रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयही बात "उतामृतत्वस्येशानः" (पु० सू० २) इस श्रुति में कही गयी है। उदीर्णदर्प रावण का वध चाहनेवाले देवताओं की प्रार्थना से भगवान् सनातन विष्णु ही मनुष्य-लोक में रामरूप से प्रकट हुए हैं। कोई भी मनुष्य पुरुषोत्तम राम के सौन्दर्य और माधुर्य से पूर्ण स्वरूप के रसास्वादनार्थ गये हुए अपने मन एवं नेत्रों को उनके चले जाने पर भी हटा नहीं सकता। उनके चले जाने पर भी दर्शकों के मन एवं नेत्रों में उनका दिव्य रूप जगमगाता रहता है। जो मनुष्य स्वप्न में या ध्यान में भी निर्गुण अन्तर्यामी या सगुण साकार रूप से श्रीराम को नहीं देखता है और श्रीराम अनुग्रह की दृष्टि से जिसे नहीं देखते वह सब लोकों में निन्दित होता है। उसकी आत्मा, अन्तःकरण आदि भी उसकी निन्दा करते हुए उसे कोसते हैं। वसिष्ठजी कहते हैं, लोक में ऐसी वस्तु की सत्ता ही सम्भव नहीं जो राम की अनुव्रत न हो। सब सत्ताओं के उद्गमस्थान महासत्तास्वरूप श्रीराम ही हैं। "यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति ॥" "निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥" (वा० रा० २।१७।१३,१४) "लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ॥" (वा० रा० २।३७।३२) धर्मरता वैदेही सीता, श्रीराम का अनुगमन करती हुई, कृतकृत्य हैं। जैसे सुमेरु को सूर्यप्रभा कभी नहीं त्यागती वैसे ही सीता राम से कभी वियुक्त नहीं होती (वा० रा० २।४०।२४)। श्रीसुमित्रा कहती हैं—कौशल्ये ! श्रीराम सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के भी प्रभु, ईश्वर के भी ईश्वर, श्री के भी अग्या श्री हैं। वे कीर्ति के भी कीर्ति एवं क्षमा के क्षमा हैं। जैसे दग्ध तप्त लोह-पिण्ड में दाहकत्व देनेवाला अग्नि, दग्धा लोहपिण्ड का भी दग्धा कहा जाता है, वैसे ही सूर्य आदि में प्रकाशकत्व तथा ईश्वर में ईश्वरत्व आदि प्रदान करनेवाले सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश राम सूर्य आदि के भी सूर्य आदि हैं। अर्थात् श्रीराम स्वप्रकाश सर्वान्तर्यामी परब्रह्म हैं (वा० रा० २।४४।१५)। सत्यस्वरूप श्रीराम के वचन हैं—संसार में सत्य ही ईश्वर है, सत्य में ही धर्म सदा प्रतिष्ठित है। वेद भी सत्य ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित, पर्यवसित हैं, अतः सत्यनिष्ठ होना आवश्यक है— "सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।” (वा० रा० २।१०९।१३) “वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥" (वा० रा० २।१०९।१४) सत्य ब्रह्म-धर्म को छिपाने के कारण तथागत बुद्ध को नास्तिक ही समझना चाहिये (वा० रा० २।१०९।३४)। बौद्धों के अनुसार लङ्कावतारसूत्र के बुद्ध ने लङ्कापति रावण को बौद्ध धर्म का उपदेश किया था; अतः शुद्धोदनपुत्र गौतम बुद्ध से पहले भी बुद्ध की प्रसिद्धि थी। श्रीअगस्त्यजी ने श्रीराम से कहा—आप मुझे पूज्य एवं मान्य अतिथि के रूप में प्राप्त हैं। उन्होंने श्रीराम की पूजा कर आतिथ्य-सत्कार किया और श्रीराम से कहा, यह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य महाचाप इन्द्र ने आपके लिए प्रदान किया है। रावणादि पर विजय प्राप्त करने के लिए आप इसे ग्रहण करें (वा० रा० ३।१२।३०-३२)। महर्षियों, सिद्धों, देवताओं और गन्धर्वों ने कहा—गायों एवं ब्राह्मणों का तथा जो लोगों द्वारा लोकहितैषी के रूप से सम्मत हैं उनका कल्याण हो। संग्राम में आप पुलस्त्य-कुलप्रसूत निशाचरों पर विजय प्राप्त करें (वा० रा० ३।२३।२८)। अकम्पन ने कहा—महाप्रशा श्रीराम कुपित होने पर विक्रम द्वारा सर्वथा असाध्य हैं, अजेय हैं। महायशा २