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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

६२६ रामायणमीमांसा एकोनविंश चिता में बैठने को तैयार हो गये । कृष्ण वहाँ बटु के रूप में पहुँचे । सारा हाल सुनकर बोले साक्षी के अभाव में आप दोनों का काम व्यर्थ हुआ । मेरे सामने अपनी सामर्थ्य दिखाइये । अब की बार कृष्ण ने सेतु के नीचे अपना चक्र रख दिया जिससे हनुमान् के भार से भी सेतु न टूटा । वे तुरन्त जान गये कि ये भगवान् हैं । किसी कथा के अनुसार भगवान् ने कच्छप-रूप धारण कर शरसेतु की रक्षा की । हनुमान् ने समझ लिया । भगवान् ने कृष्णरूप में दर्शन देकर उनका आलिङ्गन किया । भगवान् ने सेतु भी समुद्र में डुबाकर अर्जुन का गर्व दूर किया । उस समय से हनुमान् अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान हुए । इन सब प्रमाणों के रहते बुल्के आदि कैसे महाभारत को प्राचीन मानकर रामायण पर उसका प्रभाव बतलाते हैं, यही आश्चर्य है । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार अर्जुन ने कृष्ण से कहा—मैं समुद्र पर सेतु बना सकता हूँ । राम ने सेतु क्यों बनवाया ? कृष्ण ने कहा वह महाकाय वानर वीरों के लिए बनाया गया था। अर्जुन ने गर्व से कहा—मेरा सेतु किसी भी भार का सहन कर सकता है। कृष्ण ने हनुमान् को बुलवाया । अर्जुन ने सेतु बनाया । पर वह हनुमान् के चढ़ते ही चूर्ण हो गया । भगवान् ने वराहरूप से संभाला। हनुमान् ने कृष्ण के अनुरोध से महाभारत में अर्जुन के ध्वजपर बैठना स्वीकार किया । कर्णदान काव्य में कहा गया है कि सारलादास के महाभारत कर्णपर्व के अनुसार कर्ण के साथ युद्ध करते समय अर्जुन को गर्व हुआ कि कर्ण के बाण से मेरा रथ थोड़ा ही पीछे हटता है, किन्तु मेरे बाणों से कर्ण का रथ चौगुनी दूरी तक पीछे हट जाता है । किन्तु कृष्ण ने यह कहकर कर्ण की ही प्रशंसा की कि कर्ण का रथ हल्का है और यह रथ मेरु-मन्दर के तुल्य भारी है, इसपर सभी देवता विद्यमान हैं । ध्वज में हनुमान् हैं, फिर भी कर्ण इसे अपने बाणों से हटा देता है । कृष्णावतार के समय भगवान् ने हनुमान् को बुलाकर द्वारका के किसी उपवन में निवास कराया । कृष्ण ने सत्यभामा, सुदर्शन तथा गरुड़ तीनों का गर्व दूर करना चाहा । गरुड़ से कहा—अमुक वन में रहनेवाले वानर को पकड़ लाओ । हनुमान् ने उन्हें ६०,००० योजन पार समुद्र में फेंक दिया । बाद में कृष्ण ने पुनः गरुड़ को भेजा कि हनुमान् को द्वारका के राजभवन में आने का निमन्त्रण दे आओ स्वयं धनुर्धारी राम बन गये । सत्यभामा को सीता का रूप धारण करने को कहा । सुदर्शन से कहा—सावधान ! कोई भी प्रवेश न करने पाये । हनुमान् गरुड़ के बहुत पहले द्वारका पहुँच गये । सुदर्शन चक्र को मुख में रखकर राजभवन में प्रवेश किया । वे रामरूपी कृष्ण के सामने नतमस्तक होकर तुरन्त पहचान गये कि सत्यभामा सीता नहीं है । कृष्ण ने हनुमान् को द्वारपाल नियुक्त किया । दाशरथि (१८०६ ई०—१८४७ ई०) की पाञ्चाली के "सत्यभामा, सुदर्शनचक्र ओ गरुड़ेर दर्पचूर्ण" अध्याय के अनुसार कृष्ण ने गरुड़ को हिमालय से एक नील कमल लाने को भेजा । वहाँ उनका हनुमान् से युद्ध हुआ । हनुमान् ने गरुड़ को काँख में दबाकर एक नील कमल के साथ द्वारका के लिए प्रस्थान किया । सुदर्शन ने हनुमान् को महल के द्वार पर रोकने का प्रयास किया, किन्तु सुदर्शन हनुमान् का एक बाल भी बाँका न कर सके । उन्होंने अपनी हार मान ली । इतने में कृष्ण ने यह देखकर कि हनुमान् आ रहे हैं राम का रूप धारण कर लिया । सत्यभामा को सीता का रूप धारण करने को कहा, किन्तु वह समर्थ नहीं हुईं । रुक्मिणी ने सीता का रूप धारण किया । सत्यभामा और उनकी सखियाँ उनकी हँसी उड़ाने लगीं । हनुमान् ने राम के चरणों पर नील कमल रखकर गरुड़ को काँख से निकाल दिया । ऐसी कथाएँ अन्यत्र भी हैं ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२७ पउमचरियं के अनुसार हनुमान् ने वरुण के १०० पुत्रों को कैद कर लिया था। पर्व ५० में हनुमान् ने अपने दादा महेन्द्र को सेना सहित पराजित किया था। स्कन्दपुराण (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यमा० अ० ३६,३७) में हनुमान् के प्रभाव से धर्मारण्य के निवासियों की सुख-शान्ति तथा हनुमान् द्वारा कुम्भीपाल की पराजय से वहाँ के ब्राह्मणों की सुरक्षा का वर्णन है। आनन्दरामायण (राज्यकाण्ड सर्ग १८) के अनुसार राम ने ब्राह्मणों को रामनाथपुर का राज्य प्रदान किया तथा हनुमान् को उनकी सहायता के लिए नियुक्त किया। बाद में हनुमान् ने देवालय की पाषाण मूर्ति से प्रकट होकर एक दुष्ट राजा को शूली पर चढ़ाया था। आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड सर्ग १२२) में स्त्रीराज्य की कथा मिलती है। एक रामभक्त ब्राह्मण की सहायता के लिए प्रकट होकर हनुमान् ने अपने गर्जन से ही सब पुरुषों को मार डाला, जिससे उस देश का स्त्रीराज्य नाम पड़ा। भावार्थरामायण (७।१) में भी हनुमान् को राम द्वारा स्त्रीराज्य में भेजने की कथा है। यह भी कहा जाता है कि वीरमाता अञ्जना ने अपने दूध की धारा से एक पर्वतश्रेणी को बहा दिया था। रामायण में हनुमान् के लिए सचिवोत्तम, मन्त्रिसत्तम, पिङ्गाधिपमन्त्री, कपिराजहितकर, प्लवङ्गाधिप- मन्त्रिसत्तम आदि विशेषण आते हैं। प्रज्ञासूचक विशेषणों में मतिमान्, महामति, महाप्राज्ञ, मेधावी, बुद्धिमतां वरिष्ठ, धीमान्, साधुबुद्धि, अचिन्त्यबुद्धि, वाक्यज्ञ, वाक्यविशारद आदि विशेषण विशेषरूप से आते हैं। हनुमान् संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं के विद्वान् थे। अशोकवाटिका में वे इसी लिए संस्कृत नहीं बोलते कि संस्कृत बोलने से सीता उन्हें रावण न समझ लें— “वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् । यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ॥ रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति । अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ॥ (वा० रा० ५।३०।१७,१८) ६८९ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “हनुमान् की विभिन्न शास्त्रों में पहुँच का उल्लेख मूलरामायण में नहीं रहा होगा। हनुमान् की जन्म-कथा में उनको सर्वशास्त्रविदांवर की उपाधि दी गयी है (वा० रा० ४।६६।२) ।” सर्वत्र ही बुल्के को अपनी अनर्गल बात को सिद्ध करने के लिए रामायण 'की कथाओं को क्षेपक कहना पड़ता है। अन्यथा वाल्मीकिरामायण में तो हनुमान् को सर्वशास्त्रविदों में श्रेष्ठ कहा ही गया है। वाल्मीकिरामायण ४।५४।५ में भी हनुमान् को सर्वशास्त्रविशारद कहा गया है। अन्य स्थलों में भी हनुमान् की तत्त्वज्ञता वर्णित है— “निश्चितार्थोऽर्थतत्त्वज्ञः कालधर्मविशेषवित् ।” (वा० रा० ४।२९।६) तथा— “विदिताः सर्वलोकास्ते” (वा० रा० ४।४४।४)। बुल्के कहते हैं कि अधिक संभव है कि ये बाद के प्रक्षेप हों, पर वे सात जन्म लेकर भी हनुमान् की सब शास्त्रों में पहुँच नहीं थी, इसमें कोई प्रमाण नहीं बतला सकते । उत्तरकाण्ड की कथा में अगस्त्यजी ने राम को स्पष्ट बताया ही था कि हनुमान् ने सूर्य भगवान् से व्याकरणादि वेदाङ्ग, वेद, छन्द आदि का अध्ययन कर सब को धारण किया था । परन्तु बुल्के के पास इन सबको प्रक्षेप कहने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। महाभारत आरण्यक पर्व में भी हनुमान् और भीम के संवाद में हनुमान् को शास्त्रज्ञ कहा गया है। वे भीम को चार युगों (अध्याय

