रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय उत्तरकाण्ड ६०९ कुछ अनभिज्ञ इसे राम की क्रूरता कह सकते हैं और स्वयं राम भी अपने दक्षिण हाथ को क्रूर कहते हैं—हे दक्षिण हस्त ! तुम ब्राह्मण-पुत्र के जीवन के लिए शूद्र मुनि पर कृपाण चलाओ, कतराते क्यों हो, तुम तो उस राम के बाहु हो जिसने निर्भरगर्भखिन्ना सीता के निर्वासन में अपनी पटुता दिखायी थी, फिर तुम्हें करुणा कैसी ? 'हे हस्त दक्षिण मृतस्य शिशोद्विजस्य् जीवातवे विसृज शूद्रमुनौ कृपाणम् । रामस्य बाहुरसि निर्भरगर्भखिन्न- सीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते ।।” ( उ० रा० च० ) वेदादि शास्त्रोक्त कर्म ही धर्म है। यह— “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।” ( गीता १६।२४ ) “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ।” ( मी० द० १।१।१२ ) आदि से स्पष्ट है । तदनुसार चातुर्वर्ण्यधर्म के विपरीत आचरण अधर्म है। राम ने शम्बूक शूद्र को ही नहीं धर्मविपरीत ब्राह्मण रावण को भी प्राणदण्ड दिया था। अतः उनकी निष्पक्षता स्पष्ट है । धर्म पर चलनेवाले वानरों, भालुओं, गीध, काक तथा कोल, भिल्ल, किरात, निषाद आदि सबका ही आदर किया था। कोई भी कर्म अधिकारानुसार ही पुण्य हो सकता है। अनधिकारी का वेदाध्ययन, यज्ञ और तप भी पाप ही हो सकता है । यति को काञ्चन, ब्रह्मचारी को ताम्बूल तथा चोर को अभय का दान पाप ही है— “यतये काञ्चनं दत्त्वा ताम्बूलं ब्रह्मचारिणे । चोराय चाभयं दत्त्वा दातापि नरकं व्रजेत् ॥” एक यातायातनियामक का अपना काज छोड़कर किसी शिष्ट की रक्षा जैसे अच्छे काज में लगना भी अपराध है । स्वकर्तव्य में निष्ठा ही धर्म है— “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।” ( गीता० १८।४५ ) “स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः । विपरीत्तस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्चयः ॥” ( पुराणवचन ) यातायातनियामक के अन्यकार्याभिमुख होने पर यदि मोटर आदि का एक्सीडेंट हो जाय तो इसका उत्तरदायित्व सिवा नियामक के किसके ऊपर होगा ? वह एक मनुष्य को बचाने के लिए अपने कर्तव्य से विमुख होता है तो नियन्त्रण न-होने से अनेक एक्सीडेंट हो सकते हैं । सैकड़ों शिष्टों का जीवन संकटग्रस्त हो सकता है। अतः स्वधर्मविमुख अवश्य ही दण्डनीय है । एक न्यायाधीश के सामने किसी हत्यारे का हत्या का अपराध सिद्ध हो जाने पर न्यायाधीश का कर्तव्य है कि उसे प्राणदण्ड का आदेश दे, फिर भले ही उसके बूढ़े माँ, बाप तथा युवती स्त्री एवं दुधमुंहे बालकों का जीवन खतरे में पड़ जाय । यदि शम्बूक के समान कोई स्वास्थ्य अधिकारी (हेल्थ डिपार्टमेण्ट का अधिकारी ) सफाई का इन्चार्ज अपने पद का चार्ज बिना दिये तपस्या में बैठ जाय और सफाई की गड़बड़ी से प्लेग, कालरा आदि फैलने से ब्राह्मण आदि वर्णों के बालक मर जायें तो स्पष्ट ही इसका उत्तरदायित्व उसी पर है। जो अपना काम छोड़कर तप में बैठा है। हरएक समझदार उसके लिए प्राणदण्ड उचित ही समझेगा । कर्तव्यपालन की उपेक्षा का दुष्परिणाम सर्वप्रसिद्ध ही है। शास्त्रों में तप का विधान चतुर्थ वर्ण के लिए नहीं है । वैदिक चातुर्वर्ण्यधर्म का उल्लङ्घन करने के ७७