भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 684

सोम का कल्माषपाद प्राचीन संस्कार वशात् पहले मांसभक्षक और फिर शाप आदि के बिना ही नरभक्षक बनता है। महाभारत का कल्माषपाद १०० ब्राह्मणों को खाता है, किन्तु सुतसोम जातक का कल्माषपाद देवता को बलिदान करने के लिए १०१ राजकुमारों को बटोरता भर है, खाता नहीं और बाद में उनको छोड़कर उनका राज्य लौटा देता है। महाभारत का कल्माषपाद शाप से एवं राक्षसावेश से नरभक्षक बनता है और अभिमन्त्रित जलप्रोक्षण कर वसिष्ठ के अनुग्रह वश मुक्त होता है। जातक का कल्माषपाद सुतसोम के उपदेश से ही आदत छोड़ता है। इस तरह दोनों में महान् अन्तर है। सुतसोमजातक का आख्यान लौकिक स्वाभाविक होने से भी अर्वाचीन प्रतीत होता है, किन्तु महाभारत और रामायण के दोनों आख्यान वर, शाप आदि अलौकिकता से सम्बन्ध रखते हैं, अतः वे प्राचीन हैं। महाभारत और रामायण की कथा संक्षिप्त है तथा सुतसोमजातक की कथा सविस्तर है। इस तरह दोनों में महान् अन्तर है। वेद के उपबृंहणार्थ ही महाभारत तथा रामायण का आविर्भाव है, अतः वैदिक साहित्य की कथा से उनका मेलजोल हो सकता है। बृहद्देवता की कथा का सुतसोमजातक की कथा से साम्य नहीं है, यह बुल्के भी मानते हैं। महाभारत में दो शापों का उल्लेख है। बुल्के कहते हैं कि "कल्माषपाद नाम का वैदिक साहित्य में सर्वथा अभाव है। महासुतसोमजातक गाथा ४७२, महाभारत तथा रामायण तीनों में समानरूप से मिलता है। इनमें सुतसोमजातक सबसे प्राचीन है। अतः पहले पहल यह नाम बौद्ध साहित्य में ही प्रयुक्त हुआ है। महाभारत, रामायण तथा पुराणों में सौदास, मित्रसह तथा कल्माषपाद तीनों नाम दिये हैं", पर यह सभी कुशकाशावलम्बन है। महाभारत और रामायण की बुद्ध से भी प्राचीनता सिद्ध की जा चुकी है। हरिवंशपुराण भी महाभारत समकालीन ही है। उसमें स्पष्ट उल्लेख है— "सुदासस्य सुतस्त्व्वासीत् सौदासो नाम पार्थिवः । ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहस्तथा ॥" (हरिवं० १।५५।२१) अतः बुल्के का यह कहना "एक दीर्घकालीन विकास के अन्त में सौदास की कथा भक्तवत्सल भगवान् राम के गुणगान में परिणत हो गयी।" कथमपि सङ्गत नहीं है, अवश्य ही सौदास की कथा प्राचीन ही नहीं अतिप्राचीन है। परन्तु वह अतिप्राचीन काल से ही रामायण के अन्तर्गत होने से राम गुणगान के रूप में स्वीकृत है, पर बुल्के के विकासक्रम से नहीं। महाभारत, रामायण तथा पुराण सभी वेद के उपबृंहणार्थ ही निर्मित हैं। अतः वैदिक साहित्य से ही उनका सम्बन्ध है। किञ्चित् भेद होने पर कल्पभेद से समाधान है ही। आश्चर्य है कि बुल्के वेद में आनेवाले राम, सीता, दशरथ, जनक आदि का सम्बन्ध रामायण के राम, सीता, दशरथ आदि से मानने में आनाकानी करते हैं। वेदप्रातिशाख्य के वाल्मीकि से रामायण के वाल्मीकि का सम्बन्ध वे नहीं मानते हैं। वैदिक सौदास से सुतसोमजातक के सौदास का अत्यन्त वैलक्षण्य होने पर भी वे यथा- कथञ्चित् बादरायणसम्बन्ध-स्थापना का हठ करते हैं। 'किमाश्चर्यमतः परम् ।' शम्बूक-वध ६२८ वें अनु० में शम्बूक-वध के सम्बन्ध में उत्तरकाण्ड के अनुसार कहा गया है कि राम नारद से यह जान लेते हैं कि एक शूद्र का तपस्या करना ही ब्राह्मण-पुत्र की अकाल मृत्यु का हेतु है। राम पुष्पक पर आरूढ़ होकर शूद्र का पता लगाकर उसका वध करते हैं। राम के इस कार्य से वह स्वर्ग प्राप्त न कर सकेगा। इस कथन का इतना ही अभिप्राय है कि शम्बूक जो सदेह स्वर्ग प्राप्त करना चाहता था वह न कर सकेगा। किन्तु राजदण्ड से मृत्यु प्राप्त कर तो वह स्वर्गभागी होगा ही, अतः इसका अन्य वचनों के साथ समन्वय ही है, विरोध नहीं है। राम मृत पुत्र के पुनर्जीवन का वरदान माँग लेते हैं। अगस्त्य राम को श्वेत राजा और दण्डकारण्य की कथा सुनाते हैं।