लेख मिलता है । अतः बाल्मीकिरामायण में स्पष्ट उल्लिखित है कि कुश के ऊर्ध्व भाग से मार्जन करने से कुश तथा कुश के अधोभाग ( लव ) से मार्जन करने से लव ये नाम प्रसिद्ध हुए । केवल बुल्के की अटकल से उस आर्ष उल्लेख को अप्रामाणिक मानना सर्वथा असङ्गत है । आगे बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार कुश और लव वाल्मीकि के साथ राम के अश्वमेधयज्ञ की भूमि में पहुँच कर रामायण का गान करते हैं । इनके वहाँ पहुँचने का कारणविशेष नहीं बताया जा सकता है । बाद की रामकथाओं में कुश और लव की वीरता दिखलाने के उद्देश्य से रामाश्वमेध के पूर्व राम-सेना से इनके युद्ध का वर्णन किया गया ।" परन्तु बुल्के का उक्त कथन अत्यन्त निस्सार है । कारण कि पूर्वापर प्रसङ्ग के अनुसार "कारण" स्पष्ट ही है । प्रथम तो बाल्मीकिरामायण से ही स्पष्ट है । रामाश्वमेध में राम ने जैसे अन्य ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों को यज्ञ में निमन्त्रित किया था, वैसे ही वाल्मीकि महर्षि को भी । महर्षि वाल्मीकि उसी यज्ञ में निमन्त्रित होकर गये थे । उनके साथ उनके आश्रमवासी सीता एवं उनके पुत्रों का जाना स्वाभाविक था । इसके अतिरिक्त सीताचरित्र रामचरित्र का निर्माण कर वेदार्थ उपबृंहण तथा जनकल्याण के साथ सीताचरित्र की विशुद्धि भी उद्देश्य था । इसी उद्देश्य से राम के सदृश परम सुन्दर सीतापुत्र कुश और लव को तन्त्रीवादन के साथ रामायण-गान कराया गया था । उनके रामायण-गान प्रचार की योग्यता की परीक्षा भी आश्रम में ली गयी थी । जिसमें वे पूर्णरूप से उत्तीर्ण हुए थे । रामाश्वमेध के प्रसंग से भारत एवं विश्व के सभी श्रेणी के राजर्षि, विविध वर्गों के प्रतिनिधि तथा देवता, राक्षस, ८९
वानर, भालू सभी एकत्रित थे । उस समारोह में रामायण के प्रचार तथा सीताचरित्र की शुद्धि के प्रचार का उत्तम अवसर था । रामायण की विशेषतः अयोध्याकाण्ड की घटनाओं को आँखों देखनेवाले लोगों की संख्या भी कम नहीं थी । उस बीच में रामायण की घटनाओं का गान हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ही था । उसका परिणाम भी वैसा ही हुआ । सारे समाज को सीता का लोकोत्तर चरित्र और महत्त्व विदित हुआ । स्थालीपुलाकन्याय से अयोध्याकाण्ड की घटनाओं का सत्य वर्णन सुनकर जनता को रामायण के अन्य काण्डों, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड एवं सुन्दरकाण्ड की घटनाओं पर विश्वास होना स्वाभाविक ही था । फलतः सीता की अनन्य रामभक्ति, अखण्ड पातिव्रत्य तथा अप्रतिम तेज पर भी विश्वास हुआ । लोगों की समझ में आ गया कि जो सीता हनुमान् की रक्षा के लिए अग्नि को भी शीतल होने (शीतो भव हनुमतः) का आदेश दे सकती थी वह सीता अपने पातिव्रत्य के तेज से रावण को भी भस्म होने का (भस्मीभूतो भव का) शाप दे सकती थी । उसने स्पष्ट कहा भी तो था— "असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥" दशग्रीव, राम का सन्देश न होने तथा तपस्या के पालन के उद्देश्य से मैं अपने तेज से तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ । बुल्के का यह कहना निस्सार है कि "वाल्मीकिकृत आदिरामायण ग्रन्थ राम के अभिषेक तथा उनके ऐश्वर्य- शाली