रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय उत्तरकाण्ड ६११ रघुवंश आदि में भी काञ्चनी सीता का उल्लेख है। यह शङ्का होती थी कि राम तो स्वयं ही सर्वदेव विष्णु थे फिर उन्होंने किस अन्य देव का यजन किया होगा ? उसी का समाधान करते हुए अग्निपुराण ने कहा है—“राम वासुदेव स्वरूप ही थे। अश्वमेध से उन्होंने ब्रह्म- स्वरूप स्वात्मा का ही यजन किया था— “वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत् ।” ( अ० पु० १०।३३ ) आनन्दरामायण के अनुसार राम ने १०० अश्वमेध किये । रामचरितमानस के अनुसार राम ने कोटि अश्वमेध किये थे— “कोटिन वाजिमेध प्रभु कीन्हे। अमित दान विप्रन कहँ दीन्हे॥ कल्पभेद से स्वयं किये अथवा अन्य अधिकारियों को प्रेरणा देकर राम ने साक्षात् एवं परम्परा से कोटि- कोटि अश्वमेध किये। कोटि-कोटि शिवलिङ्गों की स्थापना भी राम ने की थी— “कोटिशः स्थापयामास शिवलिङ्गानि सर्वशः। ६३६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण में राम के लिए ब्रह्महत्या का उल्लेख नहीं है। परन्तु पुराणों में इसका उल्लेख है। उसके प्रायश्चित्तस्वरूप राम ने अश्वमेध किया था ।” वाल्मीकिरामायण से अविरुद्ध होने के कारण यह भी ठीक ही है। स्कन्दपुराण सेतुमाहात्म्य के अनुसार रावण-वधजन्य ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करने के लिए राम ने कोटि- तीर्थ में ( अध्याय २७ ) तथा गन्धमादन में ( अध्याय ४४ ) शिवलिङ्गों की स्थापना की थी। ब्राह्मखण्ड में राम ने वसिष्ठ से कहा था कि मेरे द्वारा बहुत से ब्रह्मराक्षसों की हत्या हुई है। उसके प्रायश्चित्तार्थ उत्तम तीर्थ का आप निर्देश करें— “मया तु सीताहरणे निहता ब्रह्मराक्षसाः। तत्पापस्य विशुद्ध्यर्थं वद तीर्थोत्तमोत्तमम् ॥” वसिष्ठ धर्मारण्य की यात्रा और उस तीर्थ के जीर्णोद्धार का उपदेश करते हैं ( धर्मारण्यखण्ड अध्याय ३१ )। जैमिनीय अश्वमेध ( अ० २९ ) के अनुसार राम ने प्रायश्चित्तस्वरूप अश्वमेध किया था। पद्मपुराण ( अध्याय ४४ ) में राम के अश्वमेध का विस्तृत वर्णन है। उसमें हनुमान् का शिव एवं इन्द्र आदि देवताओं के साथ युद्ध वर्णित है। राम की यात्राएँ राम की लङ्कायात्रा सब से अधिक महत्त्वपूर्ण है। नृसिंहपुराण ( अध्याय २७ ) के अनुसार राम ने उस अवसर पर लङ्का में पुण्यारण्य की स्थापना की थी। स्कन्दपुराण ( नागरखण्ड अध्याय १०१ ) के अनुसार लक्ष्मण के परमधाम प्रस्थान के बाद सुग्रीव को लेकर राम ने लङ्का-यात्रा की थी एवं विभीषण को देवपूजा का आदेश दिया था। वस्तुतः रामायण और पुराणों का समन्वय ही है। रामायण के अनुसार ही पुराणों की संगति लगानी उचित है। राम मर्यादापुरुषोत्तम थे। रावण ब्राह्मण था। भले ही वह अधम ब्राह्मण हो, पर उसके वध से भी धर्मशास्त्रानुसार ब्रह्महत्या होती ही है, क्योंकि “ब्राह्मणो न हन्तव्यः” इस वचन में ब्राह्मणजाति के हनन का निषेध