भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 734

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५७ यहाँ 'त्रिरात्र' कर्म का विधान करने के लिए आख्यायिका कही जाती है। यह सब गिरि, समुद्रादि जगत् पहले सलिल ही था, इसमें कोई भूतान्तर या उसका कार्य नहीं था। उस समय ईश्वर ने वायुरूप से सलिल में सर्वत्र विचरण करते हुए सलिल में निमग्न पृथिवी को देखा और वराह होकर अपने दंष्ट्राग्र से भूमि को जल के ऊपर लाये। फिर वराहरूप त्याग कर विश्वकर्मा होकर विशेषरूप से मार्जन किया; द्रवांश हटाकर पृथिवी को फैला कर विस्तारित कर दिया। इसी से सब प्राणियों की आधारभूत पृथिवी कहलायी। यहाँ प्रथम मन्त्र से भी अधिक वराह अवतार का वर्णन है। अथ षष्ठं संभारं विधत्ते— “आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत् । तेन प्रजापतिरश्राम्यत् ।५। सोऽपश्यत् पुष्करपर्णं तिष्ठत् । सोऽमन्यत । अस्ति वै तत् । यस्मिन्निदमधितिष्ठतीति । स वराहो रूपं कृत्वोपन्यमज्जत् । स पृथिवीमध आर्च्छत् । तस्या उपहत्योदमज्जत् । तत्पुष्करपर्णेऽप्रथयत् । यदप्रथयत् ।६। तत्पृथिव्याः पृथिवीत्वम् ।” ( तै० ब्रा० १।२।३।५,६ ) “इदमीदानीं दृश्यमानं गिरिनदीसमुद्रादिकं स्थावरं मनुष्यगवादिकं जङ्गमं च सृष्टेः पूर्वमीदृशं नासीत् । किन्तु सलिलरूपमासीत् । इदं दृश्यमानं जगत्सलिलं कारणेन सङ्गतमविभागापन्नम् । तदानीं प्रजापतिस्तेन सिसृक्षितजगन्निमित्तेनाश्राम्यत् । पर्यालोचनरूपं तपोऽकुरुत । कथं नामेदं जगद्भवेदिति विचार्य तस्य सलिलस्य मध्ये दीर्घनालाग्रेऽवस्थितमेकं पद्मपत्रमपश्यत् । तच्च दृष्ट्वा मनस्येवमतर्कयत् । यस्मिन्नाधार इदं सनालं पद्मपत्रमधिश्रित्य तिष्ठति तद्वस्तु किञ्चिदधस्तादस्त्येवेति तर्कयित्वा च स प्रजा- पतिर्वराहो भूत्वा तदीयं रूपं च सम्यक् कृत्वा तस्य पद्मपत्रनालस्य समीपे जलमध्ये निमग्नोऽभूत् ।। मग्नश्चासावधस्तात् भूमि प्राप्तवान् । तस्या भूमेः सकाशात् कियतीमप्याद्रां मृदं स्वदंष्ट्रया पृथक्कृत्य सलिलस्योपर्यन्मज्जनं कृतवान् । तच्च मृद्रूपं तस्मिन् पुष्करपर्णे प्रसारितवान् । यस्मादियं मृत्तिका प्रथिता तस्मात्पृथिवीनाम सम्पन्नम्।” यह सब पहले सलिल था। जगत् की रचना के लिए प्रजापति ने तप किया। सलिल के मध्य में दीर्घनाल के अग्र में अवस्थित पद्मपत्र उन्हें दिखायी दिया। उसे देख कर प्रजापति ने विचार किया कि जिस आधार में यह सनाल पद्मपत्र है, नीचे वह कोई वस्तु है। तब प्रजापति ने वराहरूप धारण कर नाल के समीप ही गोता लगाया। वहीं उसने भूमि को देखा। उस भूमि की कुछ गीली मिट्टी को अपनी दंष्ट्रा से अलग कर पानी के ऊपर आकर उसी मिट्टी को पद्मपत्र पर फैला दिया। वही मृत्तिका पृथिवी हो गयी। अनादि मन्त्र, ब्राह्मण और वेद प्रसिद्ध आख्यायिका के प्रसङ्ग से ईश्वर के विविध अवतारों का वर्णन करते हैं। वेद स्वयं अनादि हैं। सृष्टि के पूर्वकाल में ही ईश्वर से निःश्वासरूप में प्रकट हुए हैं। अतः अवतार को विकास या आधुनिक कहना अनभिज्ञता ही है। कामानन्तरभाविनीं सृष्टि दर्शयति— “स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । शरीरमधूनुत । तस्य यन्मांसमासीत् । ततो अरुणाः केतवो वातरशना ऋषय उदतिष्ठन् ।२। ये नखाः । ते वैखानसाः । ये बालाः । ते बालखिल्याः । यो रसः । सोऽपाम् इति ।” “स प्रजापतिः सृष्टि कामयित्वा तपः कृतवान् । नात्र तप उपवासादिरूपं किन्तु स्रष्टव्यं वस्तु कीदृशमिति—पर्यालोचनरूपम् । अत एव आथर्वणिका आमनन्ति—‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।’ इति । प्रजापतिः तपः पर्यालोचनरूपं कृत्वा स्रष्टव्यरूपं निश्चित्य स्वकीयं शरीरमधूनुत कम्पितवान् । ८३

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 734, कुल 1049 में से · BharatKosha