६२८ रामायणमीमांसा एकोनविंश १४८ ) तथा चार वर्णों ( अध्याय १४९ ) के धर्मों का उपदेश करते हैं । किन्तु बुल्के अन्यत्र महाभारत में न होने के कारण वाल्मीकिरामायण में विद्यमान अंशों को क्षेपक कहते हैं परन्तु महाभारत के आरण्यक पर्व में हनुमान् के लिए शास्त्रज्ञ होने का उल्लेख होते देखकर कहते हैं कि यह उल्लेख उत्तरकाण्ड के प्रभाव से हुआ है । उत्तरकाण्ड को तो वे प्रक्षेप मानते ही हैं । वस्तुतः उनके ही पूर्वोक्त तर्कों के अनुसार महाभारत आरण्यक पर्व से समर्थित होने के कारण उत्तरकाण्ड को प्रामाणिक काण्ड मानने के लिए उन्हें बाध्य होना चाहिये । साथ ही उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं है कि वे महाभारत के स्वयं रामोपाख्यान की छाप वाल्मीकिरामायण पर मान चुके हैं । फिर उन्हें महा- भारत पर उत्तरकाण्ड का प्रभाव मानने का क्या अधिकार है । यों उनकी अधिकांश बाते उन्हीं के विरुद्ध हैं । सिद्धान्ततः दाक्षिणात्य पाठ भी प्रामाणिक ही है । उसमें स्पष्ट कहा है कि हनुमान् तीनों वेदों एवं व्याकरण के महान् विद्वान् थे— “नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः । नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम् ॥ नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम् ॥” ( वा० रा० ४।३।२८,२९ ) राम कहते हैं जिसे ऋग्वेद में शिक्षा नहीं प्राप्त है, जो यजुर्वेद नहीं जानता तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है वह ऐसा भाषण नहीं कर सकता जैसा हनुमान् ने भाषण किया । निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण शास्त्र का बहुत प्रकार से अध्ययन किया है । तभी बहुत बोलने पर भी किसी अपशब्द का उच्चारण नहीं किया । इन उद्धरणों से स्पष्ट ही हनुमान् की वेद-वेदाङ्गविज्ञता सिद्ध होती है । वस्तुस्थिति तो यह है कि वे विद्याधिपति शिव ही हैं । उनके अनुग्रह से आज भी बड़े बड़े विद्वान् पैदा होते हैं । परन्तु बुल्के अपनी मनोवृत्ति का परिचय देते हुए कहते हैं—"रामायण के कुशीलव ( गायक ) हनुमान् का ज्ञान-भण्डार बढ़ाते रहे हैं।" परन्तु आज के रामायण गायक तो विचारे हनुमान् की कृपा से अपना ज्ञान-भण्डार बढ़ाते हैं, किन्तु हनुमान् का ज्ञानभण्डार कोई मनुष्य कैसे बढ़ा सकता है ? बुल्के समझते हैं कि हनुमान् वस्तुतः वैसे नहीं थे, किन्तु व्यासों ने बढ़ाकर वैसा वर्णन किया है । पर उनकी यह समझ भ्रान्तिपूर्ण ही है । भारतीय व्यास पाश्चात्यों के समान मिथ्या इतिहास गढ़ने के अभ्यासी नहीं हैं । छन्दःशास्त्र के भी हनुमान् विद्वान् थे । बुल्के कहते हैं "इसी लिए हनुमन्नाटक की रचना का श्रेय हनुमान् को दिया गया है।" पर बुल्के को यह सोचना चाहिये था कि कोई भी ग्रन्थकर्ता के रूप में अपना ही नाम चाहता है । स्वयं ग्रन्थ लिखकर अपना उससे सम्बन्ध न जोड़कर अन्य को रचयिता के रूप में प्रसिद्ध करना बुल्के के यहाँ प्रसिद्ध है ? तो फिर अपनी रामकथा को ही दूसरे की रचना क्यों नहीं कहते ? कहा जाता है कि वाल्मीकि महर्षि की रुचिरक्षा की दृष्टि से हनुमान् ने अपनी रचना को समुद्र में फेंक दिया था । तुलसीदास ने विनयपत्रिका में वस्तुस्थिति के अनुसार ही हनुमान् को वेदवेदान्तविद् कहा है, केवल उपाधि नहीं दी । अध्यात्मरामायण ( १।१।३२-५२ ) के अनुसार सीता और राम हनुमान् को वेदान्त का उत्कृष्ट तत्त्व बतलाते हैं । मुक्तिकोपनिषद् तथा रामगीता में हनुमान् को उच्च दार्शनिक शिक्षा दी जाने का उल्लेख है । अद्भुत- रामायण ( सर्ग १०-१५ ) में राम हनुमान् को अपना विष्णुरूप दिखा कर उन्हें सांख्ययोग तथा भक्तियोग का उपदेश करते हैं । रामरहस्योपनिषद् अर्वाचीन नहीं अतिप्राचीन साक्षात् वेदस्वरूप है । उसके अनुसार हनुमान् सनकादिकों को रामोपासना की पद्धति बतलाते हैं ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२९ हनुमत्संहिता के अनुसार हनुमान राम की चारुशीलानामक प्रधान सखी के रूप में अगस्त्य को भक्ति की शिक्षा देते हैं। शिवसंहिता में हनुमान् और अगस्त्य के संवादरूप में तत्त्वज्ञान वर्णित है। दि बंगाली रामायण्स पृ० ५१ के अनुसार हनुमान् ज्योतिषी एवं संगीतज्ञ भी थे। परन्तु यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। महाभारत के भीम और हनुमान् के संवाद के अनुसार हनुमान् गन्धर्वों एवं अप्सराओं से रामायण का गान नित्य ही सुनते रहते हैं। तुलसीदास ने भी विनयपत्रिका में 'गानगुनगरवगन्धर्वजेता' कहा है। सामगायक, सामगानाग्रणी आदि भी उन्हें कहा है। यह सब कोरी कल्पना नहीं है। ऋषि, महर्षि, सन्त, सत्यवक्ता लोग मिथ्या भावना या कल्पना की सृष्टि नहीं करते हैं। रामकथाओं में हनुमान् के महायशा, कीर्तिमान्, यशस्वी, चिरञ्जीवी होने का भी वर्णन है। बुल्के अनु० ६९३ में कहते हैं कि "महाभारत का रामोपाख्यान रामायण के किसी प्राचीन रूप पर निर्भर है। उसमें राम अथवा देवताओं द्वारा हनुमान् को प्रदत्त किसी वरदान का उल्लेख नहीं है।" पर यह भी उनकी भ्रान्ति ही है। महाभारत रामोपाख्यान तथाकथित किसी अन्य रामायण पर नहीं प्रचलित वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर है। परन्तु वह संक्षेप है, अतः प्रचलित रामायण की सभी बातों का उसमें समावेश न होना स्वाभाविक ही है। “रामकीर्त्या समं पुत्र ! जीवितं ते भविष्यति ।” ( म० भा० ३।२७५।४३ ) सीता ने कहा है—पुत्र ! रामकीर्ति के समान ही तुम्हारा भी जीवन अमर रहेगा। बुल्के अपनी दुष्कल्पना के अनुसार कहते हैं कि “बहुत संभव है, इस उक्ति के अनुसार हनुमान् के विषय में यह माना जाने लगा कि जीवित रहकर हनुमान् हिमालय पर निवास करते हैं। इस विश्वास का प्राचीनतम उल्लेख हनुमान् और भीम के संवाद में सुरक्षित है। जिसमें हनुमान् कहते हैं कि मैंने राम से यह वरदान माँगा था कि जब तक रामकथा पृथ्वी पर प्रचलित रहेगी तब तक मैं जीवित रहूँ ( म० भा० ३।१४७।३७ ) । पर हनुमान् यह भी कहते हैं—इस स्थान पर अप्सराएँ तथा गन्धर्व रामचरित गाकर मुझे आनन्दित करते रहते हैं। रामोपाख्यान का सहारा लेकर बुल्के प्रचलित रामायण को अर्वाचीन एवं प्रक्षेपपूर्ण कहते हैं। परन्तु मौके पर रामोपाख्यान को भी किसी विश्वासमात्र पर निर्भर मान लेते हैं। आश्चर्य है ऐसे पूर्वापर विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करके बुल्के अपना और दूसरों का समय नष्ट करने में क्यों प्रवृत्त हुए ? वस्तुतः— “यावद्रामकथा वीर भवेल्लोकेषु शत्रुहन् । तावज्जीवेयमित्येवं तथास्त्विति च सोऽब्रवीत् ।।'' (वा० रा० ३।१४७।३७) जब इस तरह रामोपाख्यान में भी राम के वरदान का उल्लेख है ही तब यह कैसे कहा जाय कि मूल- रामायण में हनुमान् को प्रदत्त किसी वरदान की बात नहीं थी। जैसे राम अनन्त हैं वैसे रामकथा भी अनन्त है। तदनुसार हनुमान् का जीवन भी अनन्त ही है। रामायण में भी यही कहा गया है— “मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर । तावद्रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् ।।'' ( वा० रा० ७।१०८।३० ) रामायण उत्तरकाण्ड में राम द्वारा हनुमान् को दो बार वरदान देने का उल्लेख है। स्वर्गारोहण के पूर्व राम कहते हैं—हरीश्वर ! लोक में जब तक मेरी कथाएँ प्रचलित रहेंगी तब तक तुम मेरी आज्ञा का पालन करते हुए सुप्रसन्न होकर मेरी कथा में रमण करो— “मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर । तावद्रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् ।।'' ( वा० रा० ७।१०८।३० ) ।

६३० रामायणमीमांसा एकोनविंश उत्तरकाण्ड के ४० वें सर्ग में यह प्रसङ्ग विस्तृत रूप से वर्णित है। महाभारत में हनुमान् ने कहा था कि हिमालय के जिस स्थान पर वे रहते हैं वहाँ गन्धर्वादि रामचरित गाया करते हैं। बुल्के कहते हैं कि “अब रामचरित का यह गान वरदान का रूप धारण कर लेता है।” परन्तु यह बुल्के की भ्रान्ति ही है, क्योंकि रामायण की बात ही पहली है। महाभारत का रामोपाख्यान तो उसी का संक्षेप है। अतः वरप्रदान की चर्चा न करके महाभारत में परिस्थितिमात्र का वर्णन किया गया है। रामायण की मूल बात यही है कि अभिषेक के बाद अयोध्या से बिदा लेते समय हनुमान् राम से चिरजीवित्वपूर्वक रामकथाश्रवण तथा रामभक्ति का वरदान मांगते हैं— “स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा । भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ॥ यावद्रामकथा वीर चरिष्यति महीतले । तावच्छरीरे वत्स्यन्तु मम प्राणा न संशयः ॥ यच्च

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३१ जाता है। अतः वरदानों को विकास या कल्पना कहना भारी भूल ही है। जहाँ राम-कथा होती है वहाँ हनुमान् रहते हैं, यह विश्वास न होकर वस्तुस्थिति है ।। रामायण की अनुष्ठान-परम्परा में यह पाठ मिलता — “यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् । बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥” जहाँ-जहाँ रघुनाथ के गुणों, नामों तथा कथाओं का कीर्तन होता है वहाँ-वहाँ हाथ जोड़े, सिर झुकाये तथा बाष्पजल से परिपूर्णलोचन राक्षसान्तक हनुमान् विराजमान रहते हैं, उन्हें नमस्कार करो । ब्रह्मचर्य ६९६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “महीरावण की कथा में हनुमान् के एक पुत्र का उल्लेख है । लङ्का- दहन के अनन्तर समुद्र में स्नान करते समय हनुमान् का स्वेद अथवा श्लेष्मा निगलकर कोई मछली गर्भिणी हो गयी । उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ । मैरावणचरितम् (अ० १० ) के अनुसार उस पुत्र का नाम मत्स्यराज है । वह हनुमान् को अपना परिचय देते हुए कहता है— “तिमिङ्गिला हि मन्माता पिता च हनुमान् ।” हनुमान् यह कहकर आपत्ति करते हैं— “हनुमान् ब्रह्मचारीति विख्यातं भुवनेष्वपि ।” अतः पूर्वोक्त प्रसङ्ग से भी ब्रह्मचर्य में कोई बाधा नहीं । हनुमान् का ब्रह्मचर्य स्कन्दपुराण ( अवन्तीखण्ड अ० ८० ) से भी सिद्ध है । वहाँ का शिवलिङ्ग हनुमान् के ब्रह्मचर्य के प्रभाव से तथा ईश्वर के प्रसाद से कामप्रद है— “यद्यहं ब्रह्मचर्यञ्च जन्मपर्यन्तमुद्यतः । ईश्वरस्य प्रसादेन लिङ्गं कामप्रदं हि तत् ॥ (पद्मपु० पातालख० ४५।३१) पद्मपुराण रामाश्वमेध-वृत्तान्त में हनुमान् अपने को आजीवन ब्रह्मचारी कहते हैं— “आत्मयोगबलेनैव ब्रह्मचर्यप्रभावतः । पालयामि तदा वीर ! शत्रुघ्नो जीवतु क्षणात् ॥ (स्कन्दपु० अव०ख० ८३।३३) यदि मैंने जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन किया है तो क्षणभर में ही शत्रुघ्न जीवित हो जायें । पुराण परम प्रमाण हैं । लाङ्गूलोपनिद् ( अड्यारसंस्करण, पृ० २१३ ) तथा आनन्दरामायण ( मनोहरकाण्ड सर्ग १३ ) में हनुमान् को कुमारब्रह्मचारी कहा गया है। हनुमत्सहस्रनामस्तोत्र में ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय आदि नाम आये हैं। तुलसीदास ने हनुमान् को मन्मथमथन तथा ऊर्ध्वरेता कहा है । इस सम्बन्ध में उनके प्राकृतिक कौपीन का उल्लेख मिलता है। उड़िया महाभारत वनपर्व के अनुसार हनुमान् ने माता से कहा, जब तक मुझे वज्रकौपीन न मिले मैं जन्म नहीं लूँगा । पवन ने यह समाचार शिव को सुनाया । शिव ने अञ्जना को खिलाने के लिए कपड़े दिये । उसके फलस्वरूप हनुमान् ने कौपीन पहने हुए ही जन्म लिया । अर्जुनदासकृत रामविभा में भी ऐसी ही कथा है । भावार्थरामायण के अनुसार कौपीनयुक्त ही हनुमान् का जन्म हुआ ( ७।३५ ) । पद्मपुराण (पातालखण्ड ११२,१३५ में) हनुमान् को सुदृढ़बद्धमोञ्जीकौपीन और श्रीमन्मारुतिस्तव- राज में कौपीनधारी कहा गया है ।