राज्य के वर्णन पर समाप्त होता था । इस सुखान्त कथावस्तु में आगे चलकर उत्तरकाण्ड जोड़ दिया गया जिससे कि प्रचलित रामायण ग्रन्थ दुःखान्त हो गया । इसका परिणाम यह हुआ कि बाद की रामकथाओं को पुनः सुखान्त बनाने के प्रयत्न किये गये ।” परन्तु यह भी निस्सार है । सुखान्त कथावस्तु का होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता जितना कि चरित्रनायक के जन्मादि पूर्वभाग एवं पुत्र, पौत्रादि तथा साङ्गोपाङ्ग जीवन का वर्णन करना । यह भी समझना गलत है कि केवल सुखान्त बनाने की दृष्टि से ही मिथ्या कल्पना करके सीता का अयोध्या लौट आना वर्णित किया गया है । इस मिथ्या कल्पना की अपेक्षा शतकोटिप्रविस्तर रामायण एवं पुराणादि में उक्त कल्पान्तरीय चरित्रों में भेद अङ्गीकार करना उचित है । तथा च किसी कल्प में वस्तुतः सीता का पुनः राम के साथ अयोध्या प्रत्यावर्तन मानना ही उचित है । आर्ष ग्रन्थों का अप्रमाण कहने का दुस्साहस बुल्के ही कर सकते हैं । कोई आस्तिक भारतीय वैसा नहीं कर सकता । अतएव यह सही नहीं है कि "वाल्मीकिकृत रामायण के विकास तथा उसके कथानक पर विभिन्न प्रभावों के परिणामस्वरूप विस्तृत रामकथा-साहित्य में वैभिन्य आया है", क्योंकि विभिन्न प्रभावों एवं विकासों का अन्तिम अर्थ है— वस्तुस्थिति के विपरीत मिथ्या कल्पना । इसमें और अप्रामाणिक में कोई अन्तर नहीं है । ऐसे छलछद्मपूर्ण शब्दों के प्रयोग की अपेक्षा अप्रामाण्य कह देना कहीं श्रेष्ठ है । किन्तु पुराणों की दृष्टि से कल्पभेद की कथा वस्तुस्थितिमूलक है । जो पूर्वजन्म तक में विश्वास नहीं करते, यह सिद्धान्त उनके गले भले ही न उतरे, परन्तु आस्तिक भारतीय के लिए वैसा स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है । जनसाधारण में प्रचलित सर्वथा भिन्न कथाओं का अस्तित्व स्वीकार करने की आवश्यकता न होती यदि उनका मूल प्रमाणभूत आर्ष पुराणों में न होता । पुराणों को आधुनिक या अर्वाचीन मानना पाश्चात्यों के दुरभिसन्धि सहित दुस्संस्कारों का ही परिणाम है । अनु० ७७३ में बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा रामावतारविषयक सामग्री, कनकमृग-वृत्तान्त, सुग्रीव द्वारा वानरों के प्रेषण के समय दिग्वर्णन, लङ्कादहन, हनुमान् की हिमालय-यात्रा, अग्नि-परीक्षा, पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या- यात्रा आदि को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं । जो कि दुस्साहस ही है । यथास्थान उनके तत्सम्बन्धी तर्कों का खण्डन किया गया है । इसी प्रकार अहल्योद्धार विकास, अवतारवाद विकास, राम के बालचरित्र पर कृष्ण की बाललीलाओं का प्रभाव,
सीता-स्वयंवर के विकास, सीता-जन्मकथा के बाहुल्य, मायासीता का हरण, वाली और सुग्रीव की जन्मकथा, सौदास, शम्बूकवध, रावणचरित, हनुमान् के जन्म की कथा, सीता त्याग, कुश-लवचरित आदि अनेक विषय ऐसे हैं जिनके अभाव में राम की कथा अधूरी ही रह जाती है। परन्तु बुल्के इन सभी विषयों को विकास, परिवर्धन आदि के नाम से मिथ्या कल्पना एवं अप्रमाण कहते हैं। हमने उक्त विषयों का यथास्थान उपपादन करके बुल्के के तर्कों का खण्डन कर दिया है। “प्रामाणिक काण्डों की सुव्यवस्थित कथावस्तु पर वाल्मीकि की प्रतिभा की गहरी छाप है” इत्यादि बुल्के का कथन मायाजालमात्र है। सुन्दरकाण्ड के उत्तमोत्तम वर्णन, जिनको कोई भी भारतीय विद्वान् महत्त्वपूर्ण मानेगा, उनमें बुल्के को वाल्मीकि की प्रतिभा की छाप दिखायी नहीं देती। वे उसे धड़ल्ले से प्रक्षेप कह देते हैं। जब आदि- रामायण नाम की कोई सर्वसम्मत वस्तु है ही नहीं, तब “अतिशयोक्ति का अभाव, सन्तुलन तथा स्वाभाविकता उसके विशेष गुण हैं” यह भी कैसे सिद्ध होगा ? प्रचलित रामायण ही वाल्मीकि की कृति है। उसी के आधार पर उनकी विशेषता कही जा सकती है। उससे अतिरिक्त वाल्मीकि का परिचय एवं उनकी कृति का ज्ञान बुल्के को किस तरह हुआ इसे तो वही जान सकते हैं । यदि प्रचलित रामायण से अतिरिक्त वाल्मीकि की कोई सर्वसम्मत कृति उपलब्ध होती, तभी उसे कसौटी मानकर उसके आधार पर प्रचलित रामायण में काट-छांट की कल्पना कथंचित् सङ्गत कही जा सकती थी। परन्तु खपुष्पतुल्य अप्रामाणिक कसौटी से प्रत्यक्ष विद्यमान रामायण के मुख्य विषयों का अपलाप करना सर्वथा निष्प्रमाण ही है। वाल्मीकिरामायण से यह तो स्पष्ट ही है कि राम और उनका चरित्र वैदिक संस्कृति से प्रभावित है। वेद का प्रामाण्य और आदर रामायण में स्पष्टतः परिलक्षित होते हैं। अर्थवाद वेदों में भी विद्यमान है— “अनङ्गुलिरवयत् अमूर्धा प्रत्यमुञ्चत अन्धो मणिमविन्दत ।” तब रामायण में अर्थवाद क्यों न होगा ? इसके अतिरिक्त हनुमान् का समुद्रलङ्घन यदि अतिशयोक्ति है तब उसका वर्णन भी आपकी तथाकथित आदिरामायण में नहीं होना चाहिये। यदि किसी बड़े लङ्घन को ही समुद्र- लङ्घन कहना है तब तो आदि कवि की कृति को मिथ्या ही कहना है। यदि समुद्रलङ्घन हनुमान् के लिए सम्भव है तब हिमालय-यात्रा भी असम्भव एवं असङ्गत क्यों कही जाय ? और यदि यह सब संभव है तब तो हनुमान् द्वारा फल समझ कर सूर्य को पकड़ने के लिए छलाँग लगाना, इन्द्र के द्वारा वज्र से आहत होकर भी न मरना और ब्रह्मा, इन्द्र यदि देवताओं द्वारा विविध वरदान पाना भी अतिशयोक्ति क्यों ? और उसका आदिरामायण में अभाव क्यों ? काव्यों में अद्भुत रस भी एक आदरणीय रस है। यदि अलौकिक घटनाओं का बाहुल्य है तो उसका वर्णन दूषण नहीं भूषण ही है। अतएव दशरथ-यज्ञ, ‘भूमिजा सीता की कथा तथा राम-विश्वामित्र-संवाद का अपलाप सिर्फ अलौकिकता के कारण नहीं किया जा सकता । यही स्थिति वाली और सुग्रीव की जन्मकथा, सीता के भूमि-प्रवेश आदि के सम्बन्ध में भी है। जिन्हें भारतीय वेदों, महाभारत, रामायण तथा पुराणों का परिचय है और उनके प्रामाण्य और अप्रामाण्य के विवेचन की बुद्धि है और जो ईश्वर की शक्ति से अनन्त ब्रह्माण्डों के निर्माण में विश्वास रखते हैं, उनकी दृष्टि में रामजन्म के समय अलौकिक घटनाओं का होना, राम का अपना स्वरूप दिखाना आदि सब कुछ सङ्गत ही है। इसी तरह अवतारवाद एवं राम की भक्ति को भी विकास मानना निराधार है। वाल्मीकिरामायण से ही सिद्ध है कि राम विष्णु या परब्रह्म हैं तब तो वे मुक्तिदाता हैं ही। इसमें वैसा चित्रण करना भावुकता या मिथ्या कल्पना नहीं है। इसी तरह शापों और वरों की भी कोई कल्पना नहीं कर ली गयी, किन्तु सर्वज्ञकल्प महर्षियों ने ऋतम्भरा प्रज्ञा से हस्तगत आमल के तुल्य सभी विषयों का अपरोक्ष साक्षात्कार कर के ही वैसा लिखा
