रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ रामायणमीमांसा प्रथम अध्याय परब्रह्मस्वरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य सौन्दर्यसारसर्वस्वं माधुर्यगुणबृंहितम् । ब्रह्मैकमद्वितीयं तत् तत्त्वमेकं द्विधा कृतम् ॥ वेदादिशास्त्रसंवेद्यं सीतारामस्वरूपकम् । सरहस्यं सतां सेव्यमद्भुतं प्रणमाम्यहम् ॥ श्रीसीता-राम का अनुपम ऐश्वर्य श्रीसीता और श्रीराम अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिष्ठान स्वप्रकाश परब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि बाह्य ज्योतियों तथा श्रोत्र, नेत्र, मन, बुद्धि, चित्त, जीव, दैवत आदि आन्तर ज्योतियों के भी ज्योति हैं। वे ही ईश्वर के ईश्वर, ब्रह्मा के ब्रह्मा, ज्ञान के ज्ञान, आनन्द के आनन्द तथा अनुपम अचिन्त्य अनन्त कल्याण गुणगणों के निधान हैं और सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य, सौशील्य, आभा, प्रभा, शोभा, कान्ति, शान्ति प्रभृति दिव्य गुणों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी-समुदायों से सेव्य, अतएव अनन्त लक्ष्मियों की भी लक्ष्मी हैं— “सूर्यस्यापि भवेत्सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्त्त्याः कीर्त्तिः क्षमा-क्षमा ॥” (वा० रा० २।४४।१५) । श्रीसीता प्रेमसारसर्वस्व राम की सौन्दर्यसारसर्वस्व श्रीसीता-राम का स्वरूप सुषमाकामधेनु के सौन्दर्य-पयोराशि से जनित नवनीत से निर्मित है। म्रदिमा की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के चरणकमल कमल से भी कोटिगुण अधिक सुकोमल हैं। वह म्रदिमा की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी अपने लोकोत्तर सुकोमल हस्तारविन्द से श्रीसीता के चरणारविन्द का स्पर्श करने में अपने पाणिपङ्कज को कठोर समझ कर सकुचाती है। श्रीतुलसीदासजी के अनुसार सीता अनुपमेय हैं। ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी भी अनेक कारणों से श्रीसीता की उपमानश्रेणी में नहीं आ सकतीं। श्रीमहालक्ष्मी के प्राकट्य के लिए क्षीरसमुद्र का मन्थन करना पड़ा था। तदर्थ मन्दराचल को मन्थानदण्ड बनाना पड़ा था। मन्दराचल को धारण करने के लिए भगवान् को कच्छपावतार धारण करना पड़ा था। वासुकि नागरूपी रज्जु से मन्दराचल को निबद्ध कर देवताओं, दानवों तथा स्वयं श्रीविष्णु को मन्थन करने का आयास करना पड़ा था, तब महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ था, पर आनन्दसिन्धुसार-सर्वस्व भगवान् राम के माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री राघवेन्द्र-प्राणेश्वरी श्रीसीता के उपमान के लिए वह पर्याप्त नहीं है। हाँ, यदि क्षीरसागर के बदले छविसुधा-सागर हो और पाषाणमय