६३२ रामायणमीमांसा एकोनविंश कहा जाता है कि हनुमान् ने किसी ऋषि के पास कौपीनमात्र छोड़कर उसका सर्वस्व लूट लिया था । ऋषि ने शाप दिया कि तुम्हारे पास भी कौपीन के अतिरिक्त कुछ न रहेगा । पुराणादि शास्त्रों के अनुसार हनुमान् का अखण्ड ब्रह्मचर्य प्रमाणित है । स्कन्द, हनुमान्, भीष्म आदि शास्त्रों में मुख्य ब्रह्मचारी गिने गये हैं । इसके विरुद्ध पउमचरियं तथा रामकियेन आदि में वर्णित हनुमान् का अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध विकृति ही समझना चाहिये । वाल्मीकिरामायण (६।१२५।४४) के अनुसार विजयी राम के प्रत्यागमन का समाचार सुनकर भरत ने दस हजार गायों, सैकड़ों ग्रामों के अतिरिक्त दिव्यरूप भूषणसम्पन्ना १६ कन्याएँ भी पत्नीरूप में हनुमान् को प्रदान की थीं । “सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्यास्तु षोडश ।” परन्तु हर्षाद्रेक में भरत ने हनुमान् के लिए उक्त वस्तुएँ प्रदान कीं । इससे यह नहीं सिद्ध होता कि हनुमान् ने उन वस्तुओं को रख लिया । भागवत आदि ग्रन्थों के अनुसार राम आदि ने यज्ञ में ब्राह्मणों को समस्त भूमण्डल का दान दिया था । परन्तु ब्राह्मणों ने उसे स्वीकार नहीं किया । अतः हनुमान् के निमित्त उक्त वस्तुएँ प्रदान की गयीं । हनुमान् ने उन्हें अन्य अधिकारियों को प्रदान कर दिया होगा । पूर्वोक्त वचनों के साथ समन्वय करने से यही अर्थ निश्चित होता है । जैसे आज भी देवता तृप्त्यर्थ ब्राह्मणभोजन कराया जाता है । देवता को ग्रामादि समर्पण किये जाते हैं । उसी तरह भरत ने हनुमान् के निमित्त ग्राम आदि प्रदान किये थे । ७०० वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “हनुमान् की अन्य विशेताओं की भाँति ब्रह्मचर्य का मूल स्रोत वाल्मीकिरामायण को माना जा सकता है । रावण के अन्तःपुर में प्रविष्ट होकर वहाँ सुप्त अर्धनग्न स्त्रियों को निहार कर उनके सुव्यवस्थित मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ— “कामं दृष्टा या सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रियः । न तु मे मनसः किञ्चिद्वैकृत्यमुपपद्यते ॥ मनो हि.........................मे सुव्यवस्थितम् ।” ( वा० रा० ५।४१, ४२ ) हनुमान् के संयम तथा धार्मिकता की दृष्टि से वाल्मीकिरामायण में उनके लिए महात्मा, महामनाः, संस्कारसम्पन्नः, कृतात्मा आदि विशेषण मिलते हैं । रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करने पर उनको पाप की शङ्का होती है : “जगाम महतीं शङ्कां धर्मसाध्वसशङ्कितः ।” धर्मलोप निमित्त भय से शङ्कित हो वे महती शङ्का को प्राप्त हुए । ये सब बातें धार्मिक ब्रह्मचारी के ही मन में आ सकती हैं । आगे फिर बुल्के कहते हैं— “एष दोषो महान् हि स्यान्मम सीताभिभाषणे ।” ( वा० रा० ५।३०।३८ ) सीता के साथ बातचीत करने के कारण अपने को दोषी मानते हैं । अतः बहुत संभव है कि वाल्मीकि- रामायण में जो पापशङ्कालु तथा संयमी हनुमान् का चित्र प्रस्तुत किया गया है उसी के आधार पर उनके ब्रह्मचर्य की कल्पना की गयी है ।” बुल्के की पहले की बातें तो कुछ संगत सी थीं, परन्तु उनका निष्कर्ष उन्होंने गलत निकाला है । वस्तुतः उससे तो यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि उक्त वचन उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने में प्रमाण हैं, क्योंकि धार्मिक ब्रह्मचारी पापभीरु के मन में ही इस प्रकार की बातें उठ सकती हैं । परन्तु यह नहीं कि उक्त पापशङ्कालु आदि होने के कारण पीछे से उनके अखण्ड ब्रह्मचारी होने की कल्पना कर ली गयी है ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३३ अर्थापत्ति प्रमाण द्वारा निश्चित अर्थ कल्पनामात्र नहीं होता । जैसे 'दिवा अभुञ्जान' होकर पीन होने से रात्रिभोजन का निश्चय प्रमा है कल्पनामात्र नहीं है। उसी तरह रावण की अर्धनग्न स्त्रियों के दर्शन से भी निर्विकार रहना और परस्त्रीदर्शन से पाप की शङ्का करना उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य की कल्पना भी प्रमाण ही है। किन्तु सीता के साथ अभिभाषण से धर्म-लोप के भय की शङ्का का कोई प्रश्न ही नहीं है। वहाँ मूल में ही अन्य प्रकार के दोष का स्पष्ट ही वर्णन है। क्योंकि हनुमान् सोचते हैं कि यदि मैं आज ही रात्रि-शेष में सीता को आश्वासन नहीं देता हूँ तो वह निश्चित देह त्याग देंगी। फिर वहाँ राम पूछेंगे कि सीता ने क्या कहा तो मैं उनसे क्या कहूँगा। यदि सेनासहित राम को लङ्का पर चढ़ाई के लिए लाऊँ भी तो सीता के देह त्यागने से वह व्यर्थ ही होगा। मैं सूक्ष्मरूप से वानररूप में मानुषी (नागरिकभाषा) में बोलूँगा। यदि द्विजाति के तुल्य संस्कृत (देवभाषा) में बोलूंगा तो मुझे रावण समझकर सीता शङ्कित होंगी एवं मेरे रूप और भाषण को सुनकर राक्षसों से त्रस्त सीता पुनः त्रास को प्राप्त होंगी। यदि त्रासवशात् मुझे रावण समझकर कुछ शब्द किया तो यमतुल्य शस्त्रास्त्रधारी राक्षस आयेंगे और मेरे वध या ग्रहण का प्रयत्न करेंगे। मेरे विशाल रूप को देखकर शङ्कित होंगे, राक्षसियाँ डरेंगी एवं राक्षसों को बुलायेंगी। मैं राक्षस- बल का निग्रह कर सकता हूँ। परन्तु तत्काल समुद्र पार करने में कठिनाई हो सकती है। मैं निगृहीत हुआ तो सीता का भी कोई लाभ न होगा। हो सकता है हिंसारुचि राक्षस सीता का वध ही कर डालें। युद्ध में मेरे मारे जाने या निगृहीत होने पर दूसरा कोई दिखायी नहीं देता है जो सागर से परिक्षिप्त राक्षसों से परिवारित इस गुप्त लङ्का में स्थित सीता का पता लगा सके। युद्धों में जीत निश्चित नहीं रहती। संशयित पक्ष मुझे नहीं रुचता। निश्चितफलवाले कार्य को कौन विद्वान् संशयित बनाना चाहेगा। सीता से मेरे भाषण से ये पूर्वोक्त दोष हो सकते हैं। परन्तु भाषण करके आश्वासन न देने पर वैदेही का प्राणत्याग संभव है। अयुक्त दूत के कारण सिद्धप्राय कार्य भी देशकालविरुद्ध होने से वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होने पर तम नष्ट हो जाता है। इस प्रसंग में ब्रह्मचर्य-नाश या धर्म-लोप आदि दोष की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अतः बुल्के द्वारा उक्त प्रसंग का प्रकृत में उद्धरण सर्वथा ही असंगत है। अनु० ७०१ में पुनः बुल्के अपनी दुष्कल्पनाओं को प्रमाणित करना चाहते हैं। वे कहते हैं, "रामभक्ति का भाव मध्यकालीन रामसाहित्य में व्याप्त है। अतः यह स्वाभाविक ही था कि आदिरामायण के उत्साही एवं विश्वस्त रामसेवक हनुमान् को उस साहित्य में आदर्श रामभक्त के रूप में प्रस्तुत किया जाय ।" अर्थात् बुल्के की दृष्टि में वस्तुतः हनुमान् रामभक्त नहीं थे। साहित्यिकों ने उन्हें आदर्श रामभक्त के रूप में कल्पित किया है। यह कहा जा चुका है कि आदिरामायण नाम का कोई ग्रन्थ नहीं है। प्रचलित रामायण ही मुख्य रामायण है। उसमें हनुमान् आदर्श भक्तरूप में वर्णित ही हैं और वह वस्तुस्थिति का चित्रण है, मिथ्या कल्पना नहीं है। अतएव शिवपुराण (शतरुद्र- संहिता अ० २०) में हनुमान् को भक्तप्रवर के अतिरिक्त रामभक्ति का प्रवर्तक होने का भी श्रेय दिया गया है। बुल्के का प्रत्येक शब्द आपत्तिजनक है, क्योंकि प्रमाणभूत शिवपुराण आदि के अनुसार हनुमान् श्रेष्ठ रामभक्त हैं और रामभक्ति के प्रचारक भी हैं ही। उन्हें श्रेय कौन दे सकता है— "स्थापयामास भूलोके रामभक्तिं कपीश्वरः । स्वयं भक्तवरो भूत्वा सीतारामसुखप्रदः ॥” स्वयं सीतारामसुखप्रद भक्तवर हनुमान् ने भूलोक में रामभक्ति की स्थापना की। फिर भी रामभक्ति पहले नहीं थी, यह नहीं कहा जा सकता। जैसे व्यास, वसिष्ठ आदि को अनादिसिद्ध वैदिक धर्म का प्रतिष्ठापक माना जाता है वैसे ही हनुमान् भी अनादिसिद्ध रामभक्ति के प्रतिष्ठापक हैं। अतएव बुल्के का यह कहना भी असंगत है कि "हनुमान् की रामभक्ति का प्राचीनतम उल्लेख रामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग ४० में मिलता है," क्योंकि उनकी दृष्टि में ८०

