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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 685

६०८ रामायणमीमांसा एकोनविंश पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड अध्याय ३२।८९ तथा उत्तरखण्ड अध्याय २३०।४७) में भी देवताओं के वरदान से द्विज-पुत्र के जीवित होने का उल्लेख है। महाभारत शान्तिपर्व में कहा गया है कि— “श्रूयते शम्बुके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः। जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥” (म० भा० १२।१४९।६२) इसमें देवताओं के वरदान से नहीं, किन्तु राम के धर्म से द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होना माना गया है। वस्तुतः बुल्के समन्वय की बात सोचते ही नहीं। उन्हें सर्वत्र विरोध ही दिखायी देता है। अन्यथा देवताओं के प्रसाद या धर्म से पुनर्जीवन में विरोध ही क्या है। धर्म भी तो देवता-प्रसाद का साधन है, अतः राम के धर्म से देवता-प्रसाद और उससे द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होने में विरोध का लेश भी तो नहीं है। यही श्लोक इस बात का भी परम प्रमाण है कि रामायण महाभारत की अपेक्षा अति प्राचीन है। अतः रामकथा पर कृष्णकथा का प्रभाव अथवा महाभारत के रामोपाख्यान को वाल्मीकिरामायण का मूल मानना सर्वथा भ्रान्ति ही है। कालिदास के रघुवंश एवं उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक-वध के द्वारा ही ब्राह्मण पुत्र पुनर्जीवन प्राप्त करता है— “कृतदण्डः स्वयं राज्ञा लेभे शूद्रः सतां गतिम् । तपसा दुश्चरेणापि न स्वमार्गविलङ्घिना ॥” (र० वं० १५।५३) राजा के द्वारा दण्ड दिये जाने के कारण शूद्र को उत्कृष्ट सद्गति मिल गयी, जो कि स्वमार्गविपरीत दुश्चर तप से भी नहीं मिल सकती थी। उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक, वध के बाद, दिव्य रूप में प्रकट होकर राम से कहता है, मैं आपके प्रसाद से शाश्वत पद प्राप्त करूँगा। बुल्के कहते हैं कि परवर्ती राम-कथाओं में देवताओं के वरदान का उल्लेख नहीं है, किन्तु राम द्वारा शम्बूक-वध की क्रिया ही ब्राह्मण-पुत्र के पुनर्जीवन एवं शम्बूक की स्वर्गप्राप्ति दोनों घटनाओं की कारण मानी गयी है। किन्तु बुल्के यह नहीं समझते कि मीमांसकों के अनुसार कर्म ही फल देता है। उत्तरमीमांसा के अनुसार देवताप्रसाद द्वारा कर्म फल देता है। परिणाम दोनों का एक ही है। देवताओं का वरदान भी सत्कर्म द्वारा होता है। इसी लिए कहा गया है कि— ‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करै सो तस फल चाखा॥’ (रा० मा० २।२७।२) अतः प्रकृत में दोनों का समन्वय ही है। आनन्दरामायण के अनुसार मृत ब्राह्मण-बालक के माता-पिता को प्रीतिपूर्वक कहा गया था कि यदि उनका पुत्र पुनर्जीवित न होगा तो उन्हें कुश और लव मिल जायेंगे। ब्राह्मण ही नहीं अयोध्या में पाँच शव और एकत्रित हो गये थे : एक क्षत्रिय, एक वैश्य, एक तेली, एक लुहार की पुत्र-वधू एवं एक चमार। राम ने जैसे शूद्र को मारा सब जीवित हो गये। राम ने पहले शूद्र को वरदान दिया। उसने अपने उद्धार के अतिरिक्त अपनी जाति के लिए सद्गति माँगी। राम ने रामनाम का जप और कीर्तन शूद्रों की सद्गति का उपाय बताया। यह भी कहा कि शूद्र लोग आपस में मिल कर एक दूसरे से मिलते हुए नमस्कार के रूप में राम राम कहेंगे। इसी से उनका उद्धार होगा। तुम भी मेरे हाथ से मरकर वैकुण्ठ जाओगे।