भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

२ रामायणमीमांसा प्रथम मन्दराचल के स्थान में शृङ्गाररूप मन्दराचल हो और उसका आधारभूत कच्छप भी परम रूपमय हो, वासुकि नाग के स्थान में शोभामयी रज्जु हो और मन्थन करनेवाले देवता आदि के स्थान में साक्षात् आधिदैविक काम ही स्वयं अपने पाणिपद्म से मन्थन का कार्य करें तो इस विधि-विधान से जो अलौकिक लक्ष्मी प्रकट होगी वही कथञ्चित् श्रीसीता का उपमान बन सकती है। विजयलक्ष्मी, साम्राज्यलक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, माधुर्यलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी प्रभृति सब लक्ष्मियाँ अनायास ही वहाँ उपस्थित हो जाती हैं जहाँ श्रीसीता के कृपाकटाक्ष-लेश का उन्मेष होता है। अनुपम प्रेम, अनुपम सौन्दर्य एक दूसरे से अभिन्न हैं। प्रेमसार-सर्वस्व राम हैं एवं सौन्दर्यसार-सर्वस्व श्रीसीता हैं। राघवेन्द्र-हृदयेश्वरी श्रीसीता के अरुण चरणारविन्द की अरुण रज ही श्रुति-सीमन्तिनीजनों के सीमन्त का सिन्दूर है अर्थात् श्रीसीता के चरणारविन्दों की रज से ही श्रुतियाँ सौभाग्यशालिनी होती हैं। श्रीसीता राम की महाशक्ति एवं सर्वस्व हैं सीतोपनिषद् में कहा है, अनेकरूपा श्रीसीता के अनुग्रह से वेद एवं वेदवेद्य परमात्मा सौभाग्यशाली होते हैं। जैसे शीतलता, मधुरता एवं पवित्रता ही गङ्गा के प्रवाह का सार है तथा मधुरिमा अमृत का सर्वस्व है, वैसे ही आनन्द- सिन्धु सुखराशि श्रीराघवेन्द्र के माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी ही सीता हैं। यद्यपि श्रीसीता और राम दोनों परस्पर अभिन्न प्रेमसौन्दर्यसार हैं; उनमें चन्द्र तथा चन्द्रिका का एवं भास्कर तथा प्रभा का जैसा अभेद सम्बन्ध है। अमृतसिन्धु का उसके माधुर्य से विप्रयोग की कल्पना असम्भव है। श्रीसीता और राम का सम्बन्ध तो पूर्वोक्त उदाहरणों से भी अत्यधिक घनिष्ठ है, वह कैसे विच्छिन्न हो सकता है। फिर भी श्रीसीताजी राम की अनन्य भक्ति एवं अनन्य सेवा स्वरूप होने के कारण संप्रयोग-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृङ्गाररससार-सर्वस्वस्वरूपा हैं। यही कारण है कि उनका जहाँ अखण्डरूप से श्रीराम के साथ नित्य सम्बन्ध है, वहीं उनका श्रीराम के साथ चिर-विप्रयोग भी परिलक्षित होता है। विप्रयोग शृङ्गार का महत्त्व रसिकों की दृष्टि में संप्रयोग शृङ्गार से कहीं अधिक है। तभी तो किसी ने कहा है— “सङ्गमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न सङ्गमस्तस्य ।” सङ्गम और विरह का वरदान मिल रहा हो तो भक्त विरह का वरदान माँगेगा, सङ्गम का नहीं; क्योंकि सङ्गम से प्रियतम का सम्मिलन सीमित होता है, परन्तु विरह में तो प्रियतम ही सर्वत्र सर्वरूप से अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राणों तथा रोम-रोम में निरन्तर मिलते रहते हैं। उसी की अनुभूति श्रीराम इस प्रकार करते हैं— कुवलय विपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ जे हित रहे करत तेई पीरा। उरग-स्वास सम त्रिविध समीरा॥ तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ सो मनु रहत सदा तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥ (रा० मा० ५।१४।२-४) लोक में जो उत्कण्ठा प्रिय के विप्रयोग में होती है वह संयोग में नहीं होती, पर प्रियतम के बिना उस उत्कण्ठा का रसास्वादन ही नहीं होता और जब प्रियतम हैं तब वह उत्कण्ठा नहीं होती। इसी दृष्टि से श्रीसीता-राम में सर्वदा सर्वाङ्गीण सम्मिलन-संश्लेष रहने पर भी औपाधिक विश्लेष की अभिव्यक्ति होती है जिसमें प्रियतम की उपस्थिति से भी उत्कट उत्कण्ठा अनुभूत होती है और उत्कट उत्कण्ठा के साथ ही साथ प्रियतम का पूर्ण परिष्वङ्ग प्राप्त होता है। उत्कण्ठापूर्ण परिष्वङ्ग ही पूर्ण भक्ति है, वही पूर्ण सेवा है, वही प्रभु-प्राप्ति का साधन है एवं वही फल भी है। वही सीता है, वही श्रीराम का हृदय है और वही लोकोत्तर माधुर्य है। “श्रीराम” इस महामन्त्र में ‘श्री’ शब्द से श्रीसीता का ही उल्लेख हुआ है। ‘श्री’ शब्द का “श्रयति इति श्रीः” इस व्युत्पत्ति से सेवा करनेवाली