६३४ रामायणमीमांसा एकोनविंश

उत्तरकाण्ड सम्पूर्ण प्रक्षेप ही है। उनकी तथाकथित आदिरामायण भी ई० पू० २०० की है। परन्तु रामभक्ति तो व्यास, वसिष्ठ, वाल्मीकि आदि के समय से ही प्रचलित है। तभी तो व्यास के महाभारत तथा पुराणों एवं रामसम- कालीन वाल्मीकिरामायण में रामभक्ति का उल्लेख है ही। वरप्राप्ति का प्राचीनतम वृत्तान्त रामभक्ति के विषय में मौन है, यह कहना भी निराधार ही है, कारण वाल्मीकिरामायण का वर्तमान रूप ही प्राचीनतम रूप है। उसमें रामभक्ति वरप्राप्ति का उल्लेख है ही। श्रीभागवत, पाञ्चरात्र आदि में भी हनुमान् की रामभक्ति का सर्वाधिक महत्त्व वर्णित है। उनके चिरजी- वित्त्व का उद्देश्य भी भक्ति ही है। अतएव अध्यात्मरामायण उत्तरकाण्ड में रामाभिषेक के अनन्तर हनुमान् यही वरदान मांगते हैं कि मैं निरन्तर रामनाम का स्मरण करते हुए सशरीर जीवित रहूँ— “त्वन्नाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम। अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन् स्थास्यामि भूतले॥ यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम्। मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्क्षितः॥” (अ० रा० ७।१६।१२,१३) हे राम ! आपका नाम स्मरण करते हुए मेरा मन तृप्त नहीं होता। अतः मैं सतत आपका नाम स्मरण करता हुआ भूतल में रहूँगा। राम ! जब तक भूतल में आपका नाम रहेगा तब तक मेरा शरीर बना रहे। यही मुझे वरदान अभीष्ट है। आनन्दरामायण (सारकाण्ड) में कहा गया है— “यत्र तत्र कथा लोके प्रचरिष्यति ते शुभा। तत्र तत्र गतिर्मेऽस्तु श्रवणार्थं सदैव हि॥” (आ० रा० १।१२।१४३) जहाँ-जहाँ संसार में आपकी कथा प्रचारित हो वहाँ-वहाँ कथा-श्रवणार्थ मेरी गति हो। तत्त्वसंग्रहरामायण (५।११) में कहा गया है, जब हनुमान् सीता का पता लगाकर राम के पास पहुँचे तब राम ने उनको हृदय से लगाकर यह आशीर्वाद दिया कि जहाँ कहीं भी मेरे नाम का उच्चारण होगा वहाँ तुम भी उपस्थित रहोगे। अन्त में तुम चतुरानन ब्रह्मा बनकर संसार की सृष्टि करोगे। पश्चात् मुझमें मिल जाओगे। आनन्दरामायण (१।१३।१७६,१७७) के अनुसार ब्रह्मा ने हनुमान् को वरदान दिया कि तुम अमर और अबाधगति होओगे एवं हरिभक्त बनकर विष्णु की सहायता करोगे। भविष्यपुराण में भी इसका उल्लेख है। भविष्यपु० (प्रतिसर्गपर्वखण्ड ४।१३।४६,४७) के अनुसार तपस्या करके हनुमान् ने ब्रह्मा से यह वरदान पाया था कि त्रेतायुग में राम प्रकट होंगे। तुम उनकी भक्ति कर पूर्णकाम हो जाओगे— “तस्य भक्तिञ्च सम्प्राप्य पूर्णकामो भविष्यसि।” श्रीभागवत (५।१९।१-५) के अनुसार हनुमान् हिमालय के किंपुरुषवर्ष में किन्नरों के साथ अविचल भक्तिभाव से राम की उपासना करते रहते हैं। बङ्गाल की राम-कथाओं के अनुसार लक्ष्मण शिव की वाटिका में फल तोड़ने गये थे। वहाँ हनुमान् द्वारपाल थे। उनसे लक्ष्मण का युद्ध हुआ। अन्त में शिव और राम भी आ पहुँचे। उनका भी युद्ध हुआ। शिव ने हनुमान् को राम की सेवा के लिए प्रदान किया। स्कन्दपुराण के अनुसार हनुमान् ने कई स्थलों पर शिवलिङ्गों की स्थापना की थी। पद्मपुराण (पाताल- खण्ड ११०।१७०-१८१) के अनुसार हनुमान् शिव की भक्ति करते हैं। वहाँ राम और शिव की एकता का वर्णन है। शिव और विष्णु की अभिन्नता तथा हनुमान् द्वारा दोनों की उपासना भी पुराणों में वर्णित है।

बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ६।१२८।७८, ७९ ) के अनुसार रामाभिषेक के बाद राम से मिली हुई माला सीता ने हनुमान् को प्रदान की। हनुमान् की रामभक्ति सिद्ध करने के लिए अर्वाचीन साहित्य में इस घटना को एक नवीन रूप दिया गया है। कृत्तिवासरामायण ( ६।१२८ ) के अनुसार हनुमान् ने माला हाथ में लेकर उसे ध्यान से देखा और उसकी बहुमूल्य मणियाँ तोड़कर वे खाने लगे। पूछने पर इस व्यवहार का कारण यह बताया कि इसमें रामनाम अङ्कित नहीं है। अतः मेरी दृष्टि में इसका कोई मूल्य नहीं है। इसपर किसी ने पूछा क्या तुम्हारे शरीर में राम-नाम अङ्कित है। यह सुनकर हनुमान् ने नखों से छाती फाड़कर दिखलाया। उनके शरीर में सर्वत्र रामनाम का उल्लेख था। भावार्थरामायण ( ६।८७ ) के अनुसार माला ग्रहण कर हनुमान् ने विचार किया। इस माला के कारण मेरे हृदय में अहङ्कार उत्पन्न हो सकता है, अतः उन्होंने दांतों से मणियों को फोड़ा और कहा हम वानरों को भोजन से अतिरिक्त क्या चाहिये।" परन्तु मिथ्या भाषण से बचनेवाले भक्त निरर्थक मिथ्या कल्पना से सदा परहेज ही करते हैं। अतः 'नह्यमूलं प्ररोहति' के आधार पर वह कल्पना निर्मूल नहीं है। वाल्मीकिरामायण में इसका विरोध भी नहीं है। बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ७।३९।२६, २७ ) में अयोध्या में वानर सैनिक मधु, मांसादि का सेवन करते हुए मास भर रहे। परन्तु भक्तिलीन होने के कारण उन्हें वह समय मुहूर्त्तमात्र ही प्रतीत हुआ ।” परन्तु वानरों को मांस खाने का संस्कार नहीं होता है। अतः मधु का अर्थ शहद और मांस का अर्थ फलों का भीतर का गूदा ही समझना चाहिये। क्योंकि मद्य में दुर्गन्धि ही होती है सुगन्धि नहीं। किन्तु प्रकृत में सुगन्धिमधुपान का वर्णन है— “ते पिबन्तः सुगन्धीनि मधूनि मधुपिङ्गलाः । मांसानि च सुसृष्टानि मूलानि च फलानि च ॥ एवं तेषां निवस्तां मासः साग्रो ययौ तदा। मुहूर्त्तमिव ते सर्वे रामभक्त्या च मेनिरे ॥” बुल्के कई स्थानों के अनुसार हनुमान् द्वारा राम के उच्छिष्ट खाने और राम के साथ भोजन करने की चर्चा करते हैं। परन्तु यह सब मर्यादापुरुषोत्तम वैदिक वर्णाश्रमी राम की मर्यादा के विरुद्ध होने से कल्पनामात्र ही समझना चाहिये । स्कन्दपुराण ( अवन्तीखण्ड, रेवाखण्ड ८३।२९ ) में शिव ने हनुमान् के नामों को लोकों के कल्याणकारी कहा है— “उपकाराय लोकानां नामानि तव मारुते ।” परन्तु बुल्के हनुमान् के देवत्व को आठवीं ईसवी शती की कल्पना मानते हैं, जो उनका भ्रम ही है। पुराणों का प्रामाण्य और प्राचीनता अच्छी तरह सिद्ध कर दी गयी है। व्यास भगवान् के समय से पूर्व ही हनुमान् के मन्त्र, नाम आदि का जप होता था । अतएव १० वीं तथा १५ वीं शती में हनुमद्भक्ति का पूर्ण विकास हुआ एवं १५ वीं शती में उनकी मूर्ति की पूजा प्रचलित हुई, बुल्के का यह कथन भी अत्यन्त भ्रमपूर्ण ही है; क्योंकि उनका उक्त कथन पुराणों की अर्वाचीनता मानने से ही सङ्गत हो सकता है। पर वह स्वयं ही निर्मूल है। पुराण अनादि हैं, द्वापर के अन्त में व्यास द्वारा उनका आविर्भाव हुआ है। राम का आविर्भाव भी गत त्रेता में न होकर २४ वें त्रेता में हुआ था जो करोड़ों वर्ष पूर्व का काल है। सुतरां हनुमान् की आराधना भी करोड़ों वर्षों से चली आ रही है।

आनन्दरामायण (१।१२) के अनुसार सीता ने हनुमान् को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि विश्वशान्ति के उद्देश्य से गाँव-गाँव में तुम्हारी मूत्ति की पूजा की जायगी— "ग्रामारामपत्तनेषु व्रजखेटकसद्मसु । वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च ॥ वाटिकोपवनाश्वत्थवटवृन्दावनादिषु । नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयेपुरेषु च ॥ त्वन्मूत्ति पूजयिष्यन्ति मानवा विघ्नशान्तये । भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यन्ति स्मरणात्तव ।।" (आ० रा० १।१२।१४७-१४९) ग्रामों, उद्यानों, नगरों, गोशालाओं, कसबों, घरों में, वनों, पर्वतों, दुर्गों तथा सभी देवालयों में, नदियों में; क्षेत्रों, तीर्थों, जलाशयों में, पुरों में, वाटिकाओं, उपवनों, अश्वत्थों, वटों तथा वन्दावनादि में विघ्ननिवृत्ति के लिए मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे । तुम्हारे स्मरणमात्र से भूत, प्रेत, पिशाच आदि नष्ट हो जायेंगे । आज सीताजी का यह वरदान प्रत्यक्ष सिद्ध हो रहा है । सर्वत्र हनुमान् की मूर्ति की पूजा चल रही है। भूत, प्रेतों तथा विघ्नों के निवारणार्थ हनुमान् का स्मरण कारगर सिद्ध हो रहा है। कई स्थानों में बड़े बड़े प्रेतराज हनुमान् के सेवक बनकर दुखियों का दुःख दूर कर रहे हैं । इस तरह हनुमान् का देवत्व जाज्वल्यमान है । हनुमान् का संकटमोचन नाम भी प्रसिद्ध है । बुल्के कहते हैं कि प्रायः भूतों और प्रेतों की निवृत्ति के उद्देश्य से ही हनुमत्पूजा होती है। परन्तु यह भी ठीक नहीं है । मुख्य रूप से राम-प्राप्ति के हेतु ही हनुमान् की पूजा की जातो है— "तुम्हरे भजन राम कहँ भावै । जन्म जन्म कर दुख बिसरावै ॥" (हनु० चा०) हनुमान् के ध्यान से राम का ध्यान होता है— "बन्दहुँ पवनकुमार खलबन पावक ज्ञानघन । जासु हृदय आगार वसहिं राम शर चाप धर ॥" (रा० मा० १।१७) "पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित बसहु सदा सुरभूप ॥" (हनु० चा०) आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३) के अनुसार राम ने विभीषण को हनुमत्कवच प्रदान किया है। उसमें भूतों एवं ज्वरों से छुटकारा मिलने की चर्चा है । वहीं गरुड़जी राम को कपि (हनुमान्) पूजन का विधान बताते हैं । महामारीनिवृत्त्यर्थ उसका विधान बताते हैं । आनन्दरामायण (राज्यकाण्ड) में सीता ने भी हनुमान् की पूजा की थी— "गोमयेनाञ्जनेयं सा कुड्ये कृत्वाच्यं जानकी । अकरोत् प्रत्यहं पुच्छवृद्धि स्वाङ्गुलिमात्रातः ॥'' क्या राम ने या जानकी ने हनुमान् की पूजा १५ वीं ईसवी में सीखी है। बुल्के स्वयं ही सोचें । पर वे तो इसे कल्पनामात्र कहेंगे, यही दुःसाहस है । लाङ्गलोपनिषद् के अनुसार हनुमान् एकादशरुद्रावतार, श्रीरामसेवक, कुमारब्रह्मचारी एवं सब रोगों और शूलों के निवारक हैं । उन्हें गर्भदोषघ्न, पुत्रपौत्रद भी कहा गया है, यह ठीक ही है । मारुतिस्तव में तो हनुमान् को पापतापसुसमापनतत्पर कहा है, वह भी ठीक ही है । हनुमत्सहस्रनामस्तोत्र में उनको महावीर, सर्वविद्याविशारद, वेद-वेदान्तपारग, रामभक्तिविधायक, पिशाचग्रहघातक, अपस्मारहर आदि के साथ ही साथ संसारभयनाशक, शरणागत-

