भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६८८ रामायणमीमांसा विंश “मासदिवस कर दिवस भा मरम न जाना कोइ । रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ ॥ ( रा० मा० १।१९५) "सोइ सुख लवलेस जिन सपनेहु बारेक लहेउ । ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥” ( रा० मा० ७।८८ ) सनकादि भी भगवान् की अनुपम छवि देखकर विह्वल हो जाते हैं । “मुनि रघुपतिछबि अतुल बिलोकी । भये मगन मन सके न रोकी ।।" ( रा० मा० ७।३२।१ ) ज्ञानी भक्त सात्त्विक लोग ही नहीं खरदूषण जैसे क्रूरप्रकृति के लोग भी राम की शोभा देखकर मोहित होकर कहने लगते हैं— “जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा । बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ।।" ( रा० मा० ३।१८।३ ) उनसे भी अधिक तीक्ष्ण विषवाली सर्पिणी एवं वृश्चिक आदि भी रामरूप देखकर अपनी सहज तामसी तीक्ष्णता को त्यागकर प्रेमपरिप्लुत हो जाते हैं— "जिनहिं निरखि मग सांपिनि बीछी । तजहिं सहज बिष तामस तीछी ॥ ( रा० मा० २।२६०।४ ) फिर जिनकी निधि वही हैं उनके लोचन रामरूप पर क्यों न ललचा उठें ? "देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥” ( रा० मा० १।२३१।२ ) "लाजहिं तनु शोभा निरखि कोटि-कोटि सत काम ।” ( रा० मा० १।१४६ ) श्रीभागवत के अनुसार भगवान् की चपला लक्ष्मी भगवान् के पादारविन्द का माधुर्यामृतरसास्वादन करने गयी । रसास्वादन करने में उसे शोभासिन्धु की थाह नहीं मिली । उसे उत्तरोत्तर क्षणों में पूर्व-पूर्व क्षण की शोभा से कोटि-कोटि गुणित अधिक शोभा अनुभूत होने लगी । अतः चला लक्ष्मी श्रीभगवान् के पादारविन्द को पाकर अचला हो गयी । अनन्तकाल तक अनुभव करने पर भी उत्तरोत्तर कोटि-कोटि गुणित शोभा की अनुभूति बढ़ती ही गयी— “चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ।” ( भाग० ११।२।३३ ) और तो और स्वयं भी सर्वज्ञशिरोमणि मणिमय स्तम्भों में प्रतिफलित निजप्रतिबिम्ब को निहारकर प्रेमोद्रेक में स्वयं भी नाच उठे— “रूपरासि छबि अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिम्ब निहारी ॥” ( रा० मा० ७।७६।४ ) वेद, उपनिषद्, महाभारत तथा अनेक रामायणों में रामचरित्र का वर्णन है । अग्निपुराण में २ से १२ और २४० से २६० अध्यायों में राम द्वारा राजनीति का वर्णन है । आदिपुराण, कल्किपुराण तथा कालिकापुराण के ६२ वें अध्याय में विस्तृत रामकथा है। कूर्मपुराण, गरुड़पुराण तथा नरसिंहपुराण में रामकथा है । पद्मपुराण में अनेक बार सविस्तर रामकथा वर्णित है । इसी में रामाश्वमेध ७० अध्यायों में वर्णित है । बृहन्नारदीयपुराण, बृहद्धर्म- पुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, भविष्यपुराण, श्रीमद्भागवत, देवीपुराण तथा महाभागवत में भी रामकथा है । मार्कण्डेयपुराण, लिङ्गपुराण, वामनपुराण, वायुपुराण, वाराहपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण तथा हरिवंशपुराण में रामकथा वर्णित है । हनुमत्संहिता, शिवसंहिता, लोमशसंहिता, बृहद्ब्रह्मसंहिता, महाशम्भुसंहिता, अगस्त्यसंहिता, वाल्मीकिसंहिता, शुकसंहिता, वसिष्ठसंहिता, सदाशिवसंहिता, हिरण्यगर्भसंहिता, महासदाशिवसंहिता, ब्रह्मसंहिता, पुराणसंहिता, बृहत्सदाशिवसंहिता, सनत्कुमारसंहिता आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में राम की उपासनाओं का वर्णन है ।