भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

४ रामायणमीमांसा प्रथम सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व अवश्य मान्य है दिन के पहले रात एवं रात के पहले दिन होता है। बीज के पहले अङ्कुर एवं अङ्कुर के पहले बीज का होना अनिवार्य है। इसी प्रकार सोने के पहले जागना और जागने के पहले सोना होता है, सृष्टि के पहले प्रलय, प्रलय के पहले सृष्टि एवं कर्म के पहले जन्म, जन्म के पहले कर्म का होना अनिवार्य है। जन्ममूलक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहङ्कार आदि की हलचल ही कर्म है। लोक में शुभ कर्म का शुभ फल एवं अशुभ कर्म का अशुभ फल होता है। संसार में आकस्मिक कोई वस्तु नहीं होती, कार्यकारणभाव सर्वत्र ही स्पष्टरूप से देखा जाता है। मेज, घट, प्रासाद, मोटर, वायुयान, राकेट आदि सभी विलक्षण कार्यों का निर्माण किसी ज्ञानवान्, इच्छावान् तथा क्रियावान् चेतन द्वारा ही देखा जाता है। ठीक इसी प्रकार वृक्ष, भूमि, भूधर, चन्द्र, सूर्य, सागर आदि का निर्माण भी किसी ज्ञानवान्, क्रियावान् तथा चेतन के द्वारा ही सम्भव है। हाँ, लौकिक छोटे-छोटे कार्य अल्पशक्ति, अल्पज्ञ चेतन जीव के द्वारा निर्मित होते हैं, परन्तु विश्व-प्रपञ्च का निर्माण अल्पज्ञ अल्पशक्ति जीव द्वारा सम्भव नहीं; अतः उसके निर्माण के लिए सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर स्वीकार्य होते हैं। लोक में भी अचेतन देह आदि या अचेतन कर्म स्वयं अपना फल नहीं दे सकते हैं, उनका फलदाता चेतन राजा आदि ही होता है। उसी प्रकार जीवों के कर्मों का फल भी स्वयं कर्म नहीं दे सकते। जड़ प्रकृति भी फल देने में समर्थ नहीं है। जीव चेतन होने पर भी जब अपने एक जन्म के कर्मों एवं उनके फलों को नहीं जानता है तब अन्य अनेक जन्मों के कर्मों को कैसे जान सकेगा ? उसमें फल देने की भी क्षमता नहीं है, अतः अनन्त ब्रह्माण्डों तथा एक ब्रह्माण्ड के अनन्त जीवों एवं एक जीव के अनन्त अनन्त कर्मों तथा उनके विचित्र फलों को जाननेवाला और तदनुसार फल देने की क्षमता से सम्पन्न सर्वशक्तिमान् सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व अवश्य ही मानना होगा। संसार का सञ्चालन नियमों पर ही आदृत है। सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, शुक्र आदि ग्रहों की गति और उदय-अस्त सभी नियमित हैं। यदि उनकी गति अनियमित हो तो वे आपस में ही टकराकर विश्व-विप्लव उपस्थित कर सकते हैं। समुद्र का ज्वार-भाटा तथा विभिन्न चेतना-चेतन पदार्थों के गुण और स्वभाव नियमित परिलक्षित होते हैं। कल्प, युग, वर्ष, पक्ष, दिन, प्रहर, दण्ड की कौन कहे क्षण-क्षण का हिसाब-किताब प्रकृति में नियत है। नियमों का पालन भी तभी हो सकता है जब उनके पीछे कोई सावधान नियामक शासक होता है। इस दृष्टि से भी सब प्राकृतिक नियमों का व्यवस्थापक, पालक एवं नियामक सर्वज्ञ सर्वेश्वर अत्यावश्यक है। अपौरुषेय वेद ही परमेश्वर का शाश्वत संविधान है इस तरह अनादि जीव, जगत् आदि सभी संसार एवं उसके अनादि प्राकृतिक नियमों के व्यवस्थापक सर्वनियन्ता, सर्वज्ञ तथा सर्व-शक्तिमान् प रमेश्वर की सत्ता स्वीकार किये बिना कोई भी व्यवस्था नहीं चल सकती; अतः जैसे लोक में शासक, शिष्ट (शासित) और शासनविधान (कॉस्टीट्यूशन) आवश्यक होते हैं, वैसे ही समष्टि विश्व-प्रपञ्च में भी जीव एवं जगत् शासित हैं, परमेश्वर उनका शासक है और वेदादि शास्त्र ही शासन-विधान हैं। लौकिक शासित, शासक आदि सादि होते हैं; अतः उनका संविधान भी सादि होता है, पर विश्व-प्रपञ्च की दृष्टि से अनादि जन्म-कर्म का आधार होने से जीव अनादि है एवं विश्व-निर्माता नियामक भी अनादि है; अतः उसका संविधान वेदादि भी अनादि है। इसी दृष्टि से वैदिक सनातन हिन्दू-धर्म और दर्शन के सिद्धान्तानुसार वेद अनादि, अपौरुषेय और नित्य कहा जाता है। ऋग्वेद के "वाचा विरूपनित्यया" (ऋ० सं० ८।७५।६) इस मन्त्र में वेदवाणी को नित्य कहा गया है। सर्वप्राचीन विधान-विशेषज्ञ मनु ने वेद-वाक्यों से विश्व-प्रपञ्च का निर्माण एवं वेदों से ही धर्म का ज्ञान माना है—