७०८ रामायणमीमांसा विंश है। "नाम पहले प्रसिद्ध होता है, कथा बाद में बनती है" यह सिद्धान्त ही गलत है। गौण नाम गुण के आधार पर होते हैं, जैसे पाककर्ता होने पर पाचक, छिदिक्रिया का कर्ता होने से ही छेत्ता आदि हो जाता है। वेदों का सयुग्वा रैक्व नाम भी गौण ही है। महर्षि का स्वाभाविक नाम रैक्व था। शकट साथ रखने के कारण बाद में उन्हें सयुग्वा कहा गया। कई स्थलों पर कोई सर्वज्ञकल्प ऋषि या देवता भविष्य के कार्यों के अनुसार पहले से ही वैसा नाम प्रसिद्ध करते हैं, परन्तु यह सर्वथा मिथ्या है कि नाम के आधार पर मिथ्या कथा की कल्पना कर ली जाती है, अतः विश्वभर में एटिमोलोजिकलेजेंटस गौण नामों के सम्बन्ध में होता है। मुख्य नामों में वैसा नहीं होता। हाँ कहीं-कहीं मुख्य नाम लुप्त हो जाते हैं। कथाओं एवं घटनाओं के नाम पर होनेवाले गौण नाम ही मुख्य नाम हो जाते हैं। वस्तुतः कथाओं एवं घटनाओं के आधार पर होनेवाले नामों को समाख्या कहा जाता है—जैसे वेदों की काठक आदि समाख्याएँ कठादि महर्षियों से किसी कल्प में प्रथम प्रवचन होने के कारण उन्हें काठक कहा जाता है। परन्तु कई समाख्याएँ निरर्थक भी होती हैं। सात पत्तोंवाले पत्र होने के कारण सप्तच्छद कहा जाता है। परन्तु अश्वकर्ण आदि समाख्याओं का अपने अवयवार्थ के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है, वह निरर्थक रूढ़िमात्र है। घोड़े के कान की तुलना उसमें कुछ भी नहीं है। अश्वकर्ण शब्द वृक्षविशेष में रूढ़ है। अतएव रामावतार, रामवनवास आदि वर, शाप आदि के कारण काल्पनिक नहीं हैं, किन्तु वस्तुस्थितिमूलक ही हैं। और सब आर्ष वचनों से प्रमाणित हैं। राम, सीता, लक्ष्मी और अहल्या के सम्बन्ध की कथाएँ जो आर्ष ग्रन्थों पर आधृत हैं सभी प्रामाणिक हैं। इस सम्बन्ध में बुल्के की सभी दुष्कल्पनाएं निष्प्रमाण एवं निस्सार ही हैं। सीता शब्द लाङ्गल-पद्धति का बोधक होता हुआ भी लाङ्गलपद्धति या कृषि की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण जनकनन्दिनी में सीता शब्द का प्रयोग हुआ है। जैसे ऐश्वर्य के योग से वैदिक इन्द्र शब्द देवराज में अन्वर्थ है वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये। पद्मा लक्ष्मी का नाम है, इस आधार पर पद्मजा सीता की कल्पना कर ली गयी है बुल्के की यह कल्पना भी निस्सार है। पद्मवत् अङ्गसौष्ठव के कारण पद्मजा इव होने से गौणी वृत्ति से ही सीता में पद्मजा नाम उपपन्न है। हनुमान्, रावण, राक्षस, यक्ष, मेघनाद, इन्द्रजित्, कुश, लव, वाली, सुग्रीव, कल्माषपाद, अहल्या, वेदवती, सुर, असुर आदि नाम सकारण हैं और इन्हीं कारणों से गुणकृत गौण नाम हैं। यह नहीं कि नामों के अनुसार मिथ्या कथा गढ़ी गयी है। तीर्थमाहात्म्य दिखलाने के उद्देश्य से उनका सम्बन्ध रामकथा के प्रधान पात्रों से जोड़ा नहीं गया, किन्तु वस्तुस्थिति ही वैसी थी। राम, सीता आदि के विशेष सम्बन्धों के द्वारा उन तीर्थों का महत्त्व वर्णित हुआ है। जैसे अमुक तीर्थों के सम्बन्ध से अमुकों के अमुक दोष दूर हो गये, इसलिए तीर्थ का महत्त्व वर्णित किया जाता है। जैसे अमुक तीर्थ स्नान से किसी