भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

१० रामायणमीमांसा प्रथम

पुरुषव्याघ्र श्रीराम अपने विक्रम से सब लोकों का संहार कर समस्त प्रजा का पुनः निर्माण कर सकते हैं (वा० रा० ३।३१।२६)। मारीच ने कहा—श्रीराम मूर्तिमान् धर्म हैं। वे सत्यपराक्रम हैं, देवों में इन्द्र के समान सब लोकों के (पृथ्वी के ही नहीं) राजा हैं (वा० रा० ३।३७।१३)। वह तेज अप्रमेय है, जिसकी पत्नी जनकात्मजा है (वा० रा० ३।३७।१८)। सीताके वियोगमें सन्तप्त एवं कुपित होकर श्रीराम ने कहा—मैं सब लोकों का निर्माता हूँ, शूर हूँ। हे लक्ष्मण ! लोकहित में रत, दान्त एवं मृदु होनेसे अज्ञानी लोग मेरा अवमान कर रहे हैं। त्रिदशेश्वर मुझे निर्वीर्य समझ रहे हैं। मैं त्रैलोक्य को कालकर्म से संयुक्त (मृत्यु के वशीभूत) कर सकता हूँ और सचराचर जगत् का नाश कर सकता हूँ (वा० रा० ३।६४।५४-६२)। तारा ने वाली से कहा—युगान्त में उद्भूत प्रलयाग्नि के समान राम शत्रु के बलों का मर्दन करनेवाले हैं। वह साधुओं के निवास-वृक्ष एवं आपद्ग्रस्त प्राणियों के परम आश्रय हैं। वह आर्तों के एकमात्र संश्रय एवं यश के एकमात्र भाजन हैं। उनसे बैर करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। वे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न हैं, पिता की आज्ञा के पालन में निरत हैं एवं सम्पूर्ण गुणों के आकर हैं (वा० रा० ४।१५।१९-२१)। तारा ने अदृष्टपूर्व प्रधान पुरुष श्रीराम को देखकर यह काकुत्स्थ हैं ऐसा जाना (वा० रा० ४।२४।२८) और उसने कहा—आप अप्रमेय हैं, देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से शून्य हैं, दुरासद, जितेन्द्रिय, उत्तम धार्मिक, अक्षयकीर्ति एवं विलक्षण पुरुष हैं। पृथ्वी के समान क्षमावान् एवं अरुणनेत्र हैं (वा० रा० ४।२४।३१)। हनुमान् का वचन स्वयंप्रभा तापसी के प्रति— दाशरथि राम सर्वलोक के राजा हैं। महेन्द्र एवं वरुण के समान प्रभावशाली हैं। चतुरानन स्वयम्भू ब्रह्मा, त्रिपुरान्तक त्रिनेत्र रुद्र, देवताओं के राजा महेन्द्र इन्द्र भी राम के सामने युद्ध में टिक नहीं सकते, क्योंकि श्रीराम ही त्रिमूत्ति हैं (वा० रा० ५।५१।४४)। श्रीराम ने स्वयं कहा—इच्छा करने पर मैं संसारके सभी पिशाच, दानव और राक्षसों का एक अंगुली के अग्रभाग से संहार कर सकता हूँ। सङ्कल्पसिद्धि ईश्वर का लक्षण है। अपरिमेयशक्ति ईश्वर यदि अपनी निरतिशय शक्ति एवं महिमा को प्रकट करें तो उनके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है; परन्तु ब्रह्मा के दिये हुए वरदान के अनुसार नरलोक का अनुसरण करते हुए श्रीराम ने वानर आदि की सहायता की अपेक्षा की है। जो अनन्य-भाव से भगवान् राम की प्रपत्ति स्वीकार कर लेता है अथवा सेव्य-सेवकभाव से, रक्ष्य-रक्षकभाव से भी—'मैं आपका हूँ,' इस प्रकार प्रार्थना करता है उसे वे सब भूतों से तात्कालिक एवं आत्यन्तिक अभय प्रदान करते हैं (वा० रा० ६।१८।२३,३३)। श्रीसीता का वचन है—मैं राघव से वैसे ही अभिन्न हूँ जैसे भास्कर से उसकी प्रभा अभिन्न होती है। जैसे विदितात्मा व्रत-स्नात विप्र की विद्या अनपायिनी होती है वैसे ही मैं श्रीराम की अनपायिनी शक्ति हूँ। जैसे लोपामुद्रा अगस्त्य की, सुकन्या च्यवन की, सावित्री सत्यवान् की एवं श्रीमती कपिल की अनन्य अनपायिनी हैं वैसे ही मैं श्रीराम की अनन्य अनपायिनी हूँ (वा० रा० ५।२१।१६)। जैसे अरुन्धती वसिष्ठ की तथा रोहिणी चन्द्रमा की अनुगामिनी हैं वैसे ही मैं श्रीराम की अनुगामिनी हूँ (वा० रा० ५।२१।२४)। महातेजा राम को सुर या असुर कोई भी जीत नहीं सकता (वा० रा० ५।२७।२२)।