भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 762

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८५ “देखन कहँ प्रभु करुनाकांदा । प्रकट भये बहु जलचर वृंदा ॥” ( रा० मा० ६।३।२ ) “यह सुधि कोल किरातन पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ॥” ( रा० मा० २।१३३।१ ) “देखि दखिन दिशि हय हिहिनाहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥” (रा० मा० २।१४०।४) “नहिं तृन चरहिं न पियहिं जल मोचहिं लोचनबारि । ब्याकुल भये निहारि सब रघुबर बाजि निहारि ॥” ( रा० मा० २।२४। ) “काम कोटि छबि श्याम शरीरा । नील कंज वारिद गंभीरा ॥” ( रा० मा० १।१९८।१ ) “सोभा कोटि मनोज लजावन ।” ( रा० मा० १।३२६ ) “धरमधुरीन भानुकुलभानू ।” ( रा० मा० २।२५२।१ ) “बेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥” ( रा० मा० ७।२५।१ ) “जौ अनीति कछु भाषौं भाई । तो मोहि बरजहु भय बिसराई ॥ नहि अनीति नहि कछु प्रभुताई । सुनहु करहु जो तुम्हहि सुहाई ॥” (रा० मा० ७।४२।३,२) प्राण तृणाग्रलग्न जलबिन्दु के समान हैं । धर्म ही सब का सुहृत् है, अतः उसका विरोध नहीं करना चाहिये— “वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यं प्राणास्तृणाग्रजलबिन्दुसमा नराणाम् । आपातमात्रमधुरा विषयोपभोगा धर्मः परं सुहृदहो न विरोधनीयः ॥” “मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति । मया च सीतया चैव शपतोऽसि रघुनन्दन ॥” ( वा०रा० २।११२।२७ ) “व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखितः । उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परिरक्षति ॥” ( वा० रा० २।२।४०,४१ ) “इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् । सर्वमेतद् द्विजार्थं मे सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥” ( वा० रा० ७।६०।१९ ) “साक्षाद् रामाद् विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह ।” (वा० रा० २।२।२९ ) “सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम् । विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे ॥” ( वा० रा० २।१८।३० ) “न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः। स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत् ॥” ( वा० रा० २।२।१५ ) “रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ॥” ( मू० रा० १।१।१४) भारतीय परम्परा के अनुसार राजा या राजनीतिज्ञ को दण्डनीति से पहले आन्वीक्षिकी से ब्रह्मविद्या प्राप्त करनी चाहिये, जिसके प्रभाव से सुख और दुःख का तत्त्व जानकर शोक तथा मोह का अपाकरण किया जा सकता है । अपने अचिन्त्य तथा अनन्त ब्रह्मानन्दसुधासिन्धु में तृप्त रहने के कारण ही राम के राज्याभिषेक से मुखाम्बुज पर कोई प्रसन्नता नहीं हुई और वनवास-दुःख से कोई विक्रिया नहीं आयी । वसुधाधिपत्य त्यागकर वन जाते समय लोकातीत जैसी निर्विकारिता राम में परिलक्षित होती थी । आपत्ति में धैर्य-भङ्ग न हो यही तो महासत्त्व का लक्षण है । सदा प्रसन्न राम को निहारने के लिए समुद्र के जलचरवृन्द भी प्रकट होकर विभोर हो जाते हैं। वन के कोल-किरात नव निधि समझ कर राम में अनुरक्त होते हैं । राम के वियोग में रथ के घोड़े व्याकुल होकर तृण और जल लेने से विरक्त हो जाते हैं । वे छविधाम श्रीराम मर्यादा-पालनार्थ स्वयं वेद, पुराण आदि सुनते हैं

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