रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८७ ब्रह्मा में चार मुख होने और विकटवेष शिवजी के पाँच मुख होने से वे राम के समान कहाँ हो सकते हैं ? फिर और कौन तनुधारी देव उनके समान हो सकता है— "विष्णु चारि भुज विधि मुख चारी । विकटभेष मुख पंच पुरारी । अपर देव अस को जग माहीं । यह छवि सखि पटतरिये जाहीं ॥” ( रा० म० १।२१९।४ ) वे राम के एक-एक अङ्ग पर कोटि-कोटि शत कामों को निछावर करती हैं। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो राम सूर्य के सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के भी प्रभु, श्री-शोभा के भी शोभा, कीर्ति के कीर्ति तथा क्षमा के क्षमा हैं— “सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्त्याः कीर्तिः क्षमा-क्षमा ॥” ( वा० रा० २।४४।१५ ) श्रीभागवत के अनुसार अलङ्कारों से भगवान् के अङ्ग अलङ्कृत नहीं होते हैं, अपितु भगवान् के अङ्गों से ही अलङ्कार अलङ्कृत होते हैं--"भूषणभूषणाङ्गम्" वाल्मीकिरामायण के अनुसार अपार सौन्दर्यसिन्धु राम के स्वरूप से कोई भी अपने मन एवं चक्षु को लौटा ही नहीं सकता था । राम के सामने से पधार जाने पर भी उनका मङ्गलमय रूप मन एवं नेत्रों में जगमगाता रहता था-- “नहि तस्मान्मनः कश्चिचक्षुषी वा नरोत्तमात् । नरः शक्नोत्यवाक्रष्टुमपक्रान्तेऽपि राघवे ॥” ( वा० रा० २।१७।१३ ) जिसने राम को न देखा और राम ने जिसे नहीं देखा वे दोनों सब लोकों में निन्दित हैं । इतना ही नहीं उसकी अन्तरात्मा भी उसको धिक्कारती है-- “यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति । निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति ॥” ( वा० रा० २।१७।१४ ) वे कहती हैं, सखि ऐसा कौन तनधारी है जो इस रूप पर मोहित न हो जाय । इसी लिए शङ्कर को १५ नेत्रों से राम के अनुपम रूप-सौन्दर्य का रसास्वादन करने के कारण १५ नेत्र अतिप्रिय लगे— “संकर राम रूप अनुरागे । नयन पंचदस अतिप्रिय लागे ॥” (रा० मा० १।३१६।१) ब्रह्मा ८ नेत्रों से राम के माधुर्य का आस्वादन करते हुए शिव से कम अपने ८ ही नेत्र जानकर पछताने लगे । रमासहित रमापति भी रामरूप देखकर मोहित हो गये-- “हरि हित सहित राम जब जोहे । रमा समेत रमापति मोहे ॥” (रा० मा० १।३१६।२) बारह नेत्रों से राम के सौन्दर्य का रसास्वादन करके कार्तिकेय प्रसन्न हो रहे थे और इन्द्र सहस्र नेत्रों से भगवान् का रूप देखकर अपने को धन्य-धन्य मान रहे थे । जनकादि जैसे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न भी रामसौन्दर्य पर मोहित हो गये— “सहज विराग रूप मन मोरा । थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥” (रा० मा० १।२१५।२,३) कि बहुना जिसने स्वप्न में भी एक बार भी राम-मुख-माधुर्य का अनुभव कर लिया है। वह ब्रह्मसुख को भी नहीं गिनता । सूर्यनारायण ने कोटि-कोटि किरणों से राम के रूप-सौन्दर्य को निहारते-निहारते मास भर अवध में बिता दिया ।