विशिष्ट पुरुष की मुक्ति हो जाने से उसका पिशाचमोचन नाम हो गया। अतएव रावण ने गोकर्ण में तपस्या की थी तथा महोदेव से आत्मलिङ्ग प्राप्त कर उसे गोकर्ण में पृथ्वी पर रखकर खो दिया था। "उक्त कथा कल्पनामात्र है" इस कथन में कोई दम नहीं है। अवश्य ही अर्थवादों में कई काल्पनिक आख्यान होते हैं, परन्तु यह जानना चाहिये कि अर्थवाद एक ही तरह का नहीं होता है। प्रमाणान्तर- विरुद्ध अर्थवाद ही गुणवाद होने के कारण काल्पनिक आधार पर माना जाता है। प्रमाणान्तर सिद्ध अर्थ का बोधक अर्थवाद अनुवाद कहलाता है। उसका अर्थ लोकसिद्ध वस्तुस्थिति के अनुसार होता है। प्रमाणान्तर से असिद्ध एवं प्रमाणान्तर से अविरुद्ध अर्थ का बोधक अर्थवाद भूतार्थवाद कहलाता है। उसका स्वार्थ में प्रामाण्य ही होता है। विभीषण को जगन्नाथ या रङ्गनाथ की उपासना का उपदेश विरुद्ध नहीं है। यह भेद एक ही देवता के दो नाम होने से भी सङ्गत हो जाता है। कल्पभेद से भी दोनों पक्षों की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। वराहपुराण तथा आनन्दरामायण (७।६।४२-४५) के अनुसार रावण ने इन्द्र को पराजित कर उनके यहाँ से वराहमूति को ले जाकर लङ्का में स्थापित किया था। विभीषण ने उसे राम को प्रदान किया। राम ने उसे मथुरा में स्थापित किया। ब्रह्मपुराण के अनुसार रावण ने वासुदेव-प्रतिमा की चोरी की थी। राम
अध्याय॑ रामचरितसिंहावलोकन ७७५ ने अयोध्या ले जाकर स्वर्गारोहण से पूर्व उसे समुद्र को अर्पित कर दिया था। कृष्णावतार के समय सागर ने उसे पुरुषोत्तमक्षेत्र में स्थापित किया था। पद्मपुराण में वामनमूर्ति के सम्बन्ध में कहा गया है कि राम ने उसें विभीषण से प्राप्त कर के कान्यकुब्ज में स्थापित किया था। उपर्युक्त कथाओं को भी काल्पनिक मानने में कोई तर्क नहीं है। वराहमूत्ति तथा वासुदेवप्रतिमा को एक ही मानना आवश्यक नहीं है। दोनों को स्वतन्त्र दो घटनाएँ हीं समझना चाहिये। वामनमूर्ति की घटना भी तीसरी स्वतन्त्र ही है। अनु० ७८१ में बुल्के कहते हैं कि “आदिरामायण के वक्ता वाल्मीकि ही हैं, किन्तु प्रचलित बालकाण्ड कें प्रथम सर्ग के अनुसार नारद वाल्मीकि को राम-कथा का संक्षिप्त वर्णन सुनाते हैं। इसी के आधार पर वाल्मीकि नें रामायण की रचना की है।" परन्तु बुल्के की प्रथम उक्ति में कोई प्रमाण नहीं है। परम्परा के अनुसारें ही सभी भारतीय विद्याएँ प्रचलित होती हैं। वाल्मीकिरामायण के प्रथम सर्ग में इसका प्रमाण भी है। यदि इस प्रत्यक्ष उल्लेख पर अविश्वास करें तभी बुल्के की बातों में विश्वास किया जा सकता है, पर आर्ष वचन में अविश्वास का कोई कारण ही नहीं है। बुल्के की अविश्वसनीयता तो निराधार एवं प्रमाणविरुद्ध होने से भी सिद्ध ही है। रामोपाख्यान में मार्कण्डेय ने भी युधिष्ठिर के प्रति परम्परा से ही रामकथावर्णन किया था। वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि ने उसे कुश-लव को प्रदान किया। बुद्ध भले ही जातकों के वक्ता हों, परन्तु भारतीय परम्परा में तो संस्कृत तथा प्राकृत सर्वत्र परम्परा से ही आदृत है। रामचरितमानस में भी परम्परा का ही आदर किया गया है। अनु० ७८२ में बुल्के कहते हैं कि “जैनी रामकथाओं का आधार प्रचलित वाल्मीकिरामायण