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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 689, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 689

है। ब्राह्मण जाति में उत्तम, अधम, स्त्री, पुरुष सब आ जाते हैं। ब्राह्मण शब्द उद्देश्य है। उद्देश्यगत लिङ्ग और संख्या विवक्षित नहीं होती । स्कन्दपुराण नागरखण्ड के अनुसार विभीषण के अनुरोध से राम ने सेतु नष्ट कर दिया था। पद्मपुराण ( सृष्टिखण्ड अध्याय ३५ ) के अनुसार सीता के भूमिप्रवेश के बाद राम ने लक्ष्मण को अयोध्या का राज्यभार सौंपकर भरत के साथ पुष्पक पर चढ़कर पश्चिम में भरत के पुत्रों तथा लक्ष्मण के पुत्रों से मिलकर दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और सुग्रीव को साथ लेकर लङ्का पहुँच गये । विभीषण ने राम को वामन की वैष्णवी मूर्ति प्रदान की तथा राम ने सेतुभङ्ग किया । शत्रुघ्न से मिलकर कान्यकुब्ज देश में जाकर राम ने वामन की मूर्ति स्थापित की । नारदपुराण ( पूर्वखण्ड ७९।२९ ) के अनुसार राम ने द्रविड़ देश में विभीषण को मुक्त किया था । किन्तु पद्मपुराण ( पातालखण्ड अध्याय १०० ) में यह उल्लेख है कि भगवान् शङ्कर शम्भु नामक ब्राह्मण के रूप में किसी दिन अयोध्या आये थे । राम को समाचार मिला कि द्रविड़ों ने विभीषण को कैदी बना लिया है । राम शम्भु के साथ दक्षिण जाकर श्रीरङ्गम् के कारावास में विभीषण से मिले । वहाँ पता लगा कि विभीषण ने अनजाने एक विप्र को पैरों तले कुचलकर मार डाला था । उसके बाद विभीषण एक पग भी आगे नहीं बढ़ सका, पर ब्राह्मणों द्वारा मारे जाने पर भी वह नहीं मर सका । ब्राह्मणों ने उसके वध के लिए राम से आग्रह किया। राम ने विभीषण को अपना भक्त कहकर उसे छुड़ाया तथा विभीषण अज्ञान से हुई ब्रह्महत्या का उचित प्रायश्चित्त कर के अपनी राजधानी में लौटा । आनन्दरामायण के अनुसार राम तथा सीता ने शतस्कन्ध रावण तथा मूलकासुर द्वारा पराजित विभीषण की सहायता के लिए लङ्का-यात्रा की थी। वाल्मीकिरामायण में भरत की गन्धर्वदेश की विजययात्रा का वर्णन है ( सर्ग १००,१०१ ) । इसके बाद उन्होंने लक्ष्मण के पुत्रों के लिए कारुपथ तथा मल्लदेश को वश में किया था । आनन्दरामायण ( राज्यकाण्ड सर्ग ६ ) के अनुसार राम स्वयं पृथ्वी के समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त करते हैं । जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप आदि सप्त द्वीपों की यात्रा करते हैं ( आ० रा० राज्यका० सर्ग ७-९ ) । आनन्द- रामायण ( राज्यका० सर्ग २१ ) के अनुसार एक बार राम को वाल्मीकि और विश्वामित्र दोनों ने एक ही समय दूत भेजकर यज्ञ के लिए निमन्त्रण दिया । राम ने दोनों का निमन्त्रण स्वीकार किया । वहाँ अपने अन्य साथियों के दो- दो देह बना लिये और एक ही समय दोनों मुनियों के यहाँ पहुँच गये । सर्ग २४ में राम की यमपुर-यात्रा वर्णित है । सुमन्त्र की आयु ९ दिन शेष रहते हुए वह मर गया । राम ने यमपुर प्रस्थान किया। मार्ग में ही यमदूतों से भेंट हुई । राम ने उनको परास्त कर सुमन्त्र को लौटा लिया । आनन्दरामायण के पूर्णकाण्ड ( सर्ग १-४ ) में सोमवंशी राजाओं के आक्रमण का वर्णन है। राम अपनी सेना के साथ उनका सामना करने गये । हस्तिनापुर में ६ महीने तक भीषण युद्ध हुआ । अन्त में सीता के अनुरोध पर सन्धि हुई । बालकाण्ड तथा अयोध्याकाण्ड के कथानकों के अन्तर्गत भी राम की तीर्थयात्राएँ वर्णित हैं । स्कन्द- पुराण ( ब्राह्मख० धर्मारण्यमा० अध्याय ३३ ) में राम की धर्मारण्य की तीर्थयात्रा वर्णित है । ६३८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ७।४२ ) में रामाभिषेक के बाद तथा सीता- त्याग के पूर्व राम और सीता के विहार में अप्सराओं के नृत्य और मदिरा तथा मांस के सेवन का उल्लेख है।” परन्तु बुल्के को जानना चाहिये कि यज्ञ, यागादि में अनिषिद्ध तथा विहित मांस तथा दिव्य मधु निषिद्ध नहीं है ।

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