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३७ वत्सल, भगवान् जगन्नाथ, जगदीश, अनादि, परब्रह्म भी कहा गया हैं और रुद्रावतार होने से उनके वे सब नाम सङ्गत हैं—"एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे" के अनुसार वे ब्रह्मरूप ही हैं। अतएव बुल्के का यह कहना गलत है कि "इन शब्दावलियों को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिये। पूजा की दृष्टि से संकटमोचनरूप ही प्रधान है। भूतों, बीमारियों तथा बाँझपन से छुटकारा पाने के लिए उनकी अधिकतर शरण ली जाती है।" बुल्के की दृष्टि में तो यह भी कल्पना या विश्वासमात्र ही है। पर उनका यह कहना निरर्थक ही है। ७१० वें अनु० में बुल्के अपने मन की दुर्भावनाओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं। "हनूमत्पूजा के कारणों पर विचार करने से विदित होता है कि रुद्रावतार माने जाने के कारण उनके प्रति श्रद्धा जाग्रत् होना स्वाभाविक ही था। किन्तु १० वीं, १५ वीं ईसवी में हनूमद्भक्ति का पूर्ण विकास आश्चर्यजनक ही है। उनकी संकटमोचनरूप में उपासना जो आजकल व्यापक रूप से प्रचलित है, उसका मुख्य आधार रामायण में चित्रित राक्षसों का वध, ओषधिपर्वत का आनयन नहीं, किन्तु उसका मुख्य कारण यह है कि हनुमान् का सम्बन्ध यक्ष-पूजा से स्थापित किया गया था। अत्यन्त प्राचीन काल से गाँव गाँव में यक्षों की पूजा होती थी। वे रक्षक देवता (जातक ५४५), द्वारपाल, सन्तान देनेवाले तथा वृक्षों में निवास करनेवाले (जातक ३०७ और ५०९) माने जाते थे। यक्ष तथा वीर शब्द पर्यायवाची ही हैं। उधर महावीर हनुमान् की ख्याति रामायण की लोकप्रियता द्वारा शताब्दियों से चली आ रही थी। अतः अन्य यक्षों अर्थात् वीरों के साथ हनुमान् की भी पूजा होने लगी। इस अत्यन्त प्राचीन पूजा से सम्बन्ध हो जाने पर हनुमान् की लोकप्रियता बहुत ही बढ़ गयी। उस समय तक जिस उद्देश्य से और जिस रूप में यक्षों की पूजा होती रही अब उसी उद्देश्य और उसी रूप में महावीर हनुमान् की पूजा होने लगी। हनुमान् के संकटमोचन रूप तथा द्वारपालवाला रूप वीरपूजा से सम्बन्ध रखते हैं। प्राचीन वीरपूजा तथा हनूमत्पूजा के उद्देश्यों में जो सादृश्य है वह उपर्युक्त विकास की वास्तविकता सिद्ध करता है। परन्तु डा० वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार आजकल तक हनुमान् की पूजा के दो रूप प्रचलित हैं—एक वीरपूजा या यक्षपूजा जिसमें मूत्ति से सम्बन्ध नहीं होता तथा एक दूसरा रूप जिसमें वानर की मूर्ति है और जो रामकथा पर निर्भर है।" वस्तुतः यह सब बुल्के की अनर्गल अटकल है। उपस्थित प्रत्यक्ष हेतुओं को छोड़कर अनुपस्थित हेतु ढूँढ़ने का कार्य "अव्यापारेषु" व्यापारमात्र है। यदि वीर-पूजा अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी तब तो हनूमत्पूजा भी अत्यन्त प्राचीन काल से ही माननी चाहिये, फिर १० वीं १५ वीं ई० में ही आश्चर्यजनक हनूमत्पूजा का पूर्ण विकास हुआ यह क्यों ? यदि यह रामायण का प्रभाव है तो हनुमान् की पूजा में उससे अन्य प्रभाव ढूँढ़ने की क्या आवश्यकता है ? फिर स्कन्दपुराण के १२ नामों की सूची का एक नाम भी यक्षपूजा से सम्बन्ध नहीं रखता। द्वादश नाम निम्नोक्त हैं—हनुमान्, अञ्जनीसुत, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ट, फाल्गुनगोत्र, पिङ्गाक्ष, अमितविक्रम, उदधिक्रमणश्रेष्ठ, दशग्रीवदर्पहा, लक्ष्मणप्राणदाता तथा सीताशोकनिवर्तन (स्कन्दपु० अवन्तीखण्ड अ० ८३) । आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड १३।८, ९) में भी ये नाम हैं। स्कन्दपुराण के एक अन्य स्थल (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यमा० अ० ३७) में हनुमान् की स्तुति में १९ विशेषण मिलते हैं। उनमें से एक ही सर्वव्याधिहर संकटमोचन रूप से सम्बन्ध रखता है। परन्तु संकटमोचन रूप भी यक्षरूपनिरपेक्ष हनुमान् का ही है। शक्तिघात के समय लक्ष्मण का, अहिरावण की माया के समय राम-लक्ष्मण दोनों का, रावण के आतङ्क से सीता का तथा इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र- प्रयोग के समय राम, लक्ष्मण तथा सभी वानर भालू वीरों का संकट काटने के कारण हनुमान् ही वस्तुतः संकटमोचन- पदवाच्य हैं, न कि बुल्केकल्पित यक्ष । भारतीय वाङ्मय की दृष्टि से वेद अनादि हैं। उन्हीं पर वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायण, पुराण आदि आधारित हैं। इन सद्ग्रन्थों के आधार पर हनुमान् की पूजा अति-प्राचीनकाल से प्रचलित है। यक्षपूजा आदि