ही है। किन्तु जैन कवियों ने ब्राह्मण-रामकथा को अपनाकर उसमें बहुत से परिवर्तन किये हैं। इसी से अन्य रामकथाओं में परिवर्तन आये हैं।" बुल्के की पहली बात तो ठीक है, पर दूसरी ठीक नहीं, क्योंकि पुराणों की कुछ रामकथाओं के भेद कल्पभेद पर ही निर्भर हैं। बुल्के के अनुसार “सीता-स्वयंवर के अवसर पर अन्य राजाओं की उपस्थिति, राम द्वारा धनुर्भङ्ग, कैकेयी का पश्चात्ताप, लङ्का में विभीषण से हनुमान् की भेंट, लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र का वध, युद्ध के पूर्व राक्षस-राक्षसियों के संभोग शृङ्गार का वर्णन, रामसेना से कुश और लव का युद्ध वर्णन, वसुदेवहिण्डि में सीता का रावण-पुत्री के रूप में उल्लेख एवं सीतात्याग के प्रसङ्ग में रावण-चित्र का उल्लेख विकास है।” परन्तु यह सब भी असङ्गत है, कारण कि नृसिंहपुराण (अ० ४७), भागवतपुराण (९।१०), अध्यात्मरामायण (१।६।२४) आदि में सीता-स्वयंवर में अन्य राजाओं की उपस्थिति में राम धनुष चढ़ाते हैं। नृसिंहपुराण आदि को पउमचरियं से अर्वाचीन मानना बुद्धि का विपर्यास ही है। पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ११२) में भी सीता-स्वयंवर के आयोजन का उल्लेख है। उसमें भी सब राजाओं के समक्ष राम धनुष तोड़ते हैं। शिव से अजगव धनुष मिला था। उसे अन्य कोई राजा उठा नहीं सका। रामचरितमानस आदि ने पुराणों का ही अनुसरण किया है, पउमचरियं का नहीं। इसी तरह कैकेयी का पश्चात्ताप भी धर्मखण्ड (अ० ३८) और तत्त्वसंग्रहरामायण (अ० २।११) से सिद्ध है। अयोध्यावासियों का दुःख देखकर वह द्रवित होती है और राम की आराधना करके क्षमा भी माँगती है। अध्यात्मरामायण में भी यह चर्चा है। इसी तरह आनन्दरामायण (१।९।२४) में लङ्का में हनुमान् और विभीषण की भेंट का वर्णन है। अध्यात्मरामायण (१।७।४१) में शूर्पणखा का पुत्र साम्ब ब्रह्मा से दिव्य खड्ग प्राप्त करता है। उसी खड्ग द्वारा वह लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है। इसका भी आधार पउमचरियं नहीं है। आनन्दरामायण (६।८) तथा जैमिनीयाश्वमेध (अ० २९।३६) के अनुसार लव राम के यज्ञाश्व को बाँधते हैं। सैनिकों को परास्त करते हैं। शत्रुघ्न द्वारा लव पराजित होते हैं एवं कुश द्वारा शत्रुघ्न भी पराजित होते हैं। पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६०-६४) में भी यह वृत्तान्त है।
७१० रामायणमीमांसा विश प्रायः वैदिक लोग प्राचीन रामायणों, पुराणों तथा वाल्मीकिरामायण, महाभारत आदि से ही रामचरित्र का वर्णन करते हैं । उनके विश्वास के अनुसार जैसे श्वचर्म-दृति (कुप्पी) में निक्षिप्त कपिला-क्षीर भी अग्राह्य होता है उसी तरह अवैदिक मुखों से निःसृत अहिंसा, सत्य तथा रामचरित्र आदि भी अग्राह्य ही हैं। इसी दृष्टि से रामचरितमानस में स्पष्टरूप से कहा गया है कि—नाना पुराण, निगम, आगम तथा तदनुसारी सन्तों के आधार पर ही रामचरितमानस की रचना हुई है। जैन, बौद्ध आदि ग्रन्थ उसके आधार नहीं हैं । “नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि ।” अनु० ७८३ में बुल्के का यह कहना गलत है कि “वाल्मीकिरामायण के युद्धकाण्ड में जो शिवप्रतिष्ठा का निर्देश है वह केवल