भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय परब्रह्मरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ७ “न पुत्रमरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति मनुजाः क्वचित् ॥” ( मू० रा० १।१।९१ ) “चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ॥” ( मू० रा० १।१।९६ ) इन उत्तरवाक्यों में श्रीराम वन गये । राम-राज्य में कोई पुत्र-मरण नहीं देखेगा । राम चारों वर्गों को अपने-अपने धर्मों में नियुक्त करेंगे । इस प्रकार विभिन्न काल की क्रियाओं का स्पष्ट निर्देश है । इन प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होता है कि वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ राम के समकाल का ही है; अतः श्रीसीताराम के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण ही मुख्य प्रमाण है । वाल्मीकीय रामायण के अनुसार साक्षात् ब्रह्माजी ने कहा—महर्षे ! मेरी प्रेरणा से ही “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्” इस श्लोक के रूप में रामायण ग्रन्थ तुम्हारे मुख से प्रकट हुआ है । तुमने धर्मात्मा श्रीराम का चरित्र नारदजी के मुख से जैसा सुना है, वैसा वर्णन करो । श्रीराम के चरित्र का, रहस्य, गुप्त, प्रकट जो भी वृत्त