रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिजटा कहती है—हे राक्षसियो ! प्रणिपातमात्र से प्रसन्न होकर जनक-नन्दिनी मैथिली महान् भय ( संसार- भय ) से भी रक्षा कर सकती हैं । तदनन्तर वही ह्रीमती बाला सीता अपने पति की विजय की बात त्रिजटा के स्वप्न से जानकर प्रसन्न होकर बोली—यदि विजय की बात सत्य होगी तो मैं तुम लोगों का अवश्य रक्षण करूँगी (वा० रा० ५।२७) श्रीहनुमान् कहते हैं—कमल की पाँखुरी के समान अरुण, स्वच्छ, दीर्घ-आयत नेत्रवाले राम सब प्राणियों के मन को हरण करनेवाले परम प्रिय हैं, ( सभी प्राणियों के परप्रेमास्पद आत्मा है ), सभी जीवों के रक्षिता (अन्तर्यामी) हैं एवं वेदविद् लोगों द्वारा सुन्दररूप से वे पूजित हैं । राम ब्राह्मणों के उपासक हैं । वही लोगों की मर्यादाओं के ईश्वररूप से कर्त्ता हैं एवं अवताररूप से कारयिता हैं ( वा० रा० ५।३५।८-१० ) । देवताओं ने भगवान् विष्णु से प्रार्थना की थी—आप मनुष्य-रूप धारण कर संग्राम में रावण को मारें, क्योंकि ब्रह्मा ने उसे यह वरदान दे रखा है कि मनुष्य को छोड़कर अन्य से तुम्हें कोई भय नहीं है ( वा० रा० १।१६।३,५ ) । श्रीसीता कहती है—वह जयन्त तीनों लोकों में भटका किसी को भी त्राता न पाकर अन्त में राघवेन्द्र की शरण में आया । अपनी शरण में आये और भूमि में पतित जयन्त को देखकर राम ने उसे अभय दिया ( वा० रा० ५।३०।३४ ) । श्रीहनुमान् जी कहते हैं—अस्त्रवित् राम, महाबल लक्ष्मण एवं राजा सुग्रीव विजयी हों (वा० रा० ५।४३।८) । त्रिलोकनायक श्रीराम के सामने कोई देवता एवं स्वयम्भू चतुरानन ब्रह्मा भी नहीं टिक सकते ( वा० रा० ५।५१।४४ ) । अग्नि से हनुमान् की रक्षा के लिए सीता ने अग्नि से कहा था, यदि मैंने गुरुजनों की सेवा की है, यदि मैंने तपश्चर्या की है, यदि मैंने एकपत्नीत्व पातिव्रत्य का पालन किया है तो हे अग्ने ! तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ । जो सीता अपने तेज से अग्नि को शीतल कर सकती है, वह अपने तेज से रावण को भी भस्म कर सकती थी । इसीलिए रावण का तर्जन करती हुई सीता ने कहा था कि श्रीराम का सन्देश न होने से और अपनी तपस्या की रक्षा की दृष्टि से ही मैं भस्म करने में समर्थ अपने तेज से तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ— “असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥” ( वा० रा० ५।२२।२० ) श्रीहनुमान् ने यही सोचा था कि श्रीराम के प्रभाव से ही जैसे समुद्र में मेरे विश्राम के लिए मैनाक पर्वत प्रकट हुआ था वैसे ही उनके प्रभाव से अग्नि मेरा दहन नहीं कर रहा है और माता श्रीसीता की मृदुलता तथा दयालुता से एवं मेरे पिता वायुदेव के सखा होने के कारण भी अग्निदेव मुझे नहीं जला रहे हैं ( वा० रा० ५।५३ ) । श्रीराम ने कहा—मेरा अद्भुत परिष्वङ्ग ब्रह्मानन्दरूप है । यह मुनियों का सर्वस्व है । ऐसे शुभ अवसर पर मैं महात्मा हनुमान् को वही परिष्वङ्ग प्रदान करता हूँ । नागेश भट्ट के अनुसार भगवान् राम का शरीर शुद्ध आनन्दरूप ही है, अतः उनका आलिङ्गन सर्वस्वभूत है; क्योंकि आनन्द ही राम आदि के देहरूप से भासता है । यह गीता एवं विष्णुसहस्रनाम-भाष्य में श्रीशङ्कराचार्य भगवान् ने कहा है ( वा० रा० ६।१।१३ ) । श्रीराम कहते हैं—मित्र-भाव से सम्प्राप्त विभीषण को किसी प्रकार भी मैं नहीं त्याग सकता, भले ही उसमें दोष हो । सत्पुरुषों की दृष्टि में सदोष शरणागत का भी ग्रहण गर्हित नहीं है । किसी अनिष्ट की शङ्का फिर भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि इच्छा करने पर मैं संसार के सभी पिशाचों, दानवों और राक्षसों को अंगुली के अग्रभाग से ही मार सकता हूँ । एक बार भी जो दृढ़ निष्ठा से मुझको प्रपन्न हो जाता है और ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसी प्रार्थना करता है