रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय परंब्रह्मरूप सीताराम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ५ “वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ।” ( मनु १।२१ ) “प्रमाणं परमं श्रुतिः ।” ( मनु २।१३ ) व्यासजी ने भी “शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्” (ब्र० सू० १।३।२८) से वेद को नित्य कहा है । किसी कर्ता के द्वारा कोई भी कार्य ज्ञानपूर्वक ही होता है और ज्ञान या विचार के साथ कोई न कोई भाषा भी होती है । इस दृष्टि से विश्व-निर्माण के अव्यवहित पूर्व में होनेवाले ईश्वरीय ज्ञान की भाषा वैदिक भाषा ही है । अर्थात् ईश्वरीय ज्ञान वैदिक शब्दों से अनुविद्ध ही होते हैं । वाक्यपदीय के अनुसार कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं होता जिसमें सूक्ष्मरूप में शब्दों का सम्पर्क न हो— “न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।” ( वा० प० १।१२३ ) सभी ज्ञान शब्द से सम्बद्ध ही होते हैं— “अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥” ( वा० प० १।१२३ ) “अत एव च नित्यत्वम्” ( ब्र० सू० १।३।२९ ) इत्यादि सूत्रों द्वारा वेद को अनादि एवं नित्य कहा गया है । “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।” ( आप सू० ) इस आपस्तम्बसूत्र के तथा व्यास, जैमिनि आदि के अनुसार मन्त्र-भाग तथा ब्राह्मण-भाग वेद कहा जाता है । आरण्यक तथा उपनिषदों का भी अन्तर्भाव ब्राह्मणग्रन्थों में ही है । कुछ उपनिषदों का अन्तर्भाव मन्त्र-भाग में है । इस तरह मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ये सभी वेद हैं । वेदों का स्वतःप्रामाण्य पुरुष-निर्मित ग्रन्थों में पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों से उनके दूषित होने की सम्भावना होती है; क्योंकि पुरुषमात्र में प्रायः उक्त दोष सम्भावित होते हैं । अतएव पौरुषेय ग्रन्थों का प्रामाण्य तभी होता है जब उनके मूल पुरुष का आप्तत्व निश्चित हो जाय । अपौरुषेय वेद तो स्वतः समस्तपुरुषदोषशङ्कारूपी कलङ्क से विरहित होने के कारण स्वतःप्रमाण हैं । सामान्यतः प्रत्यक्षादि प्रमाण भी अपनी उत्पत्ति में कारण की अपेक्षा रखते हैं, पर अपने स्वार्थबोधनरूप कार्य में अन्य की अपेक्षा न रखने से वे भी स्वतःप्रमाण माने जाते हैं । कारणदोष एवं विषय-बाध से उनका अप्रामाण्य होता है । पित्तादि कारणदोष के ज्ञान से “पीतः शङ्खः”, “तिक्तः गुडः” इस ज्ञान का अप्रामाण्य होता है । एवं शुक्ति में “नेदं रजतम्” इस बाध-ज्ञान से “इदं रजतम्” ज्ञान का अप्रामाण्य होता है । जो लोग एक प्रमाण के प्रामाण्य के लिए अन्य प्रमाण की अपेक्षा मानते हैं उनके मत में अनवस्थादोष अनिवार्य है । यदि किसी अन्तिम ज्ञान को स्वतःप्रमाण मानना ही है तो प्रथम को ही स्वतःप्रमाण क्यों न माना जाय ? जो लोग यह समझते हैं कि प्रथम जल-ज्ञान के प्रामाण्य का निश्चय संवादी ज्ञान अर्थात् स्नान, पान आदि सफल प्रवृत्ति-ज्ञान से होता है; उसमें सन्देह का अवकाश नहीं है, वे लोग भ्रान्त हैं, क्योंकि स्वप्न के स्नान, पान आदि ज्ञान तथा रमणी-रमणादि संवादी ज्ञान में भी संशय होता ही है । इस तरह वैदिक वाक्य स्वार्थ- बोधक होने से स्वतःप्रमाण हैं । अपौरुषेय होने से उनमें कारण-दोष का ज्ञान नहीं होता । अग्निहोत्र और स्वर्ग का कार्य-कारणभाव अलौकिक होने से उसका बाधक ज्ञान भी नहीं होता; अतः कारणदोष, बाधज्ञान आदि न होने से उसका स्वतःप्रामाण्य अकाट्य ही है । वेदावतार वाल्मीकिरामायण का अकुण्ठ प्रामाण्य अन्य सभी पौरुषेय ग्रन्थों में कारण-दोष की सम्भावना बनी रहती है । उनमें वेदमूलकत्व तथा पुरुष के आप्तत्व के ज्ञान से ही प्रामाण्य होता है । वाल्मीकिरामायण, महाभारत, मन्वादि-धर्मशास्त्र, पुराण आदि का प्रामाण्य