आल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ में मिलता है, इसलिए प्रक्षिप्त है ।” क्योंकि आपका हेतु असिद्ध है । राम के विष्णु या परब्रह्म होने की बात तो तीनों पाठों में मिलती है तो भी आप उसे प्रक्षिप्त मानते हैं । यदि शिवप्रतिष्ठा की बात भी तीनों पाठों में मिलती तो भी आप उसे प्रक्षिप्त ही कह सकते थे । उत्तरकाण्ड की रावण सम्बन्धी शिवभक्ति को भी प्रक्षिप्त कहना ईसाइयत का उन्माद ही है। यह आवश्यक नहीं कि शिवभक्त होने पर ब्रह्मा वरदान नहीं दे सकते । महाभारत में कृष्ण द्वारा शिव की भक्ति का वर्णन है। अन्यत्र वहीं कृष्ण की शक्तिभक्ति का भी वर्णन है । शिव का हनुमान् रूप से अवतरित होना प्रमाणसिद्ध है । यह किसी प्रभाव से कल्पना नहीं है । प्रायः अनेक राम- कथाओं में राम की शिवभक्ति का उल्लेख है, उन सबको भ्रान्त या मिथ्या कल्पना मानना बुल्के का दुस्साहस ही है। उनकी ही कल्पना अगर बाइबिल के सम्बन्ध में जोड़ ली जाय तो फिर सारी बाइबिल एक मिथ्या कल्पना की पिटारी ही समझी जायेगी । पुराणों में ही नहीं, ऐतिहासिक दृष्टि से भी रामेश्वरम् का महान् शैव संस्थान राम की ही कृति है । वस्तुतः बुल्के की तथाकथित रामकथा शैव, वैष्णवों तथा रामभक्तों सभी के लिए चुनौती है । उन्होंने भी मैक्समूलर के समान ही यह ग्रन्थ लिखकर ईसाइयों को हिन्दूधर्म के खण्डन की सामग्री प्रस्तुत की है । जिसका कि मैंने पूर्णरूप से खण्डन करके आस्तिकों को सावधान किया है । शिवमहापुराण, पद्मपुराण आदि वैदिकों की दृष्टि में परम प्रमाण हैं । अतः शिव के आज्ञानुसार विष्णु का अवतार ग्रहण करना, पद्मपुराण के अनुसार राम का शिव से उनकी भक्ति मांगना आदि पूर्ण सङ्गत हैं। अतएव आनन्दरामायण आदि ग्रन्थों में राम तथा शिव की अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है । रामचरितमानस में भी स्पष्टरूप से कहा गया है— “शिवपद कमल जिनहिं रति नाहीं । रामहि ते सपनेहु न सुहाहीं ॥” इसी प्रकार शक्ति-प्रभाव के सम्बन्ध की बुल्के की कल्पना निर्मूल है। बृहद्धर्मपुराण, कालिकापुराण आदि भी प्रमाण ही हैं । अतएव कालिकापुराण (अ० ६२) में राम की विजय के लिए ब्रह्मा द्वारा देवी की पूजा का वर्णन है । देवीभागवत के अनुसार वर्षाकालीन देवी की पूजा का वर्णन है । कृष्णकथा का प्रभाव भी पुराणादि अविश्वास का ही भाव समझना चाहिये । बुल्के कहते हैं कि रामकथा के विकास में दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्त्व ( अवतारवाद एवं भक्ति ) आ गये हैं । जिनके कारण कथा का समस्त वातारण ही धीरे-धीरे बदलता गया । कृष्णावतार तथा कृष्णभक्ति के अनुकरण पर ही इन दोनों तत्त्वों का रामकथा में प्रवेश हुआ ।” किन्तु बुल्के का सोचने का तरीका ही गलत है, और उनकी सभी बातें लगभग अन्योन्याश्रयादि दोषों से परिपूर्ण हैं । यदि उनकी कल्पना प्रमाणित हो जाय तभी वाल्मीकिरामायण में वर्णित राम का अवतारत्व और राम की भक्ति “प्रक्षिप्त” सिद्ध हो सकती है । साथ ही वे यह भी समझ नहीं पाते हैं कि इतिहास और पुराणों द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण होता है । अतएव वे वैदिक साहित्य का सूत्रपात मानते हुए विष्णु-प्राधान्य को नहीं समझ