६३८ रामायणमीमांसा एकोनविंश उसकी अपेक्षा अर्वाचीन ही है । गीता आदि की दृष्टि से ईश्वरपूजा, देवपूजा आदि ही सात्त्विकी पूजा है। यक्ष, राक्षस आदि की पूजा राजसी पूजा है । अनादि सिद्ध वैदिक धर्म के पूर्ण प्रचार के समय से ही ब्रह्म, परमात्मा, रुद्र, विष्णु, राम, हनुमान् आदि की पूजा प्रचलित है। वैदिक धर्म के प्रचार की मन्दता में ही यक्ष, राक्षस आदि की पूजा प्रचलित होती है। इस तरह वेदों, उपनिषदों, रामायण आदि के अनुसार ही हनुमान् की पूजा चिरकाल से ही प्रचलित है । अतः १० वी १५ वीं शती में हनुमत्पूजा का विकास मानना सर्वथा असङ्गत ही है । उसपर यक्षपूजा का प्रभाव मानना और भी असङ्गत है । प्रचलित हनुमत्पूजकों में सभी को रामायण एवं रामभक्ति के कारण तथा रुद्ररूप से ही हनुमान् का महत्त्व विदित है । सिवा उच्छृङ्खल विचारवालों के और कोई यक्षपूजा एवं हनुमत्पूजा का सम्बन्ध नहीं मानता है । अतएव हनुमान् के चरित्रचित्रण में अतिशयोक्ति और कोई अलौकिकता की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रही है, यह कथन वस्तुस्थिति से सर्वथा अस्पृष्ट ही नहीं अपितु विरुद्ध भी है । हनुमान् वानरगोत्रीय 'आदिवासी थे, यह कल्पना भी रामायण के विरुद्ध ही है । हनुमान् ने स्वयं ही अपने को वानर कहा है— “जातिरेव मम त्वेषा ।” यह दिखाया जा चुका है। इसी तरह हनुमान् की वायुपुत्र उपाधि नहीं, किन्तु वाल्मीकिरामायण तथा अन्य प्रामाणिक कथाओं के अनुसार हनुमान् वास्तव में वायु के पुत्र थे । आश्चर्य तो यही है कि पाश्चात्य एवं उनके अनुयायी सड़े से सड़े जातक को प्रमाण मान लेते हैं। परन्तु यहाँ के परम प्रमाण वेद, उपनिषद्, आर्ष इतिहास रामायण तथा महाभारत की बातों को जातकों के दृष्टिकोण से लगाने का प्रयास करते हैं । यह स्पष्ट ही बौद्धपक्षपात एवं वैदिकधर्मद्वेष है । इसी कारण वे वायुपुत्र एवं वीरपूजा या यक्षपूजा का हनुमत्पूजा पर प्रभाव भी जातकों पर ही अवलम्बित है, ऐसा अनर्गल प्रलाप करते हैं । वस्तुस्थिति तो यह है कि वैदिकधर्मद्वेषी बौद्धों तथा जैनों ने बहुतसी मनगढ़न्त वैदिकधर्म-विरुद्ध कल्पनाएँ कर रखी हैं। पाश्चात्यों की कूटनीति के शिकार बनकर अनेक उनके अनुयायी भारतीयों ने भी उन्हीं का अन्धानुकरण कर वैदिकधर्मविरुद्ध अनेक कल्पनाओं को प्रश्रय दिया है। याकोबी का यह कथन भी सारशून्य है कि हनुमान् की असाधारण लोकप्रियता का आधार रामायण में अङ्कित उनका चरित्रचित्रणमात्र नहीं हो सकता । वास्तव में उनकी यह आश्चर्यजनक लोकप्रियता शताब्दियों तक बढ़ते हुए विकास का परिणाम है। इसीलिए बुल्के को भी लाचार होकर यह मानना पड़ता है कि “रामसाहित्य का अनुशीलन करने पर डा० याकोबी के मत के विपरीत मन में यह विचार अनायास उत्पन्न होता है कि राम-कथा ने ही हनुमान् को अमरत्व के शिखर पर पहुँचा दिया है और आजकल राम की अपेक्षा रामसेवक हनुमान् की पूजा कहीं अधिक व्यापक रूप से हो रही है”, परन्तु बुल्के का यह मत भी शुद्ध नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार रामकथा का विकास हुआ । वे यह तथ्य भी कहाँ मानते हैं कि वस्तुभूत रामचरित्र ही रामायणों द्वारा वर्णित हुआ है । अनु० ७१२ में बुल्के पुनः कहते हैं कि “हनुमच्चरित विकास के अध्ययन से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं । प्रथम हनुमान् के विषय में जो विस्तृत सामग्री परवर्ती कथाओं में मिलती है वह वाल्मीकिरामायण में निहित तत्त्वों का स्वाभाविक विकास प्रतीत होती है । अतः वाल्मीकि के पूर्व राम-कथा से स्वतन्त्र हनुमद्विषय गाथाओं की कल्पना निराधार ही नहीं अनावश्यक भी हैं । दूसरे, उस सामग्री के विश्लेषण से स्पष्ट हैं कि हनुमान् का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था, अतः हनुमान् वास्तव में किसी प्राचीन देवता से अभिन्न हैं, यह कल्पना उपलब्ध सामग्री के प्रतिकूल ही है । हनुमान् के चरित्र-चित्रण में शताब्दियों तक अतिशयोक्ति का प्रयोग होता रहा है । किन्तु आठवीं शती में उनको पहले पहल देवत्व की उपाधि से विभूषित किया गया ।” परन्तु बुल्के की ये दोनों कल्पनाएँ प्रमाणशून्य हैं ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६३९ आधुनिक दृष्टि से यद्यपि यह ठीक हो सकता है कि राम-साहित्य से पृथक् हनमत्पूजा के विकास का कारण ढूंढ़ना व्यर्थ है । हनमत्पूजा में यक्षपूजा या वीरपूजा का प्रभाव मानना उपलब्ध सामग्री के प्रतिकूल ही है। पर साथ ही हनुमान् के चरित्रचित्रण में अतिशयोक्तियों का शताब्दियों तक प्रयोग होता रहा है, यह कथन प्रमाणहीन है । वास्तव में राम परब्रह्म हैं तथा हनुमान् रुद्र हैं । उनके सम्बन्ध में पूरी-पूरी वस्तुस्थिति का भी आज तक वर्णन नही हो सका है । देवदेव में देवत्व की कल्पना दूषण ही है भूषण नहीं । “महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः । अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ ( महिम्नस्तोत्र १ ) भगवान् की अनन्त महिमा का पर पार न जाननेवाले ब्रह्मादि के लिए भी भगवान् की स्तुति भगवान् की महिमा के अननुरूप ही है । निर्गुणरूप में सब के मन और वाणी पङ्गु होते हैं । अनन्त गुणगणों की दृष्टि से भी सब के मन और वाणी पार पाने में असमर्थ ही हैं । आकाश का अन्त कोई भी नहीं पा सकता है, परन्तु अपनी शक्तिभर मच्छर और गरुड़ सभी आकाश में उड़ते हैं— “नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः ।” “निजनिज मति मुनि हरिगुन गावहिं । निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥ तुमहि आदि खग मसक प्रजंता । नभ उड़ाहिं नहि पावहिं अंता ॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा ॥” ( रा० मा० ७।९०।२, ३ ) ब्रह्मादि अपनी बुद्धि के अनुसार भगवद्गुणगान कर सकते हैं तब तो अस्मदादि भी अपनी बुद्धि के अनुसार भगवद्गुणगान कर ही सकते हैं । यदि किसी वीर या यक्ष की अभिन्नता के कारण हनुमान् का यह महत्त्व बढ़ा होता तो किसी यक्ष की महिमा तथा पूजा भी प्रख्यात होनी चाहिये थी । परन्तु उसका नितान्त अभाव है । अतः रामायण एवं राम और सीता की भक्ति एवं उनके वरप्रभाव से ही हनुमान् का महत्त्व युक्त है । इस तरह विकास या परिवर्धन नहीं हुआ । अपितु भगवान् एवं उनके भक्त रुद्रस्वरूप हनुमान् की महिमा वस्तुतः अपार है । उनके सभी विद्यमान गुणों का भी वर्णन असंभव है, फिर अविद्यमान गुणों के आरोप, विकास या परिवर्धन की कल्पना ही कैसे हो सकती है ? हनुमच्चरितवर्णन करनेवाले पुराणों या रामायणांशों की अर्वाचीनता की कल्पना के आधार पर ही यह कहा जाता है कि ८वीं, १०वीं या १५वीं शती में हनुमान् की पूजा या माहात्म्य का पूर्ण विकास हुआ । परन्तु जब उक्त आधारभित्ति ही गलत है तब उस आधार पर आधारित सभी कल्पनाओं के महल सुतरां गलत एवं असङ्गत ठहरते हैं । पाश्चात्यों की काल-कल्पना सर्वथा भारतीय दृष्टिकोण से गलत है । वर्तमान रामायण शुद्ध रामायण है । उसका निर्माणकाल राम का राज्यारोहणकाल ही है । पुराण व्यासकालीन ही हैं । अतः इसके विपरीत सब कल्पनाएँ पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिमूलक ही हैं । अर्जुन के गर्व-निवारण के प्रसङ्ग में कहा गया था कि हनुमान् उसकी ध्वजा पर विराजमान होंगे । बुल्के कहते हैं, “महाभारत से विदित होता है कि प्रायः सब योद्धाओं के झण्डे पर पशुओं के चित्र अङ्कित थे । उदाहरणार्थ दुर्योधन की ध्वजा पर नाग ( ६।१७।२५ ), भीम की ध्वजा पर केसरी ( ६।९१।७० ), घटोत्कच के ध्वज पर गृध्र

( ७।१५०।१५ ), वृषसेन के ध्वज पर मयूर ( ७।८०।१६ ), जयद्रथ के झण्डे पर वराह ( ७।१२१।११ ) एवं अश्वत्थामा के झण्डे पर सिंह ( ६।१७।२१ ) । इसी तरह अर्जुन को लाङ्गूलकेतन ( ६।१७।२१ ), कृष्ण को गरुड़- ध्वज ( ७।५७।२ ) तथा प्रद्युम्न को मकरध्वज ( ७।९६।२५) कहा गया है । डब्लू हॉप्किन्स के अनुसार इन चित्रों का प्रयोजन पूजा न होकर प्रोत्साहन तथा अलङ्करणमात्र ही था । महाभारत के प्रामाणिक संस्करणों से विदित होता है कि अर्जुन के ध्वज में अन्य पशु भी अङ्कित थे, परन्तु कपि ही उनमें प्रमुख था ( २।२२।२३ ) । अर्जुन को कपि- राजकेतन कहा गया है ( ६।५६।२६ ) । इसी प्रकार वानरध्वज ( ६।११२।१४), वानरप्रवरध्वज ( ७।१७।२१ ) तथा कपिप्रवरकेतन ( ७।१६।१५ ) भी कहा गया है ।" वस्तुतः यह भी गलत है, क्योंकि सामान्य ध्वजों में चित्रों का प्रोत्साहनमात्र प्रयोजन हो सकता था, किन्तु महाभारत के प्रमाणानुसार अर्जुन का जैसा विशिष्ट रथ था, वैसा ही उसका ध्वज भी विशिष्ट ही था । उसमें केवल हनुमान् का चित्र ही नहीं था, किन्तु स्वयं हनुमान् उसपर विराजते थे और प्रत्यक्ष गर्जन करके शत्रुओं को भयभीत भी करते थे; जैसा कि द्रोणपर्व ( अध्याय ६४ ) के अनुसार विदित होता है। जब अर्जुन ने रणभूमि में शङ्ख बजाया तब अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान भूतगणों के साथ हनुमान् ने मुंह बाकर शत्रुओं को भयभीत करते हुए बड़े जोर से गर्जन किया— “ततः कपिर्महानादं सह भूतैर्ध्वजालयैः । अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ॥” ( म० भा० ६।६४।२५ ) उद्योगपर्व (अध्याय ५५) में भी कहा गया है कि विश्वकर्मा, ब्रह्मा और इन्द्र ने मिलकर उसमें छोटी बड़ी अनेक प्रकार की बहुमूल्य दिव्य मूर्तियों का निर्माण कर रखा था— “ध्वजे हि तस्मिन् रूपाणि चक्रुस्ते देवमायया । महाधनानि चित्राणि महान्ति च लघूनि च ॥” ( म० भा० ५।५५।८ ) इतना ही नहीं, महाभारत में यह भी उल्लेख है कि अर्जुन का रथ कहीं प्रतिहत नहीं होता था । वृक्षों तथा पर्वतों में भी कहीं टकराता नहीं था । अतः कहना होगा कि विशिष्ट रथों पर ध्वजों में विशेषता होती थी, केवल चित्रमात्र नहीं । आज भी ध्वजाओं का विशिष्ट सम्मान होता है । उसके सम्मान या अपमान में सारे राष्ट्र का सम्मान या अपमान माना जाता है । विशिष्ट सम्बन्धों एवं विशिष्ट कारणों से हनुमान्जी अर्जुन के रथ पर कभी अंशतः कभी युद्धादि के समय प्रत्यक्ष ही पूर्ण शक्ति के साथ विराजमान रहते थे । केवल हनुमान् की कीर्ति एवं लोकप्रियता के कारण अर्जुन की ध्वजा के साथ उनका सम्बन्ध जोड़ा नहीं गया । हनुमान् और भीम के संवाद से ही नहीं किन्तु उपर्युक्त— “अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ।” श्लोकानुसार भी हनुमान् का अर्जुन के रथ से विशिष्ट सम्बन्ध विदित होता ही है । भीम और अर्जुन पर अनुग्रह कर हनुमान् ने वर प्रदान किया था । सीता-त्याग उत्तरकाण्ड के सीतात्याग का अपलाप करते हुए बुल्के कहते हैं कि “आदिरामायण में रामकथा राम के अभिषेक तथा राम के सुखद राज्य के संक्षिप्त वर्णन पर समाप्त होती है और उसमें सीता-त्याग का निर्देश नहीं है । महाभारत के रामोपाख्यान में भी कहीं सीता-त्याग का उल्लेख नहीं है । प्राचीन पुराणों, जैसे हरिवंश, वायुपुराण, विष्णुपुराण तथा नृसिंहपुराण में सीतात्याग का संकेतमात्र भी नहीं मिलता है ।” परन्तु उनका यह कहना निरर्थक है, क्योंकि आदिरामायण नाम का ग्रन्थ कोई है ही नहीं । वर्तमान रामायण में सीता-त्याग है ही । उसको प्रक्षिप्त कहना

