भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 746

“अवयवानां रेखास्पाष्ट्यं रूपम्, गौरत्वादिधर्मविशेषो वर्णः, चाकचिक्यरूपा कान्तिः प्रभा, नैसर्गिकस्मेरत्वादिः सर्वेषां चक्षुर्बन्धको रागः, कुसुमधर्मा मार्दवादिस्पर्शविशेष आभिजात्यम्, कटाक्षादिः विलासः, तरलता लावण्यम् ।” अङ्गों की रेखाओं की स्पष्टता रूप है, गौरत्वादि धर्मविशेष वर्ण है, चाकचिक्यादि कान्ति प्रभा है, चक्षुओं को बाँधनेवाला स्मितमुखत्वादि ही राग है, कुसुम के समान कोमल स्पर्शविशेष आभिजात्य है, कटाक्षादि विलास है एवं तरलता लावण्य है । गर्भिणी स्त्री जैसे गर्भस्थ शिशु की हित-दृष्टि से ही सब कार्य करती है वैसे ही राजा की सम्पूर्ण चेष्टाएँ प्रजाहित की दृष्टि से ही होती हैं । फिर लोकदृष्टि से कुछ असम्मत भी क्यों न हो। ताटका (ताड़का) के मारने में राम को स्त्रीवध के सम्बन्ध में अधिक संकोच था । तभी विश्वामित्र ने कहा था— “नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम । चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना ॥ नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् । पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥” (वा० रा० १।२६।१७,१८) तुम्हें स्त्रीवध के लिए घृणा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि चातुर्वर्ण्य के रक्षण के लिए राजपुत्र को ऐसी आततायी स्त्री का भी वध करना चाहिये । प्रजारक्षणार्थ राजा को नृशंस, अनृशंस, क्रूर, अक्रूर, पातकयुक्त, सदोष सब कुछ करना पड़ सकता है । जैसे हाथी के पैर में सबका पैर आ जाता है वैसे ही राजधर्म में सब धर्म आ जाते हैं । प्रजा एवं प्रजाकल्याणकारी वर्णाश्रमधर्म की रक्षा करना राजा का प्रधान कर्म है । और सब धर्मकर्म उसके ही अङ्गोपाङ्ग हैं । प्रधान के अविरुद्ध ही अन्य धर्मों का महत्त्व है । रामचन्द्र परम ब्रह्मण्य थे । वाल्मीकिरामायण में उन्हें ब्राह्मणों का उपासक कहा गया है—‘‘ब्राह्मणानामुपासिता’’ फिर भी ब्राह्मण द्वारा आहत निरपराध श्वान को न्याय देने का जब प्रश्न आया तब राम को न्याय का ही पक्ष लेना पड़ा, क्योंकि उनकी दृष्टि में न्याय सबसे बड़ा था । इसी तरह २१ बार पृथ्वी को निःक्षत्र करनेवाले ब्राह्मण परशुराम का उग्ररूप जब राम के क्षात्र तेज को अभिभूत करने लगा तब राम ने बड़ी बुद्धिमानी से अपनी ब्रह्मण्यता की रक्षा करते हुए क्षात्र धर्म की भी रक्षा की ओर कहा— “वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव । अवजानासि मे तेजः पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥” ( वा० रा० १।७६।३ ) “ब्राह्मणोऽसीति पूज्यो मे विश्वामित्र कृतेन च । तस्माच्छक्तो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम् ॥ इमां वा त्वद्गतिं राम तपोबलसमर्जितान् । लोकानप्रतिमान् वापि हनिष्यामीति मे मतिः ॥” ( वा० रा० १।७६।६,७ ) भार्गव ! क्षात्रधर्मयुक्त होने पर भी मुझे आपने वीर्यहीन एवं असमर्थ समझकर क्षात्रतेज का अपमान किया है, अतः अब आप मेरा पराक्रम देखिये । यह कहकर राम ने उनसे धनुष लेकर क्षण में उसे चढ़ाकर कहा—आप ब्राह्मण होने से मेरे पूज्य हैं और विश्वामित्र की भगिनी सत्यवती के पौत्र हैं, इसलिए मैं आपके लिए प्राणहर बाण छोड़ नहीं सकता, किन्तु आपकी दिव्यगति अथवा तपोबल से अर्जित लोकों को नष्ट करूँगा । किन्तु जहाँ धर्मोल्लङ्घन का प्रश्न राम के सामने आया वहाँ राम ने जैसे धर्मविमुख शम्बूक शूद्र का वध कर ब्राह्मण शिशु को पुनर्जीवित किया वैसे ही धर्मविमुख ब्राह्मण रावण का वध कर सम्पूर्ण मानवता को जीवन प्रदान किया ।