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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 687

६१० रामायणमीमांसा एकोनविंश कारण ही ब्राह्मण रावण और शूद्र शम्बूक दोनों को दण्ड दिया गया था। कोई भी बुद्धिमान् यह भलीभाँति समझ सकता है कि जैसे ब्राह्मण अपना कर्म छोड़कर शूद्र का कर्म करे तो अवश्य अपराधी होगा वैसे ही शूद्र अपना कर्म छोड़कर ब्राह्मण का कर्म करने पर अपराधी क्यों न होगा ? पउमचरियं (पर्व ४३) के अनुसार खरदूषण-पत्नी शूर्पणखा का पुत्र शम्बूक सूर्यहास खड्ग प्राप्त करने के लिए १२ वर्ष तप करता है। खड्ग प्राप्त होता है। संयोग से उसी समय लक्ष्मण पहुँच जाते हैं। खड्ग को देख उठाकर बाँस काटते हैं और शम्बूक का सिर भी काटते हैं। चन्द्रनखा (शूर्पणखा) पुत्र से प्रतिदिन मिलने आती थी। उसे मरा देखकर विलाप करती है। वन में भटकती हुई राम और लक्ष्मण को देखकर उनपर आसक्त होती है। दोनों से अस्वीकृत होकर खर, दूषण एवं रावण को शम्बूक-वध की सूचना देती है। इस प्रकार शम्बूक-वध के कारण ही सीताहरण और राम-रावण-युद्ध होता है। किन्तु यह सब विकृत कल्पनामात्र है। तेलगू द्विपदरामायण के अनुसार शूर्पणखा का पति विद्युज्जिह्व रावण के विरुद्ध विद्रोह करने के कारण रावण द्वारा मारा जाता है। उसका पुत्र जम्बूमाली या जम्बुकुमार माता से पिता के वध का वृत्तान्त सुनकर खड्ग की प्राप्ति के उद्देश्य से साधना करता है और लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है (अरण्यकाण्ड १०)। आनन्दरामायण में शूर्पणखा-पुत्र साम्ब राक्षस है। वह ब्रह्मा से दिव्य खड्ग प्राप्त करता है। लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है (आ० रा० १।७।४१-४३)। कन्नड़ तोरवेरामायण के अनुसार शम्बूक राक्षस इन्द्रपद प्राप्त्यर्थ तपस्या करता है। उसके चारों ओर वाल्मीक बन गया। इन्द्र और नारद व्याध के रूप में मिलकर लक्ष्मण को मृगया का निमन्त्रण देते हैं। इन्द्र एक वराह की सृष्टि करते हैं जो वल्मीक की ओर जाता है। लक्ष्मण के बाण से वराह और शम्बूक दोनों का वध होता है। सेरतकाण्ड के अनुसार शूर्पणखा का दर्सासींगा तपस्या से चन्द्रवाली नामक खड्ग प्राप्त करता है। संयोग से वह लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है। रामकियेन के अनुसार रावण-भगिनी सम्मनखा थी। जिसका पति जिह्व तथा पुत्र कुम्भकश था। कुम्भ- कश ने गोदावरी के तट पर एक दिव्य खड्ग प्राप्त किया। परन्तु ब्रह्मा ने कुम्भकश को वह खड्ग हाथ में न देकर सामने गिरा दिया। उसने हाथ में न देने के कारण अपमान समझकर उसे नहीं लिया। लक्ष्मण आकर उसे उठाते हैं। कुम्भकश उनसे युद्ध करता है और मारा जाता है। रावण बाद में जिह्व का भी वध करता है। ब्रह्मचक्र में लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की दो पुत्रियों का वध वर्णित है। वस्तुतः जम्बूक, जम्बुमाली, शम्बूक राक्षस आदि शूर्पणखा सम्बन्धी व्यक्ति पृथक् है एवं वाल्मीकिरामायण का शम्बूक शूद्र पृथक् है। नामसाम्य से ही दोनों की एकता की भ्रान्ति हुई है। राम का अश्वमेध राम ने पहले राजसूय यज्ञ करने का विचार किया था, किन्तु भरत के विरोध करने पर लक्ष्मण के प्रस्तावानुसार अश्वमेध किया। उसी के प्रसङ्ग से सीता ने सतीत्व का प्रत्यय दिया और प्रकट दिव्य सिंहासन पर बैठकर भूमि में प्रविष्ट हो गयीं। राम ने बाद में भी बहुत से यज्ञ किये, किन्तु सर्वत्र काञ्चनी सीता ही उनके साथ रहीं। उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया— "न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥" ९९।७