रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 770, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९३ कुश और लव की जन्म-कथा राम द्वारा परित्यक्त किये जाने के बाद सीता ने वाल्मीकि के आश्रम में यमल पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकिरामायण (७।६६।३-९) के अनुसार कुशों के अग्रभाग से अग्रज का निर्मार्जन करने का तथा अनुज का कुशों के लव (अधोभाग) से मार्जन करने का आदेश महर्षि वाल्मीकि ने दिया था। अतः क्रम से दोनों का नाम कुश और लवपड़ा था— 'यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैर्मन्त्रसत्कृतैः । निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥ यश्चावरो भवेत्ताभ्यां लवेन सुसमाहितः । निर्मर्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥' (वा० रा० ७।६६।७,८) इससे भी स्पष्ट है कि गानोपजीवी कुशीलव की यहाँ चर्चा नहीं है। यहाँ कुश और लव नाम के दो राजकुमार हैं और वे सीतापुत्र हैं। अतः बुल्के की यह कल्पना निरर्थक है कि कुशीलव गानविद्योपजीवी थे। भवभूति के अनुसार लक्ष्मण के चले जाने पर सीता को वन में प्रसव-पीड़ा होती है। उससे निराश होकर वे आत्महत्या के विचार से गङ्गा में कूद पड़ती हैं। जल में ही उनके दो पुत्र होते हैं। पृथिवी तथा गङ्गा देवियाँ सीता को दो पुत्रों के साथ रसातल ले जाती हैं। बाद में कुछ बड़े होने पर गङ्गा दोनों पुत्रों को शिक्षा देने के लिए वाल्मीकि महर्षि को सौंप देती हैं। इसके अनुसार कुश और लव अपने माता-पिता के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे । अन्तिम अङ्क में वाल्मीकि की आज्ञा से सीता प्रकट होकर राम के साथ अयोध्या लोटती हैं। कुन्दमाला के अनुसार राम कुश और लव से उनके माता-पिता के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। तो वे अपनी माता वनदेवी को बताते हैं। परन्तु पिता के सम्बन्ध में कुश ने कहा कि मैं नहीं जानता। लव ने कहा मैं जानता हूँ। मेरे पिता का नाम निरनुक्रोश है, क्योंकि एक दिन माँ ने क्रुद्ध होकर कहा था "निरनुक्रोशतनयौ"। यह सुनकर राम के नेत्रों में अश्रु आ गये। यह कथा कल्पान्तर की हो सकती है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो वाल्मीकि के आश्रम में ही कुश और लव का जन्म हुआ था एवं वेदादि की शिक्षा भी उन्हें वहीं मिली थी। कथासरित्सागर तथा तिब्बती रामायण के अनुसार सीता ने एक ही पुत्र को जन्म दिया था। उसका नाम लव था। सीता लव को लेकर नदी में स्नान करने गयी। वाल्मीकि ने कुटी में आकर सोचा कि कोई हिंस्र पशु बालक को उठा ले गया, इसलिए उन्होंने तपोबल द्वारा कुश से एक बालक की सृष्टि की। लौटने पर सीता ने उसे पुत्रवत् ग्रहण किया। इस प्रकार सीता के कुश और लव दो पुत्र हुए। काश्मीरीरामायण (९।११८३-९३) के अनुसार दशरथ स्वप्न में पुत्र के लिए राम से अनुरोध करते हैं। राम वसिष्ठ की सम्मति से अश्वमेधयज्ञ करते हैं। फलस्वरूप सीता गर्भवती होती है। यह भी कल्पान्तरीय कथा है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो अश्वमेधयज्ञ में ही कुश और लव ने रामायण का गान किया था। किसी कथा के अनुसार सीता कुश को वाल्मीकि की रक्षा में छोड़ कर जाती है, किन्तु मार्ग में वानरियों का उपदेश सुनकर लौट आती हैं। वाल्मीकि नया पुत्र बनाकर देते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार भी एक वानरी पाँच पुत्रों को ढोती है। इसपर सीता लौटकर वाल्मीकि को बिना बताये पुत्र को ले जाती हैं। रामकियेन में वानरियों से सीता के मिलने का वृत्तान्त है। सीता वानरियों को बच्चों के साथ कूदती देख कर बच्चों की समुचित सुरक्षा न करने के कारण उनकी भर्त्सना करती हैं। वानरियों ने उत्तर दिया कि तुम तो अपना पुत्र ध्यानमग्न ऋषि के पास छोड़ कर आयी। तुम हमसे भी अधिक असावधान हो। यह सुनकर सीता अपने पुत्र को लेने के लिए लौट पड़ती है। अन्य वृत्तान्त के अनुसार सुग्रीव-सेना के वानर वन में सीता की सेवा करते हैं। वानर उनके पुत्र को टहलाने ले जाते थे। किसी दिन सीता नदी तट पर सो गयी। इतने में एक वानरी उनके पुत्र