भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६८४ रामायणमीमांसा विंश लोगों को भी देख लिया और अपने राजा का कार्य कर लिया है तो आप स्वेच्छा से जा सकते हैं । यदि कुछ देखना बाकी बचा है तो फिर से देख लो । विभीषण पूर्णरूप से सब कुछ तुम्हें पुनः दिखा देंगे— “यदि दृष्टं बलं सर्वं वयं वा सुसमाहिताः । यथोक्तं वा कृतं कार्यं छन्दतः प्रतिगम्यताम् ॥ अथ किञ्चिददृष्टं वा भूयस्तद् द्रष्टुमर्हथः । विभीषणो वा कार्त्स्न्येन पुनः संदर्शयिष्यति ।।” (वा० रा० ६।२५।१८,१९) राम रावण से अपनी पतिव्रता पत्नी के उद्धार के लिए एवं क्षात्र तेज की रक्षा के लिए लड़े और सानुबन्ध रावण का वध किया, परन्तु उसके हितैषी ही रहे । “अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।१ ) विजय के बाद उसकी प्रशंसा करते हुए राम ने कहा था—ये प्रचण्ड पराक्रमी थे । निश्चेष्ट होकर नहीं मरे । इनका महोत्साह अत्यन्त उन्नत था । ये निर्भीक होकर रणाङ्गण में जूझे हैं । इस प्रकार क्षात्र धर्म में व्यवस्थित होकर जो युद्ध में मरते हैं, युद्धभूमि में अपनी विजय के लिए आकांक्षा करते हुए मारे जाते हैं वे शोचनीय नहीं होते । युद्ध में सदैव किसी की विजय नहीं होती । युद्ध में वीर या तो दूसरों से मारा जाता है या दूसरों को मारता है । यह पूर्वजों से निर्दिष्ट क्षत्रियसम्मत गति है कि क्षत्रिय युद्ध में निहत होकर शोचनीय नहीं होता है— “नायं विनष्टो निश्चेष्टः समरे चण्डविक्रमः । अत्युन्नतसमुत्साहः पतितोऽयमशङ्कितः ॥ नैवं विनष्टाः शोच्यन्ते क्षत्रधर्मव्यवस्थिताः । वृद्धिमाशंसमाना ये निपतन्ति रणाजिरे ॥ नैकान्तविजयो युद्धे भूतपूर्वः कदाचन । परैर्वा हन्यते वीरः परान् वा हन्ति संयुगे ॥ इयं हि पूर्वैः संदिष्टा गतिः क्षत्रियसम्मता । क्षत्रियो निहतः संख्ये न शोच्य इति निश्चयः ॥” (वा०रा०६।१११।१४-१८) शिष्टों में सार्वभौम प्रसिद्धि है कि राम के समान बर्ताव करना चाहिये रावण जैसा नहीं। भावी राजाओं से भी राम ने धर्मसेतु की रक्षा का अनुरोध किया था— “भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला नत्वा नत्वा याचते रामचन्द्रः । सामान्योऽयं धर्मसेतुर्नराणां काले काले पालनीयो भवद्भिः ॥” ( स्कन्द० ब्राह्मख० धर्मारण्य ३४।४ ) “आन्वीक्षिक्यात्मविद्या स्यादीक्षणात् सुखदुःखयोः । ईक्षमाणस्तया तत्त्वं हर्षशोकौ व्युदस्यति ॥” ( काम० नीति० २।३१ ) “प्रसन्नतां या न गताऽभिषेकतस्तथा न मम्लौ वनवासदुःखतः । मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा ॥” न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् । सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥ ( वा० रा० २।१९।३३ ) “आपद्यभग्नधैर्यंत्वं सम्पद्यनभिमानिता । यदुत्साहस्य चात्यागः तद्धि सत्पुरुषव्रतम् ॥”