रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीस हजार श्लोकों, पाँच सौ सर्गों, छह काण्डों तथा उत्तरकाण्ड के रूप में सीताचरित्र रामायण का निर्माण वाल्मीकि ने किया और वेदार्थ में परिनिष्ठित सीता-पुत्र कुश और लव को वेद का उपबृंहण करने के उद्देश्य से यह ग्रन्थ पढ़ाया। इससे सिद्ध होता है कि यह रामायण श्रुति-तात्पर्यविषयीभूत परम तत्त्व का ही प्रतिपादन करनेवाला ग्रन्थ है— “स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥” (वा० रा० १।४।६) यह रामायण सीता का महान् चरित्र है। यह शृङ्गार, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक, वीर आदि विविध रसों से युक्त है। गान्धर्व-तत्त्वज्ञ स्वरसम्पन्न, परम रूपवान् कुश और लव ने वीणा-वादन के साथ इसका गायन कर अभ्यास किया। इनके गान से ऋषि-महर्षि भी विस्मित होकर साधु साधु कहने लगते थे और सन्तुष्ट होकर कमण्डलु, कुठार आदि पुरस्कार के रूप में देने लगते थे। वे अपने दिव्य गायन से सबके शरीरों, अङ्गों, मनों एवं हृदयों तथा कानों को आह्लादित करते थे (वा० रा० १।४)। इतना ही नहीं कुश और लव को पढ़ाकर उस रामायण ग्रन्थ के परीक्षार्थ महर्षि ने तत्कालीन जनता में उसे प्रचारित भी कराया। अधिकांश अयोध्यावासियों के समक्ष जो घटनाएँ घटी थीं, उनके सामने उन घटनाओं का वर्णन हुआ और अयोध्यावासियों की दृष्टि में यह ग्रन्थ अक्षरशः परम सत्य सिद्ध हुआ। वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीविष्णु भगवान् ही राम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं; वाल्मीकिरामायण में यह स्पष्ट उल्लेख है कि महाद्युति, शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले विष्णु आये (वा० रा० १।१५।१६)। देवताओं ने कहा—हे विष्णो ! आप अपने को चतुर्धा विभक्त कर मनुष्यरूप में अवतीर्ण हों तथा प्रवृद्ध लोककण्टक रावण को मारें (वा० रा० १।१५।२१,२२)। तब सुरश्रेष्ठों द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान्, व्यापक नारायण श्रीरामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए (वा० रा० १।१७)। भगवान् विष्णु पुत्र-भाव को प्राप्त हुए। उत्तम ग्रह और नक्षत्रों के उदित होने पर श्रीकौशल्या ने 'सर्व- लोक नमस्कृत जगन्नाथ परमेश्वर' को रामरूप में प्रकट किया। जो सर्व शुभ लक्षणों से युक्त एवं विष्णु के शुद्ध लक्ष्यार्थ- स्वरूप अर्ध भाग हैं और वही इक्ष्वाकुवंश-वर्धन श्रीराम हैं (वा० रा० १।१८।१०,११)। विश्वामित्र का कहना है—सत्यपराक्रम परब्रह्मरूप राम को मैं जानता हूँ और जो तपोनिष्ठ लोग हैं वे भी जानते हैं। महातेजा वसिष्ठ भी श्रीराम को उसी रूप में पहचानते हैं (वा० रा० १।१९।१४,१५)। ये मूर्तिमान् धर्म हैं, वीर्यवानों में सर्वाधिक बुद्धिसम्पन्न (सर्वज्ञ) तथा तपस्या के परम लक्ष्य हैं। ये विविध अस्त्रों को जानते हैं। सचराचर त्रैलोक्य में भक्तिहीन जन इन्हें नहीं जानते और न जानेंगे (वा० रा० १।२१। १०,११)। श्लेषालङ्कार से विश्वामित्र की भी उक्त श्लोकों में स्तुति है। महातेजा गौतम ने अहल्या के साथ विधिवत् श्रीराम की पूजा की और अपने तप में लग गये (वा० रा० १।४९।२१,२२)। परशुराम ने कहा था—त्रैलोक्यनाथ ! आपने जो मुझे पराजित किया है इससे मैं आप को मधुहन्ता मधुसूदन समझता हूँ। स्वर्गादि लोकों का दान करना या उन्हें प्रतिबद्ध करना ईश्वर का ही कार्य है (वा० रा० १।७६।१७-१९)।