भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 83

६ रामायणमीमांसा प्रथम उनके वेदमूलक होने से है; क्योंकि वे सब वेद के व्याख्यानरूप ही हैं। मनु, व्यास आदि के अनुसार वेद अनादि हैं। आधुनिक इतिहासकारों की दृष्टि से भी ऋग्वेद संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक है। वाल्मीकिरामायण वेदों का अवतार तथा वेद-व्याख्यानरूप ही है, यह पुराण का उद्घोष है— “वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना ।।” ( वा० रा० १।१।१ ) वेदवेद्य परमेश्वर श्रीराम के अवतीर्ण होने पर वेद ही प्राचेतस महर्षि से रामायण के रूप में प्रकट हुए । वाल्मीकि-रामायण का भी यही मत है कि वेद के उपबृंहणार्थ महर्षि ने लव-कुश को रामायण ग्रन्थ पढ़ाया— “वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।” ( वा० रा० १।४।६ ) इस तरह मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, मन्वादि धर्मशास्त्र, पुराण, षड्दर्शन, आगम आदि सभी सनातनधर्मियों के मान्य ग्रन्थ हैं तथा हिन्दी, मराठी आदि विविध भाषाओं में लिखित रामचरित- मानस, भावार्थरामायण, ज्ञानेश्वरी-गीता आदि ग्रन्थ भी वेदमूलक होने से ही प्रमाण हैं । श्रीसीतारामचरित्र की वेदमूलकता श्रीसीता एवं श्रीराम का चरित्र मन्त्ररामायण, पूर्वोत्तरतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा मुक्ति- कोपनिषद् आदि में स्पष्टरूप से वर्णित है । इसी प्रकार मन्त्ररामायण में रामकथा का विस्तार से वर्णन है । सीतोपनिषद् में सीता का माहात्म्य वर्णित है । पचासों अन्य उपनिषदों में भी श्रीराम की वन्दना है । वाल्मीकि रामायण में श्रीसीताराम-चरित्र विस्तारपूर्वक वर्णित है । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अद्भुतरामायण, महाभारत, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि में भी श्रीराम का चरित्र वर्णित है । इन सब में वेदों का महत्त्व, श्रीराम की परमेश्वरस्वरूपता तथा श्रीसीता का महाशक्ति या राम का स्वरूप होना स्पष्टरूप से वर्णित है । ऋग्वेद-दशममण्डल के तिरानवेवें सूक्त में श्रीरामका राजा के रूप में स्पष्ट वर्णन है । वाल्मीकिरामायण में श्रीसीता-राम का यथार्थ वर्णन “प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः । चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ।।” ( वा० रा० १।४।१ ) भगवान् वाल्मीकि ने राम के राज्यसिंहासनासीन होने के पश्चात् रामचरित रामायण का निर्माण किया । वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामायण ग्रन्थ श्रीरामचन्द्र के समय का लिखा हुआ है । यह तथ्य मूलरामायण के प्रश्नोत्तर से भी स्पष्ट है । वहाँ प्रश्न किया गया है । को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।।” ( मू० रा० १।१।२ ) इस प्रश्न में ‘साम्प्रतम्’ से वर्तमान-काल में विशिष्ट गुणसम्पन्न पुरुष के सम्बन्ध में प्रश्न किये गये हैं । उत्तर में अतीत तथा वर्तमान की अनेक घटनाओं के सम्बन्ध में तथा भविष्य की घटनाओं के सम्बन्ध में क्रियाओं का प्रयोग किया गया है । जैसे— “इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः । नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी ।।” ( मू० रा० १।१।८ ) “स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् ।” ( मू० रा० १।१।२४ )