अध्याय उत्तरकाण्ड ६४१ निराधार ही है। उक्त पुराणों में भी रामकथा का संक्षेप में ही वर्णन है। सभी रामचरित्र ग्रन्थों का आकर ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण ही है। रामोपाख्यान भी संक्षेप ही है। बौद्ध अनामक जातक में तो रामकथा का विकृत रूप ही है, फिर भी उसमें लोकापवाद का वर्णन है : राजा ने रानी से कहा-पति से अलग दूसरे के घरों में निवास करने के कारण चरित्र पर सन्देह किया जाता है। तुम्हें स्वीकार करने में परम्परा के अनुसार कहाँ तक औचित्य है ? रानी ने उत्तर दिया मैं उसमें पङ्कज की तरह रही थी । यदि मुझमें सतीत्व हो तो पृथ्वी फट जाय । पृथ्वी फट गयी । रानी ने कहा मेरा सतीत्व प्रमाणित हुआ । इसके बाद राजा और रानी सुखपूर्वक राज्य करने लगे । परन्तु वाल्मीकिरामायण मूल आकर ग्रन्थ है। उत्तरकाण्ड के अनुसार गर्भवती सीता तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करती हैं। राम ने उन्हें तपोवन भेजने का वचन दिया। संयोगवश राम भद्र से पूछते हैं कि मेरे, सीता तथा भरत आदि के विषय में लोग क्या कहते हैं ? तब भद्र सीता के कारण हो रहे लोकापवाद और जनता के आचरण पर पड़नेवाले उसके कुप्रभाव का उल्लेख करता है। लोग कहते हैं हमको भी अपनी स्त्रियों का ऐसा आचरण सहन करना होगा— “अस्माकमपि दारेषु सहनीयं भविष्यति । यथा हि कुरुते राजा प्रजास्तदनुवर्तते ।” (वा० रा० ७।४३।१९) यह सुनकर राम लक्ष्मण को बुलाते हैं। सीताको गङ्गा के उस पार छोड़ आने का आदेश देते हैं। वे तपोवन दिखाने के बहाने सीता को रथ पर बैठाते हैं। वाल्मीकि के आश्रम पर छोड़ देते हैं। महाकवि कालिदास के रघुवंश (सर्ग १४) की कथा में भद्र मित्र न होकर गुप्तचर माना गया है। उत्तररामचरित, कुन्दमाला तथा दशावतारचरित में भी वैसा ही वर्णन है। उत्तररामचरित में गुप्तचर का नाम दुर्मुख है। आनन्दरामायण के अनुसार उसका नाम विजय है। छलित्राम के अनुसार दो छद्मवेशी राक्षस राम को सीता के विरुद्ध उकसाते हैं । पउमचरियं (पर्व ९२–९४) के अनुसार राम स्वयं गर्भिणी सीता को वन में विभिन्न चैत्यों को दिखला रहे थे । इतने में राजधानी के नागरिक उनके पास आकर अभयदान पाकर अपने आने का कारण बतलाते हैं— पापमोहितमति, परदोषग्रहणरत, स्वभावकुटिल जनता में सीतापवाद को छोड़कर कोई चर्चा नहीं है। नागरिकों की बात सुनकर राम ने लक्ष्मण से परामर्श किया, किन्तु लक्ष्मणने सीता-त्याग का विरोध किया। किन्तु राम ने अपने सेनापति कृतान्तवदन को बुलाकर आदेश दिया कि जिनमन्दिर दिखाने के बहाने सीता को गङ्गा पार भयानक वन में छोड़ दो। सेनापति ने वैसा ही किया । संयोग से पुण्डरीकपुर के राजा वज्रजङ्घ ने उस वन में सीता का विलाप सुन लिया। वह सीता को अपने भवन ले गया और वहां सीता के दो पुत्रों का जन्म हुआ। रविषेण के पद्मचरित ( पर्व ९६ ) में सीता को ग्रहण करने के दुष्परिणाम के वर्णन में परिवर्धन किया गया है । समस्त प्रजा मर्यादारहित बतायी जाती है। स्त्रियों का हरण हुआ करता है। बाद में पुनः अपने अपने घर लौटकर स्वीकृत की जाती हैं— “प्रजाऽधुनाखिला जाता मर्यादारहितात्मिका । स्वभावादेव लोकोऽयं महाकुटिलमानसः ॥ प्रकटं प्राप्य दृष्टान्तं न किञ्चित्तस्य दुष्करम् ।” (प० च० ९६।४०-४२) हेमचन्द्रकृत योगशास्त्र के अनुसार सीतात्याग के पश्चात् राम उनको खोजने वन में जाते हैं, किन्तु सीता का कहीं पता नहीं लगता। राम ने सोचा हिंस्र सिंह, व्याघ्र आदि ने सीता का भक्षण कर लिया होगा । उन्होंने सीता का श्राद्ध भी कर दिया । वस्तुतः वाल्मीकिरामायण ही जैन रामकथाओं का आधार है। जैनों ने जैनधर्म ८१

६४२ रामायणमीमांसा एकोनविंश के दीक्षा-प्रचार के साधनरूप में रामकथाओं का भी उपयोग किया है और अनेक ढङ्ग का परिवर्तन और परिवर्धन किया है। उसका वस्तुस्थिति से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। सीता-त्याग के सम्बन्ध में नये नये नामों का सम्बन्ध जोड़ा गया है। तेरहपन्थी तुलसी ने कुछ जैनी रामकथा और कुछ रामायणों की रामकथाओं का मिश्रण कर एक नयी खिचड़ी बनायी है और उन्होंने धोबीवाली कथा भी जोड़ दी है। जिसमें वह अपनी पत्नी को, जो घर से निकली थी, वापिस लेने से इनकार करते हुए कहता है—मैं राम की तरह नहीं हूँ, जिन्होंने दीर्घकाल तक दूसरे के घर रहने के पश्चात् सीता को ग्रहण किया । बुल्के की दृष्टि में “इसका वर्णन सर्वप्रथम गुणाढ्य की बृहत्कथा में विद्यमान था। वह सोमदेवकृत कथासरित्सागर में सुरक्षित है। उनके अनुसार गुप्तवेश में घूमते हुए राजा ने देखा कि एक पुरुष अपनी स्त्री को हाथ पकड़कर घर से बाहर निकाल रहा है और यह दोष दे रहा है कि दूसरे के घर गयी थी । वह स्त्री कहती है, राम ने सीता को राक्षस के घर में रहने पर भी नहीं छोड़ा। यह मेरा पति राम से भी बढ़कर है, क्योंकि यह मुझे बन्धु के घर जाने पर भी घर से निकाल रहा है। यह सुनकर राम को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने लोकापवाद के भय से गर्भवती सीता को वन में छोड़ दिया।” पर बुल्के की यह भ्रान्ति है जो वे इस कथा का सर्वप्रथम बृहत्कथा में उल्लेख मानते हैं, क्योंकि यह कथा श्रीमद्भागवत ( ९।११।८-१० ) आदि पुराणों से ही गुणाढ्य ने उद्धृत की है। श्रीमद्भागवत के निर्माण का काल गुणाढ्य से अर्वाचीन मानना भी भ्रान्ति ही है। जैमिन्याश्वमेध (अ० २६ ) तथा पद्मपुराण (५।५५ ) के अनुसार ही वह पुरुष धोबी था। आनन्द- रामायण ( ५।३ ), तमिलरामायण, रामचरितमानस लव-कुशकाण्ड आदि में भी इसका वर्णन है। वस्तुतः रामायण के पश्चात् रामचरित का शुद्ध आधार पुराण ही हैं, क्योंकि वे आर्ष हैं। तिब्बती रामायण के अनुसार राम किसी व्यभिचारिणी स्त्री का और उसके पति का झगड़ा सुनते हैं। पति कहता है तुम अन्य स्त्रियों के समान नहीं हो। स्त्री कहती है तुम स्त्रियों के विषय में क्या जानो ? सीता को देख लो वह एक लाख वर्ष दशग्रीव के साथ रही, फिर भी राम ने उसे ग्रहण कर लिया। यह सुनकर राम को सीता के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न होता हैं। वे छिपकर उस स्त्री से मिलते हैं। उसने राम को बताया कि ज्वर- पीड़ित मनुष्य जैसे शीतल सरिता का निरन्तर स्मरण करता रहता है वैसे ही कामपीड़ित स्त्री रूपवान् पुरुष का निरन्तर स्मरण करती रहती है। जब तक कोई देखता, सुनता रहता है तबतक वह निन्दित कर्म नहीं करती, पर एकान्त में वह बन्धनमुक्त होकर परपुरुष से अपनी कामपीड़ा शान्तकर लेती है। यह सुनकर राम की शङ्का सुदृढ़ हो जाती है और वे सीताको वनवास दे देते हैं। कहना न होगा कि यह भी वस्तुस्थिति से भिन्न काल्पनिक आधारों पर आधृत है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार अग्निपरीक्षा के अनन्तर सीता की शुद्धि के प्रति राम को कभी भी अविश्वास का प्रश्न ही नहीं हुआ, केवल लोकापवाद की दृष्टि से ही राम ने सीता को वनवास दिया था। हरिभद्र सूरि की उपदेशपद की एक संग्रहगाथा में सीता द्वारा रावण के चरणों का चित्र बनाने का संकेत मिलता है। टीकाकार मुनिचन्द्र सूरि १२वीं श० ई० के अनुसार सीता ने अपनी ईर्ष्यालु सपत्नी की प्रेरणा से रावण के चरणों का चित्र बनाया था। सपत्नी ने राम को वह चित्र दिखलाया और राम ने सीता का त्याग किया। भद्रेश्वर की कहावली के अनुसार सीता के गर्भवती होने पर उन सपत्नी जनों की ईर्ष्या बहुत बढ़ गयी। उन्होंने ही छद्मव्यवहार से रावण का चित्र बनवाया। इसपर उन्हीं लोगों ने राम के पास जाकर सीता पर अभियोग लगाया कि सीता सदा रावण का स्मरण करती रहती है। उन्होंने प्रमाणस्वरूप रावण के चरण का वह चित्र

दिखलाया। राम ने इसपर अधिक ध्यान नहीं दिया। जिससे सपत्नियों ने रावणचित्र की कथा दासियों द्वारा जनता में फैला दी। वसन्त के समय सीता ने देवपूजा करने का दोहद प्रकट किया। पश्चात् राम ने गुप्तवेश में नगर के उद्यान में टहलते हुए लङ्कानिवास के पश्चात् सीता को ग्रहण करने के कारण अपनी निन्दा सुनी। तब उन्होंने लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण, हनुमान् को बुलाकर गुप्तचरों को आज्ञा दी कि तुम लोगों ने जो कुछ सुना है, उसका निःसंकोच विवरण दो। उन्होंने लोकापवाद की चर्चा की। यह सुनकर लक्ष्मण अत्यन्त क्रुद्ध हुए। गुप्तचरों ने जो सुना था, वह सुनाया। लक्ष्मण ने सीता का पक्ष लिया, किन्तु राम ने कृतान्तमुख द्वारा तीर्थयात्रा के बहाने सीता को जङ्गल में प्रेषित कर दिया। पश्चात् राम ने लक्ष्मण और विद्याधरों के साथ विमान में बैठकर सीता की खोज की। कहीं न देखकर समझ लिया कि सीता वन्य हिंस्र पशुओं की शिकार बन गयी। हेमचन्द्र के जैनरामायण के अनुसार सीता के गर्भवती होने पर तीन सपत्नियों को ईर्ष्या बढ़ गयी। उन्हीं के अनुरोध से सीता ने रावण का चरण-चित्र बनाया। वस्तुतः किञ्चित् परिवर्तन के साथ जैन रामकथाओं का समान ही दृष्टिकोण है। जो सर्वथा निन्द्य ही है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण के अनुसार यज्ञों में अपेक्षित होने पर भी राम ने दूसरा विवाह नहीं किया। वे स्वर्णमयी सीता की प्रतिमा को ही पत्नी के रूप में यज्ञ में बैठाते थे। ऐसी स्थिति में राम का बहुपत्नीवाद वाल्मीकिरामायण विरुद्ध होने से सर्वथा असङ्गत ही है। सीता के प्रति राम को अग्निपरीक्षा के पहले ही व्यावहारिक दृष्टिकोण से ही सन्देह हुआ था, जो कि उचित ही था। सीता को ग्रहण कर लेने पर प्राकृत पुरुषों के समान जनश्रुति के आधार पर शङ्का की कोई सङ्गति ही नहीं बैठती। अग्निपरीक्षा के अनन्तर तो किसी भी समझदार को शङ्का होनी सम्भव नहीं। फिर, लोक के मुख को बन्द करना कठिन काम है। लङ्का की अग्निपरीक्षा का प्रचार लोकमुख-पिधायक हो सकता था, परन्तु राम के द्वारा किये गये उस प्रचार को सरकारी प्रोपेगण्डा कहकर झुठलाया जाना सम्भव था। इसी लिए एक आप्तकाम पूर्णकाम महर्षि के द्वारा वह परिस्थिति लायी गयी कि जिससे अग्निपरीक्षा का ही नहीं सम्पूर्ण सीता-चरित्र का दिव्य प्रचार हुआ। कृत्तिवासरामायण (७।४४,४५) में तीनों कारणों का समन्वय है। राम ने भद्र द्वारा लोकापवाद की चर्चा सुनी। धोबी के मुख से अपनी निन्दा स्वयं सुनी और घर पहुँचकर सीता द्वारा अङ्कित रावण का चित्र देखा। सीता ने सखियों के अनुरोध से रावण का चित्र बनाया था और बनाकर सो गयी थी। चित्र देखकर राम का सन्देह दृढ़ हुआ। वे सीता-त्याग का संकल्प कर चले गये। चन्द्रावलीकृत रामायणगाथा के अनुसार सीता कैकेयी की पुत्री कुकुआ के बहकावे में आकर रावण का चित्र खींचती है। सेरीराम के अनुसार कीकवी भरत और शत्रुघ्न की सहोदरी थी। उसके अनुरोध से पंखेपर चित्र खींच दिया। कीकवी ने सोती हुई सीता पर वह चित्र रख दिया और जाकर राम से कहा कि उन्होंने उस चित्र का चुम्बन किया था। राम ने विश्वास कर सीता को वन में भेज दिया। सीता परिचरों के साथ महरीसी कलि के पास चली गयी। सीता नें परमात्मा से प्रार्थना की थी कि मेरे सतीत्व के प्रमाणस्वरूप कीकवी गूंगी बन जाये तथा सभी पक्षी मौन रहें। परमात्मा ने सुन लिया। कीकवी १२ वर्ष तक गूंगी ही बनी रही। काश्मीरीरामायण के अनुसार राम की सहोदरी बहन ने वह चित्र बनवाया था। जावा के सेरतकाण्ड के अनुसार कैकेयी स्वयं रावण का चित्र खींचती है और सोती हुई सीता के पलङ्ग पर रख देती है। आनन्दरामायण (जन्मखण्ड सर्ग ३) के अनुसार कैकेयी सीता से रावण का चित्र खींचने का आग्रह करती है। सीता कहती है—मैंने केवल उसके दाहिने पैर का अंगूठा ही देखा था और अंगूठे का ही चित्र बना दिया। कैकेयी इसी के आधार पर रावण का पूरा चित्र बनवाती है और राम को बुलाकर स्त्रीचरित्र की आलोचना करती है। राम सीता को वन भेजने का वचन देते हैं। राम ने सीता की दाहिनी भुजा काटने को भी कहा था, पर लक्ष्मण वैसा न कर सकने

