भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 763

और प्रजाको धर्माचरण का नम्र मधुर उपदेश देते हैं। भरत को अपनी और श्रीसीताजी की शपथ देकर कैकेयी के प्रति सौमनस्य ही बर्तने का अनुरोध करते हैं। जनदुःख में दुःखी तथा उत्सव में पिता के समान परितुष्ट होकर सबके साथ तादात्म्य का अनुभव करते हैं। श्रीरामजी का अपना राज्य तथा सम्पूर्ण जीवित ही द्विजार्थ अर्पित है। इतना ही क्यों, सम्पूर्ण श्री वैभव के साथ साक्षात् धर्म ही श्रीरामजी से सुसम्पन्न होकर प्रकट हुआ है। सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, शुचिता, विद्या, गुरु-शुश्रूषा आदि धर्म श्रीरामजी में ध्रुव रूप से सुस्थिर हैं। गुरुजन कहते हैं हम संसार में ऐसे किसी राम के सुनिरस्त अपमानित घोर शत्रु को भी नहीं देखते हैं जो परोक्ष में भी राम का दोष या द्रोह बतलाता हो। इतना ही नहीं, राम अमित्रों की भी दृष्टि एवं मन का हरण करते हैं— “अप्यमित्राणां दृष्टिश्रुतिमनोहरः ।” (म० भा० रामोपाख्यान ) सर्वलोकप्रिय राम श्रीरामजी धर्म तथा स्वजन के रक्षिता, सर्वलोकप्रिय, द्रष्टा, स्मर्त्ता, सभी लोगों के हितकारक, सहज असाधारण क्षात्रस्वभाव से अदीनात्मा, अतिदुःख, व्यसनादि परम्परा में भी अक्षुब्धस्वभाव एवं विचक्षण हैं। जैसे नदियां सदैव समुद्र की ओर जाती हैं वैसे ही राम सदैव सत्पुरुषों द्वारा सेवित होते हैं। वे आर्य, सर्वप्रियदर्शन, सर्वगुणोपेत, कौशल्यानन्दवर्धन हैं— “सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः ॥ आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः । स च सर्वगुणोपेतः कौशल्यानन्दवर्धनः ॥” (वा० रा० १।१।१५-१७ ) राम गंभीरता में समुद्र जैसे, धैर्य में हिमवान् जैसे, वीर्य (पराक्रम) में विष्णु जैसे तथा चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन हैं। क्रोध में कालाग्नि के तुल्य, क्षमा में पृथिवी के तुल्य, त्याग में कुबेर के तुल्य एवं सत्य में धर्म के तुल्य हैं। वनगमन तथा अखण्ड भूमण्डल के राज्य का त्याग करने में सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त जैसे उनके चित्त में कोई विक्रिया परिलक्षित नहीं होती— “न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपकर्षति । लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः ॥ न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् । सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥” (वा० रा० २।१९।३२, ३३ ) राम के समुचित रूपसंनिवेश, लक्ष्मी (शोभा), सौकुमार्य, सुवेषता आदि गुणों को विस्मित होकर वनवासी देखने लगे— “रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम् । ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः ॥” ( वा० रा० ३।१।१३ ) रामचरितमानस के अनुसार राम की देह चिदानन्दमय है— “चिदानन्दमय देह तुम्हारी ।” ( रा० मा० ३।१।१३ ) तुलसीदास ने बड़ी बुद्धिमानी से राम की शोभा का वर्णन किया है। देवताओं का सौन्दर्य तो प्रसिद्ध है। फिर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सौन्दर्य का तो कहना ही क्या है ? पर सखियां कहती हैं—विष्णु में चार भुजा और