६४४ रामायणमीमांसा एकोनविंश के कारण देहत्याग का विचार कर रहे थे। इतने में विश्वकर्मा ने प्रकट होकर सीता का हाथ बनाकर उनको दिया। इतना ही नहीं, हिन्दोनेशिया के हिकायत महाराज रावण में कहा गया है—रावण-वध के बाद राम सात महीने तक लंका में रहे। रावण की एक पुत्री ने अपने पिता रावण का चित्र सोती हुई सीता की छाती पर रख दिया। सीता नींद में इस चित्र का चुम्बन करती है। उसी समय राम उसके पास आते हैं। क्रोध से सीता को कोड़ों से मारकर उसके बाल काटते हैं। लक्ष्मण को बुलाकर आदेश देते हैं कि सीता को मारकर प्रमाणस्वरूप उसका हृदय लाकर दो। लक्ष्मण सीता को उसके पितृगृह पहुँचा देते हैं। बकरी का हृदय लाकर राम को विश्वास दिलाते हैं कि सीता को मार दिया गया। बुल्के भी कहते हैं कि "वृत्तान्त का इतना उग्र रूप केवल वहाँ हो सकता है जहाँ रामचरित्र का आदर्श क्षीण हो गया है।" किन्तु वास्तविक रामचरित्र से विमुख कुछ भी अनर्गल कल्पना कर सकता है। इसका यही उदाहरण कहा जा सकता है। चन्द्र की चन्द्रिका, भानु की प्रभा तथा आनन्दसिन्धु के माधुर्य्य के समान राम से सीता सर्वथा अभिन्न हैं। मनसा, वाचा तथा कर्मणा वे सदा राम की अनन्य अनुरागिणी हैं। "अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा।" (वा० रा०) स्वप्न में भी अन्य की स्फूर्ति उनके मन में सम्भावित नहीं। राम सीता के हृदयेश्वर हैं, हृदय की गतिविधि जानते हैं। पारमार्थिक दृष्टि से दोनों ही सर्वज्ञ हैं, भ्रान्ति भी सम्भावित नहीं है। रावण-वध के बाद सीता, राम और लक्ष्मण लंका में रहे, यह कल्पना जैनों की रामकथाओं से उद्धृत हुई है। वाल्मीकिरामायण की दृष्टि से तो राम ने भरत से मिलने की उत्सुकता के कारण विभीषण का आतिथ्य भी नहीं ग्रहण किया था। फिर वे भरत, शत्रुघ्न, कौशल्या, सुमित्रा आदि की उपेक्षा कर लङ्का में महीनों कैसे रुके रह सकते थे ? सर्वथापि उक्त कथा निकृष्ट विकृति ही है। सिंहलद्वीप की कथा भी ऐसी ही है। उसे भी इसी कोटि की समझना चाहिये। रामकेर्ति (सर्ग ७५) के अनुसार एक रावण की कुटुम्बिनी राक्षसी सीता की सखी का रूप धारण कर रावण का चित्र खिंचवाती है और वह स्वयं उस चित्र में प्रविष्ट होती है। फलतः सीता प्रयत्न करने पर भी उस चित्र को मिटा नहीं पाती। निराश होकर सीता उसे पलङ्ग के नीचे छिपा देती है। राम उसपर लेटते हैं तो उन्हें तीव्र ज्वर हो जाता है। चित्र का पता लगने पर राम लक्ष्मण द्वारा सीता को मारकर कलेजा लाने का आदेश करते हैं। लक्ष्मण वन में सीता पर खड्ग चलाते हैं, खड्ग फूलों की माला बन जाता है। तब इन्द्र मृग का रूप धारणकर लक्ष्मण के सामने मर जाते हैं। लक्ष्मण उसका कलेजा निकाल कर ले जाते हैं। पश्चात् इन्द्र सीता को वाल्मीकि के आश्रम में ले जाते हैं। रामकियेन के अनुसार शूर्पणखा की पुत्री सीता से रावण का चित्र खिंचवाती है। ब्रह्मचक्र की कथा में शूर्पणखा ही छद्मवेश से सीता के पास आकर चित्र खिंचवाती है। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही सभी कथाओं का सुधार करना उचित है। अपनी अपनी लौकिक भावनाओं को जोड़कर जाने अनजाने सीता की पवित्र- कथा में विकृतियाँ जोड़ दी गयी हैं। उनका परिहार कर ही सीताचरित्र समझना उचित है। रामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार लक्ष्मण को सान्त्वना देते हुए सुमन्त्र ने दुर्वासा और दशरथ का संवाद सुनाया था। विष्णु ने भृगुपत्नी की हत्या की थी। भृगु ने विष्णु को शाप दिया था कि तुमको मनुष्य बनकर पत्नी- वियोग का दुःख भोगना पड़ेगा— "तस्मात् त्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन। तत्र पत्नीवियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहुवार्षिकम् ॥"

अध्याय ] उत्तरकाण्ड [ ६४५ बुल्के इस अंश को भी प्रक्षेप कहते हैं। उसके हेतुरूप में वे कहते हैं "वाल्मीकिरामायण गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ में यह नहीं मिलता। भृगुपत्नी-वध का उल्लेख वैदिक साहित्य, महाभारत तथा रामायण में नहीं मिलता। पौराणिक साहित्य में भृगुशाप विष्णु के अवतार धारण का कारण कहा गया है।" किन्तु उनका यह कहना निःसार है, क्योंकि दाक्षिणात्य पाठ का भी प्रामाण्य अव्याहत ही है। रामायण, पुराण आदि वेद के ही उपबृंहण हैं। अतः रामायण तथा पुराण के आधार पर ही जानना चाहिये कि किसी लुप्त वैदिकशाखा में उसका उल्लेख होगा। वेद, पुराण, इतिहास, तन्त्र, आगम कहीं भी जो अंश मिलता है उन सबका समन्वित अर्थ ही वेदार्थ होता है। वाल्मीकिरामायण के उदीच्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों में तारा का शाप सीता-त्याग का परोक्ष कारण माना गया है। बालिवध के बाद तारा ने राम से कहा था कि मेरे शाप के कारण तुमको सीता की सङ्गति कम समय तक प्राप्त हो सकेगी— “अचिरेण तु कालेन त्वया बाणैरुपार्जिता। न सीता मम शापेन चिरं त्वयि भविष्यति ॥ आत्मनः शौचमाधाय पतिव्रतगुणा सती। याच्यमाना त्वया सीता पुनर्यास्यति भूतले॥” तारा ने कहा था कि बाणों द्वारा विजित सीता अधिक काल तक तुम्हारे पास नहीं रहेगी। अपने पवित्रता और पातिव्रत्य के गुण से युक्त वह तुम्हारे प्रार्थना करने पर भी भूतल में प्रवेश करेगी। वाल्मीकिरामायण गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ, माधवकन्दली, कृत्तिवासरामायण, बलरामदासरामायण, भावार्थरामायण आदि में भी ताराशाप का उल्लेख है। वस्तुतः अनेक कारणों से भी एक कार्य सम्पन्न होता है। अतः भृगुशाप तथा ताराशाप दोनों ही के सीता-त्याग के परोक्ष कारण होने में कोई विरोध नहीं है। पद्मपुराण (पातालखण्ड अध्याय ५७) के अनुसार किसी दिन अविवाहिता सीता अपने उद्यान में शुकों के एक जोड़े से रामकथा सुनती हैं। इस कथा को विस्तार से सुनने के लिए वे इन पक्षियों को पकड़वा लेती हैं। वे दोनों वाल्मीकि के आश्रम में सीखे हुए रामायण का गान करते हैं। कथा समाप्त होने पर सीता अपना परिचय देकर उनसे कहती है कि जब तक राम मुझे नहीं ले जाते, मैं तुम दोनों को यहाँ बन्द रखूँगी। पक्षी विनय करते हैं, विशेषतः इसलिए कि शुकी गर्भवती थी। सीता केवल नरपक्षी (नर) को छोड़ देती है। शुकी यह शाप देकर पिंजड़े में मर जाती है— “यथा त्वं पतिना सार्धं वियोजयसि मामितः। तथा त्वमपि रामेण विमुक्ता भव गर्भिणी॥ अपनी मादा की मृत्यु जानकर शुक ने भी संकल्प किया कि मैं अयोध्या में जन्म लेकर सीता के राम-वियोग का कारण बन जाऊँगा। वही गङ्गा में डूबकर रजक के रूप में अयोध्या में प्रकट हुआ। उसने राम की निन्दा की, जिससे राम ने सीता का त्याग किया। पउमचरियं (पर्व १०३) के अनुसार सीता ने पूर्वजन्म में सुदर्शन मुनि की निन्दा की थी। इसी लिए लोकापवाद की लक्ष्य बनीं। भावार्थरामायण (७।४८) के अनुसार सीता सोचती हैं कि मैंने वन में लक्ष्मण पर अधिक्षेप किया था; उसी का मुझे यह फल मिला है। इन सभी कारणों का योग भी सीता के वनवासदुःख का कारण हो सकता है। तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार वाल्मीकि क्षीरसागर पर तपस्या करने गये थे। सागर की लहरों से उन्हें कष्ट हुआ। उन्होंने सोचा कि क्षीर-सागर लक्ष्मी का जन्मदाता होने के कारण अभिमानी हो गया है, अतः